महिलाओं को वेतन कम मिलता है?

  • 1 सितंबर 2016
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हाल में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ है जिसके मुताबिक महिलाओं के मुक़ाबले पुरुषों को आज भी औसतन ज़्यादा पैसे मिलते हैं. हालांकि कुछ लोगों को इस पर संदेह है और अगर ऐसा है, तो फिर सच क्या है?

द इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िस्कल स्टडीज़ (आईएफएस) का अध्ययन तो ऐसा होना का दावा करता है लेकिन इस विषय पर स्पष्ट जवाब दे पाना आसान नहीं है.

ब्रिटेन के इक्वॉलिटी एंड ह्यूमन राइट्स कमीशन ने इस मुद्दे की तह तक जाने की कोशिश की है.

कमीशन की 'एज एंड अर्निंग्स इनइक्वलिटी' शाखा की पूर्व प्रमुख शीला वॉल्ड कहती हैं, "मूल रूप से जेंडर पे गैप का मामला बहुत बड़ा है और इसमें कई छोटे-छोटे तथ्य हैं कि कोई भी एक तथ्य को उठाकर उसे अपने मुताबिक पेश कर सकता है."

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जानिए वो 4 वजहें जिससे लगता है कि महिलाओं को कम पैसे मिलते हैं:

1. यह केवल भेदभाव का मामला नहीं है. कई बार जब लोग लिंग के आधार पर वेतन में अंतर देखते हैं तो सोचते हैं कि महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले एक ही काम के लिए कम पैसे मिल रहे हैं. लेकिन ब्रिटेन में महिलाओं को समान काम के बदले समान वेतन का कानूनी अधिकार मिला हुआ है.

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वेतन में अंतर का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं होता है, क्योंकि यह केवल नौकरी देने वालों को पता होता है कि क्या वो ऐसा कर रहे हैं. अगर वो यह मानतें हैं तो इसका मतलब है कि वो यह भी मान रहे हैं कि वो कानून के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं.

2. आईएफ़एस ने लिंग के आधार पर वेतन में जो अंतर पाया है, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह पार्ट टाइम काम है.

पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं तीन गुना ज़्यादा पार्ट टाइम वर्कर हैं. सात में से केवल एक मर्द ही पार्ट टाइम वर्कर है, जबकि 7 में से तीन महिलाएं पार्ट टाइम वर्कर होती हैं. यह काफ़ी अहम है, क्योंकि पार्ट टाइम वर्क में कम पैसे मिलते हैं.

वॉल्ड बताती हैं, " फ़ुल टाइम लेबर मार्केट में लोगों के साथ अलग और पार्ट टाइम लेबर मार्केट में अलग व्यवहार होता है."

यह केवल कम घंटों तक काम करने के लिए कम पैसे मिलने का मामला नहीं है, बल्कि पार्ट टाइम में लोगों को हर घंटे के काम के लिए कम दर पर पैसे मिलते हैं.

असल में आप केवल महिलाकर्मियों पर गौर करें, तो पार्ट टाइमर्स को फ़ुल टाइमर्स के मुक़ाबले हर घंटे के लिए 32 फ़ीसद कम दर पर पैसे मिलते हैं.

इसलिए असल में हम जो बात कर रहे हैं, वो पार्ट टाइम काम करने से मिलने वाले पैसे का अंतर है.

इतिहासकार के प्रोफ़ेसर एलिसन वोल्फ़ कहते हैं, "तुलना एक जैसे लोगों में होनी चाहिए. आप पार्ट टाइम वर्कर्स को बाहर रख कर, उन मर्दों और औरतों की तुलना करें जो फ़ुल टाइम वर्क करते हैं."

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अगर आप ऐसा करेंगे तो जेंडर पे गैप कम हो जाएगा.

3. पुरुषों को महिलाओं से ज़्यादा पैसे मिलने की एक वजह यह भी है कि पुरुष ज़्यादा पैसे मिलने वाली नौकरियां करते हैं.

हालांकि यह बहुत घिसा पिटा लगता है कि इन्वेस्टमैंट बैंकर्स ज़्यादातर मर्द होते हैं और नर्स ज़्यादातर महिलाएं. लेकिन यह केवल एक घिसी पिटी बात नहीं है.

आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि सीनियर मैनेजर स्तर की नौकरियों में ज़्यादातर मर्द होते हैं और देखभाल या प्रबंधन के वो काम जिनमें कम पैसे मिलते हैं, उनमें महिलाएं ज़्यादा होती हैं.

इसलिए अगर आप सभी को एक साथ मिलाकर देखेंगे तो लगेगा कि महिलाओं को कम पैसे मिल रहे हैं.

लेकिन महिलाएं क्यों कम पैसे वाले काम करती हैं?

वॉल्ड कहती हैं, "सबसे पहले तो यह समझना मुश्किल है कि कौन सा काम अपनी पसंद से किया जाता है और कौन सा काम ज़बरदस्ती किया जा रहा है. ज़्यादातर लोगों का काम कई बातों से तय होता है. यह आपके देश में काम के अवसर, स्थानीय श्रम बाज़ार और आपके परिवार की स्थिति पर निर्भर करता है".

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वो कहती हैं, "यह नौकरी देने वालों की उस जानी मानी वजह पर भी निर्भर करता है कि उनके मन में आपकी क्या छवि हैं. और ज़ाहिर तौर पर परंपरा की भी इसमें भूमिका होती है. मतलब कि हमारा समाज महिलाओं और पुरुषों के लिए कौन सा काम बेहतर मानता है".

4. जैंडर पे गैप आपकी उम्र पर भी बहुत ज़्यादा निर्भर करता है. अगर हम आधिकारिक आंकड़ों को देखें तो 50 की उम्र पार कर चुकी महिलाओं को, उसी उम्र के पुरुषों के मुक़ाबले 27 फ़ीसद कम पैसे मिलते हैं. जबकि 20 से 30 साल की उम्र की महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले महज़ 4 फ़ीसद कम पैसे मिलते हैं.

पार्ट टाइम काम करने वालों की बात करें तो 22 से 39 साल की उम्र के बीच की महिलाओं को मिल रहे पैसे का अंतर क़रीब न के बराबर होता है.

वहीं आज के दौर में काम करने वाली 35 साल की महिला को शायद अपनी उम्र के पुरुष के समान ही पैसे मिल रहे हों.

इसलिए जेंडर पे गैप की बात करने पर आपको जो आंकड़ा मिलेगा वो आपके सवाल पर निर्भर करता है.

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