अंग्रेजों के ज़माने से है बलूचिस्तान में संघर्ष

  • 20 अगस्त 2016
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने भाषण में जब से बलूचिस्तान का ज़िक्र किया है, भारत और पाकिस्तान के बीच नए सिरे से तनातनी देखने को मिल रही है.

पाकिस्तान के क़रीब 40 फ़ीसदी इलाक़े में स्थित बलूचिस्तान की सरहदें दक्षिण पश्चिम में ईरान और उत्तर से लेकर उत्तर पश्चिम तक अफ़गानिस्तान से लगती हैं. इसके उत्तर पूर्व में पाकिस्तान के क़बाइली इलाक़े और दक्षिण में अरब सागर है.

दक्षिण पश्चिम में एक बड़ा हिस्सा सिंध और पंजाब से जुड़ा है. सिल्क रूट से कारोबारियों और यूरोप से आने वाले हमलावरों के लिए अफ़गानिस्तान तक पहुंचने का रास्ता इसी बलूचिस्तान से होकर गुज़रता है.

बलूचिस्तान में ज़मीन के ऊपर बलूच, हजारा, सिंधी, पंजाबी से लेकर उज्बेक़ और तुर्कमेनियाई लोगों की दुनिया बसी है. लेकिन नीचे कोयला और खनिजों का खज़ाना भरा है.

बावजूद इसके करीब सवा करोड़ की आबादी वाला पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा बदहाली, ग़रीबी और सरकार की अनदेखी का शिकार है. लंबे समय से यहां के लोग अपनी ज़मीन पर अपने शासन के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में वरिष्ठ पत्रकार सिद्दीक़ बलोच बताते हैं, “साल 1840 में जब ब्रितानी आए थे तभी से प्रतिरोध है, संघर्ष रुक रुक के चलता रहा है. पाकिस्तान बनने के बाद पांचवी बार सैन्य अभियान चल रहा है. ये सिलसिला इसलिए चल रहा है क्योंकि ना तो ब्रितानी जमाने में ना ही पाकिस्तान के शासन में बलूच लोगों के साथ कोई समझौता हुआ. ये अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष है.’’

Image caption 2006 में एक सैन्य कार्रवाई में अकबर बुगती मारे गए थे.

विश्लेषक कहते हैं कि पाकिस्तान बनने पर काफ़ी ना नुकुर के बाद बलूचिस्तान की सरहदें तो पाकिस्तान में शामिल हो गईं लेकिन लोगों की शिकायतें दूर नहीं हुईं.

हालांकि इलाक़े के नेता पाकिस्तानी शासन तंत्र में शामिल हुए, चुनाव लड़े, उसके संविधान को स्वीकारा, यहां तक कि बलूचिस्तान में विरोध की सबसे बड़ी आवाज़ रहे बलूच नेता अक़बर खान बुगती भी सूबे के मुख्यमंत्री और गवर्नर रहे. ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि पाकिस्तान बलूचिस्तान को अपना अटूट हिस्सा मानता है.

स्थानीय पत्रकार जान अचकज़ई कहते हैं, “बलूचिस्तान की एक आज़ाद एसेंबली है, वहां प्रांतीय सरकार है, चुनाव होते हैं, कुछ लोग जो बलूचिस्तान की नुमाइंदगी के दावेदार हैं, वो असल में हिंदुस्तान के बहुत नज़दीक हैं, उनके साथ मिले हुए हैं, भारत से पैसा लेते हैं. यहां तीन तरह का चरमपंथ है. एक जो यहां अलगाववादी ताक़तें हैं जो अब क़रीब क़रीब ख़त्म हो चुकी हैं, दूसरी धार्मिक ताकतें जिनके ख़िलाफ़ सरकार ने बड़ी कार्रवाई की है और तीसरी अंतरराष्ट्रीय जो अब भी मौजूद है.”

पाकिस्तान ने जितनी ऊर्जा इस इलाक़े पर अपना अधिकार मज़बूत करने में ख़र्च की है उसका बहुत छोटा हिस्सा ही यहां के लोगों को मुख्यधारा में शामिल करने की मुहिम को दिया. नतीजा ये हुआ कि दिलों के बीच दूरियां बढ़ती गईं और पाकिस्तान बार बार यहां के आवाम को अपनी ताकत दिखाता रहा.

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1948, 1958, 1962, 1973, और 2002 में यहां पाकिस्तानी सेना की बड़ी कार्रवाइयां हुईं. इनमें भारी हथियारों का इस्तेमाल और हवाई हमले भी किए गए. 2006 में बलूच नेता अक़बर बुगती को क़त्ल कर दिया गया.

