क्या आपके चेहरे वाला कोई दूसरा इंसान भी है?

  • 15 जुलाई 2016
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आपका चेहरा ही आपकी पहचान है. पासपोर्ट हो, वोटर आईडी कार्ड हो, या दोस्तों की नज़र हो, आपकी शिनाख़्त आपके चेहरे से होती है. कहते हैं कि दुनिया में एक चेहरे वाला एक ही इंसान होता है. मगर ये दुनिया इतनी बड़ी है. सात अरब से ज़्यादा लोग रहते हैं. तो, क्या ऐसा हो सकता है कि आप जैसे चेहरे वाला दुनिया में कोई और इंसान हो?

हमशक्लों जैसी फ़िल्में तो ख़ूब बनी हैं. जुड़वां भाई बहनों के क़िस्से भी हमने देखे सुने हैं.

मगर, असल ज़िंदगी में आपको कितनी उम्मीद लगती है कि आप जैसी शक्ल वाला दूसरा इंसान आपसे कभी टकरा जाएगा? इस बारे में भी कई क़िस्से मशहूर हुए हैं. मगर ऐसा होने की उम्मीद कितनी है?

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लोक कथाओं में तो हमेशा हमशक्लों के होने की बात कही जाती है. जिसमें आपकी मां जैसी आंखें, पिता जैसी नाक और यहां तक कि आपके चेहरे पर पाया जाने वाला मस्सा भी होने की बातें कही जाती हैं. इस पर तमाम क़िताबें और गीत लिखे गए हैं. बहुत से कलाकारों ने इस विषय पर पेंटिंग्स भी बनाई हैं.

मगर, दुनिया में लोगों के हमशक्ल हो सकते हैं या नहीं, इस सवाल का जवाब बहुत संजीदगी से नहीं खोजा गया.

हाल ही में एक अमरीकी महिला टेगन लूकास ने इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की. उन्होंने अमरीकी सेना के चार हज़ार सैनिकों के फोटो का मिलान किया. टेगन, इस नतीजे पर पहुंचीं कि किसी इंसान का हमशक्ल मिलने की संभावना न के बराबर है.

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हर इंसान का चेहरा, उसका रंग-रूप एकदम अलग होता है. ऐसे में किन्हीं दो इंसानों की शक्ल एक जैसी होना सिर्फ़ आपकी आंखों का भरम हो सकता है. विज्ञान के पैमाने पर कसेंगे तो कोई दो चेहरे एक जैसे नहीं होंगे. इसके लिए आंखें, नाक, कान, बालों की बनावट जैसे आठ गुणों का मिलान किया जाता है.

फ्रांस्वा ब्रुनेल ने अपने एक प्रोजेक्ट के लिए दो सौ के क़रीब जुड़वां लोगों की तस्वीरें खींची हैं. वो बताते हैं दो एक जैसे दिखने वाले लोगों को अलग-अलग खड़ा करके देखेंगे तो दोनों एक जैसे लगेंगे. मगर उन्हें साथ खड़ा करके देखेंगे तो कई फ़र्क़ नज़र आएंगे.

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जैसे कि, 1997 में उस वक़्त के अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और उनके उप राष्ट्रपति अल गोर की एक तस्वीर वायरल हो गई थी. इस तस्वीर में दोनों हमशक्ल लग रहे थे. मगर जब उन्हें क़रीब से देखा गया, तो चेहरों में काफ़ी फ़र्क़ नज़र आया.

असल में जब हम किसी का चेहरा याद रखते हैं तो उसकी आंख, नाक, कान, बालों की बनावट का ख़याल आता है. लेकिन कई बार लोग अपने बालों का स्टाइल बदल लेते हैं. ऐसे में हम जब उन्हें पहली बार देखते हैं तो झटका सा लगता है. मगर, हमारा दिमाग़ उनके चेहरों की और ख़ासियतों, जैसे जबड़ों या ठोड़ी की बनावट से उन्हें पहचान लेता है.

