'फ्रांस ने जो किया, उसके नतीजे भुगत रहा है'

  • 17 जुलाई 2016
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फ्रांस के शहर नीस में हुए चरमपंथी हमले की मुख्य रूप से चर्चा करते हुए पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों ने दुनिया भर में दहशतगर्दी के कारणों और इसके ख़िलाफ़ रणनीति पर ज़ोर दिया है.

‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि इस समय दुनिया भर में जिस तरह से दहशतगर्दी की लहर है, वो इस बात का तकाज़ा कर रही है कि वैश्विक और क्षेत्रीय ताक़तें अपने हितों और मतभेदों से ऊपर उठ कर एक प्रभावी रणनीति पर काम करना शुरू कर दें.

अख़बार की राय में इस दहशतगर्दी के लिए मुसलमानों और ख़ास तौर से पाकिस्तान पर इल्ज़ाम लगाने का चलन बंद हो क्योंकि मुसलमान देश तो सबसे ज़्यादा इसके शिकार बन रहे हैं.

अख़बार कहता है कि ख़ासतौर से अमरीका को अपनी नीतियां बदलनी होंगी जो अपनी सुरक्षा के नाम पर किसी भी देश पर हमला करना अपना हक़ समझता है जबकि इसी अमरीकी सोच और इसकी प्रतिक्रिया में दहशतगर्दी को बढ़ावा मिल रहा है.

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रोज़नामा ‘एक्सप्रेस’ भी अमरीका की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहता है कि सीरिया, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के हालात दुनिया के सामने हैं जिन्हें 'अमरीका ने अपने सहयोगियों के साथ मिल कर बर्बाद किया' है.

अख़बार लिखता है कि मध्य पूर्व और अफ्रीका के कई देश इन दिनों बड़ी अशांति और संकट से जूझ रहे हैं और इन देशों के जो प्रवासी फ्रांस में रहते हैं, उनमें से बहुत से अपने देश के हालात के लिए अमरीका के साथ साथ फ्रांस को भी ज़िम्मेदार समझते हैं.

अख़बार के मुताबिक़ शायद यही वजह है कि मुसलमानों में अमरीका और यूरोपीय देशों के प्रति नफ़रत बढ़ती ही जा रही है, ऐसे में जब तक दहशतगर्दी के कारण ख़त्म नहीं होंगे, दुनिया में शांति क़ायम नहीं हो सकती.

‘जसारत’ कहता है कि फ्रांस भी अन्य यूरोपीय देशों की तरह मुसलमान देशों पर क़ब्ज़े की में मुहिम शामिल रहा है.

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अख़बार लिखता है कि अल्जीरिया और ट्यूनिशिया में बरसों तक फ्रांस का क़ब्ज़ा रहा है और अब भी वहां फ्रेंच बोली जाती है.

अख़बार का आरोप है कि फ्रांस ने अपने मुसलमान विरोधी आक्रामक रवैया के कारण 'दहशतगर्दी का आयात किया' है और अब वो इसके नतीजे भुगत रहा है, लेकिन दहशतगर्दी कहीं भी हो उसकी निंदा होनी चाहिए.

वहीं 'जंग' ने पाकिस्तान में दहशतगर्दी की घटनाओं में दोषी क़रार दिए गए 12 लोगों की मौत की सज़ा पर मुहर लगाने के सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ के फ़ैसले की सहारना की है.

अख़बार के मुताबिक़ ज़रूरत इस बात की है कि क़ानूनी तकाज़े पूरे करके इस फ़ैसले पर जल्द से जल्द अमल किया जाए और इसकी राह में कोई रुकावट न खड़ी की जाए.

अख़बार लिखता है कि दहशतगर्दों के हाथ हज़ारों पाकिस्तानियों को खून से रंगे हैं और उनकी वजह से पाकिस्तान को 110 अरब डॉलर का नुक़सान हो चुका है.

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रोज़नामा 'दुनिया' ने पाकिस्तान सेना की इस मांग पर संपादकीय लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय कश्मीर मसले को हल कराए.

अख़बार लिखता है कि ये अच्छी बात है कि पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व ने कश्मीर समस्या के हल पर ज़ोर दिया है, लेकिन ज़रूरी है ये मांग सिर्फ भारत प्रशासित कश्मीर में जारी हिंसक हालात के संदर्भ में ही न की जाए.

अख़बार कहता है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के ज़मीर को जगाने के लिए लगातार कोशिश होनी चाहिए, बल्कि जिन कोशिशों का आग़ाज़ पाकिस्तानी सेना की तरफ़ से हुआ है, उन्हें लेकर सरकार को आगे बढ़ना चाहिए.

रुख़ भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने भारत प्रशासित कश्मीर के हालात पर लिखा है कि इस बारे में पाकिस्तान की प्रतिक्रिया की कोई अहमियत नहीं है और इसे ज़मीनी सतह पर ही हल करना होगा.

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अख़बार के मुताबिक़ कश्मीर में युवाओं के गुमराह होने की एक बड़ी वजह बेरोज़गारी है.

अख़बार लिखता है कि आज के हालात में शांति व्यवस्था क़ायम करने के अलावा आगे बढ़ कर एक नई सियासी पहल की जरूरत है.

वहीं 'हमारा समाज' ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार की बहाली को 'लोकतंत्र की जीत' बताया है.

अखबार लिखता है जिस तरह केंद्र की भाजपा सरकार ने उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार को दांवपेंच के ज़रिए गिराने की कोशिश की, ठीक वही तरीक़ा अरुणाचल प्रदेश में भी आज़माया गया.

अखबार की राय में अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार को गिरा कर संविधान की धज्जियां उड़ाई गईं और ये लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ था.

भाजपा को सलाह देते हुए अख़बार कहता है कि उसे अपने क़दमों पर सोचना चाहिए क्योंकि अगर वो ऐसी ही ग़लतियां करती रही तो उत्तर प्रदेश के चुनावों में उसकी राह मुश्किल हो सकती है.

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