सैन्य प्रमुख से राष्ट्रपति बने परवेज़ मुशर्रफ़ ने उस वक़्त इसे जायज़ ठहराया था, ”कोई ग़लती नहीं हुई, बिल्कुल सही हुआ है जो बुगती की हत्या हुई. आप बताएं इन के लोग हर जगह दहशतगर्दी के कैंप चलाते हैं, आए दिन हमले करते हैं किसी की क्या जुर्रत बनती है कि वो पाकिस्तान को चैलेंज कर सके और कहे कि हम पाकिस्तान से अलग हो सकें.”

बलूचिस्तान से हज़ारों की तादाद में लोग लापता हैं और सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं कि वो कहां हैं. ग़ायब हुए लोगों के परिजन सरकार पर ही उन्हें अगवा करने का आरोप लगाते हैं, सड़कों पर उतर कर विरोध करते हैं. पाकिस्तान की सरकार स्थानीय लोगों को ही यहां गड़बड़ी फैलाने का ज़िम्मेदार मानती है.

जानकारों का कहना है कि बलूच विद्रोहियों ने कभी सरकार के ख़िलाफ़़ जंग नहीं छेड़ी. सिद्दिक़ बलोच कहते हैं, “बलूच नेताओँ ने पाकिस्तान के साथ कभी जंग नहीं की, मुझे ऐसा कोई वाकया याद नहीं है. ये एकतरफ़ा कार्रवाई है. नवाब बुगती घर में बैठे थे उन्हें मार दिया गया.”

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बीते सालों में पाकिस्तान ने यहां आर्थिक गतिविधियों को तेज़ करने की कोशिश की है.

हाल ही में चीन और ईरान के साथ बड़े क़रार हुए हैं जिनमें ग्वादर के बंदरगाह पर बड़ी सुविधाएं लाने के साथ ही चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर भी बनना है. इसके अलावा ईरान से बड़ी गैस पाइपलाइन की भी योजना है लेकिन स्थानीय लोग इससे भी नाख़ुश हैं. वो मानते हैं उनकी शिकायतों पर काम होने की बजाय उनके अधिकार छीने जा रहे हैं.

बलूचिस्तान में इस वक़्त नवाज़ शरीफ़ की पार्टी सत्ता में है. सिद्दिक़ बलोच कहते हैं, “क़ानून व्यवस्था भी दूसरों के पास है, झाड़ू लगाने का काम भी दूसरे लोग कर रहे हैं, सारा का सारा काम संघीय सरकार के पास है और उसमें बलूच लोगों की कोई नुमाइंदगी नहीं. सरकारी नौकरियों में तो आप बलूच लोगों को ढूंढते रह जाएंगे.’’

सरकारी तंत्र के साथ ही देश के बहुसंख्यक पंजाबी लोगों के साथ भी उनका रिश्ता कभी परवान नहीं चढ़ सका.

बलूचिस्तान में अब भ्रष्टाचार, जातीय हिंसा और अलगाववाद को लेकर संघर्ष है लेकिन पाकिस्तान इसे भारत की कारस्तानी बताता है. बलूचिस्तान की अलगाववादी ताक़तों को भारत की प्रमुख खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ से समर्थन और पैसा मिलने की बात कही जाती है.

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भारत अब तक इससे इंकार करता आया है, लेकिन 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में बलूचिस्तान का जिक्र होने के बाद नया मोड़ आ गया है. प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर और बलूचिस्तान के लोगों ने धन्यवाद दिए हैं. ज़ाहिर है कि इस बयान के निहितार्थ निकाले जाएंगे.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल ने भी एक बार कहा था कि देश की रक्षा नीति में सुरक्षात्मक हमला भी एक तरीका है और अगर दोबारा मुंबई जैसा हमला हुआ तो पाकिस्तान बलूचिस्तान खो देगा.

बलूचिस्तान में अलगाववाद के समर्थक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जता रहे हैं. अक़बर बुगती के पोते ब्राहमदाग बुगती बीते कई सालों से स्वनिर्वासित हो कर स्विट्ज़रलैंड में रह रहे है.

मौजूदा वक्त में उन्हें बलूच विरोध की सबसे बड़ी आवाज़ माना जाता है. बुगती ने एक वीडियो संदेश जारी कर भारतीय प्रधानमंत्री का आभार जताया है और आगे भी समर्थन की मांग की है.

उधर पाकिस्तान का आरोप है कि भारत प्रशासित कश्मीर से ध्यान भटकाने के लिए भारत बलूचिस्तान का नाम ले रहा है.

कुल मिलाकर भारत बलूचिस्तान का समर्थन कश्मीर का जवाब देने के लिए कर रहा है या फिर वो सचमुच बलूचिस्तान को लेकर सहानुभूति का भाव रखता और उनके अधिकारों की लड़ाई में शामिल होना चाहता है, इस वक्त ठीक ठीक ये बता पाना मुश्किल है. आने वाला वक्त शायद इसका जवाब दे सके.

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