नज़रिया: कितनी कड़ी होती है किम जोंग उन की सुरक्षा

  • 26 सितंबर 2017
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हाल ही में मीडिया में ऐसी ख़बरें आईं कि दक्षिण कोरिया ने एक ऐसी कमांडो टीम तैयार की है जिसका मक़सद उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन को ठिकाने लगाना है. बात यहीं नहीं रुकी. फिर इस ख़बर की सच्चाई और दूसरे ब्योरों को लेकर नई रिपोर्टें आनी शुरू हो गईं.

दक्षिण कोरिया की आर्मी के बारे में ऐसी कई बातें जिसके बारे में लोग पहले से जानते थे, कुछ इस तरीक़े से तफ़सील से पेश की गईं कि ये रिपोर्टें सच्ची लगें, लेकिन जो ब्योरे बताए गए, वे हक़ीक़त से मेल नहीं खाते थे कि दक्षिण कोरिया वाक़ई में ऐसा कोई इरादा रखता है और इस सिलसिले में किसी योजना पर काम कर रहा है.

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ऐसा लगता है कि अपुष्ट सूत्रों के हवाले से अफ़वाहों का एक सिलसिला शुरू हुआ और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में थोड़ी-बहुत बहस के बाद आख़िरकार इसने दम तोड़ दिया. कई बार तो उत्तर कोरियाई नेतृत्व ख़ुद भी जानबूझकर ऐसी अफ़वाहों को हवा देता है ताकि घरेलू राजनीति में अपनी स्थिति मज़बूत की जा सके.

मई, 2017 में उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी केसीएनए ने रिपोर्ट दी कि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए और दक्षिण कोरिया ने रूस में एक उत्तर कोरियाई व्यक्ति को किम जोंग-उन के मर्डर की सुपारी दी थी.

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किम जोंग-उन के क़त्ल की तैयारी?

रिपोर्ट के मुताबिक लकड़ी के मिल में काम करने वाले इस उत्तर कोरियाई शख़्स से 2014 में संपर्क किया गया था. वो शख़्स 2017 की शुरुआत में उत्तर कोरिया में पकड़ा गया. रिपोर्टों में ये कहा गया कि उसने बायोकेमिकल (जैव-रासायनिक) हथियारों के ज़रिए किम जोंग-उन के क़त्ल की तैयारी कर ली थी.

हालांकि जब उत्तर कोरिया ये आरोप लगा रहा था तब वॉशिंगटन और प्योंगयांग के बीच तू-तू मैं-मैं का दौर शुरू हो चुका था और किम जोंग-उन की हुकूमत ने परमाणु और मिसाइल परीक्षणों का सिलसिला शुरू कर दिया था.

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कोरियाई रणनीति

बदक़िस्मती से जब ये अफ़वाहें आनी शुरू हुईं तो सारी बहसें किम जोंग-उन के क़त्ल की अमरीकी और दक्षिण कोरियाई रणनीति की तरफ मुड़ गईं कि दोनों ताक़तें इसे अकेले अंजाम देंगी या साथ मिलकर.

ये भी बहस का मुद्दा रहा कि क्या ऐसी योजनाएं उत्तर कोरिया के परमाणु संकट को हल करने की दिशा में कम ख़र्चीली और ज़्यादा असरदार साबित होंगी. ऐसी ख़बरों के साथ पहली दिक्कत तो यही है कि इसे साबित करना बहुत मुश्किल है कि ये महज़ अफ़वाह नहीं बल्कि असल में योजना का हिस्सा है.

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अमरीका का इरादा

ऐसी बातों में तफ़सीली ब्योरे नहीं होते और न ही पूरी तैयारी के हर कदम का ज़िक्र होता है कि इसे किस तरह से अंजाम दिया जाएगा. बस इतनी-सी बात होती है कि किम जोंग-उन का क़त्ल करने का इरादा है. इसे अंजाम देने की कुछ अस्पष्ट-सी योजनाओं से ये बहुत अलग बात है.