कई बार मेकअप की मदद से भी लोग, हमशक्ल नज़र आने की कोशिश करते हैं. मगर क़रीब से देखेंगे तो आप ये धोखा खाने से भी बच जाएंगे.

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अमरीका की रॉकफेलर यूनिवर्सिटी के विनरिच फ्रेवाल्ड कहते हैं कि औसत चेहरे वाले लोगों जैसे हमशक्ल मिलने की काफ़ी संभावना रहती है. मगर, जब इन्हें एक जैसे चेहरों वाले लोगों की वैज्ञानिक परिभाषा की कसौटी पर कसा जाएगा, तो किन्हीं दो इंसानों के चेहरे नहीं मिल सकते. क्योंकि हर इंसान की बनावट जीन तय करते हैं. वो हर इंसान में अलग होता है.

अब जैसे काली या भूरी आंखों वाले लोगों को लीजिए. ऐसी आंखों वाले करोड़ों लोग दुनिया में होते हैं. मगर उनकी नाक या कान की बनावट अलग होगी. फिर हर इंसान के बालों की बनावट भी अलग होती है. अब हर दस में से एक इंसान का चेहरा गोल होता है.

सबसे अहम है बालों की बनावट और उसका साइज़. बालों के चलते भी बहुत से लोग धोखा खा जाते हैं. इसी तरह बहुत से लोग दाढ़ी रखते हैं. ये भी हमशक्ल होने का आपको धोखा दे सकती है.

गणित के एक सामान्य फॉर्मूले की बुनियाद पर लोग कहते हैं कि किसी इंसान का हमशक्ल होने की संभावना एक लाख में एक ही होती है.

यानी की धरती की मौजूदा साढ़े सात अरब की आबादी में हर शख़्स का हमशक्ल होने के लिए ज़रूरी है कि धरती पर 150 अरब लोग हों. तो इस बात में बहुत फ़र्क़ है कि कभी-कभी आपकी क़िस्मत चमक जाए और हमेशा आप क़िस्मतवाले साबित हों.

कई लोगों को धोखा भी बहुत होता है. कुछ तो ऐसे हैं तस्वीरों में अपने आपको ही नहीं पहचान पाते.

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वैसे जानकार कहते हैं कि कुछ लोगों के हमशक्ल मिलने की उम्मीद अक्सर बनी रहती है. ख़ास तौर से औसत रंग रूप वाले लोगों के लिए. फिर हम कुछ चेहरे अक्सर देखते हैं. वो हमारी यादों में बस जाते हैं. ऐसे लोगों से मिलती जुलते लोगों की तस्वीरों से टकराने पर लगता है कि हमने हमशक्लों को देखा है.

आज के डिजिटल दौर में जब हर एक इंसान की तस्वीर ऑनलाइन हो रही है, इस बात की संभावना बढ़ती जा रही है कि हमें लोगों के हमशक्ल नज़र आने लगें.

आख़िर हमशक्लों में हमारी इतनी दिलचस्पी क्यों है?

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मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इंसान हमशक्लों पर ज़्यादा भरोसा करते हैं. उनसे एक अपनापन सा महसूस करते हैं. उनके बारे में जानने की दिलचस्पी हो जाती है. ये हमारी क़ुदरती आदत का नतीजा है. आदि मानवों के दौर में जब इंसानों की आबादी कम थी, अक्सर चेहरा ही पहचान हुआ करता था. आज हमारी पहचान का दायरा बदल गया है.

दो हमशक्लों के चेहरे भले मिल जाएं, उनकी लंबाई-चौड़ाई, उम्र, सेक्स, आमदनी और परिवार के बीच फ़र्क़ तो रहेगा ही.

ऐसे में हमशक्लों का ख़याल फंतासी की दुनिया के लिए छोड़ दिया जाए, तो बेहतर होगा.

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