मुमकिन है कि दक्षिण कोरिया और अमरीका ऐसी किसी योजना पर काम करने को लेकर इच्छुक हों, लेकिन क्या हक़ीक़त में वे इस इरादे को अंजाम देने जा रहे हैं- ये पूरी तरह से एक अलग बात है.

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भरोसेमंद सूचना

शीत युद्ध के शुरुआती दिनों में एक बार एक भरोसेमंद सूचना मिली थी कि दक्षिण कोरिया की सरकार उत्त्तर कोरिया के शीर्ष नेतृत्व को ख़त्म करने की कोशिश करने वाली है. साल 1946 में ये रिपोर्ट आई कि दक्षिण कोरिया ने एक हत्यारे को इस मक़सद से भेजा जिसने किम इल-सुंग के पोडियम के पास देसी बम फेंक दिया.

किम इल-सुंग को सोवियत संघ के सुरक्षाकर्मियों ने बचा लिया. इस मामले के अलावा शायद ही ऐसा कोई सबूत मिले जिससे ये साबित हो सके कि अमरीका और दक्षिण कोरिया गंभीरता से उत्तर कोरियाई नेताओं के क़त्ल की किसी योजना पर काम कर रहे हैं.

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रीगन के दौर में...

हालांकि इस बात के सबूत हैं कि अमरीका ने क्यूबा के नेता फ़िदेल कास्त्रो, कांगो के पैट्रिस ल्यूमुबा और लीबिया के कर्नल गद्दाफ़ी के क़त्ल की साज़िश रची थी. 1986 में तो अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने कर्नल गद्दाफ़ी के क़त्ल के लिए उनके ठिकाने पर बमबारी के आदेश दिए थे.

लेकिन उन दिनों में भी ऐसा एक भी सबूत नहीं मिलता है जिससे ये लगे कि अमरीका उत्तर कोरिया के नेता की हत्या की किसी योजना पर हक़ीक़त में काम कर रहा हो. बहरहाल, शीत युद्ध के खत्म होने के बाद भी विदेशी सियासी ओहदेदारों के क़त्ल के रास्ते को चुनने से अमूमन बचा ही गया और इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखा गया.

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हक़ीक़त में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति गेराल्ड फ़ोर्ड ने राजनीतिक हत्याओं के ख़िलाफ़ स्पष्ट घोषित नीति बना रखी थी. इसलिए अगर अमरीका ख़ुद चार दशकों से भी ज़्यादा समय से चली आ रही अपनी घोषित नीति को बदलने का फ़ैसला करता है तो ये एक बहुत बड़ी बात होगी.

इसका हरगिज़ ये मतलब भी नहीं है कि मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ऐसा नहीं कर सकते. लेकिन हां, उनके लिए भी ये करना उतना आसान नहीं होगा. दक्षिण कोरिया के मामले में भी ये बात कही जा सकती है कि उसके लिए भी ये जोख़िम भरा विकल्प है.

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शीत युद्ध के समय

शीत युद्ध के दिनों में भी जब उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच तनाव चरम पर था तो प्योंगयांग की तरफ़ से दक्षिण कोरियाई नेताओं की हत्या की कई बार नाकाम कोशिश की गई. इस कड़ी में दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति पार्क चुंग-ही का नाम लिया जाता है.

एक बार तो 1968 में उत्तर कोरिया के कमांडो दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति के घर में घुसने में कामयाब हो गए थे. दक्षिण कोरिया ने भी तब इसका बदला लेने की सोची थी और इस इरादे से एक कमांडो दस्ता भी बनाया गया था. हालांकि सत्तर के दशक की शुरुआत में पार्क चुंग-ही ने इस नीति को छोड़ने का फ़ैसला किया.

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क्षेत्र की राजनीति

दक्षिण कोरिया को ये एहसास हुआ कि उत्तर कोरिया के नेता की हत्या की कोशिश की जगह अपने आर्थिक विकास और अंदरूनी सुरक्षा पर ध्यान देना बेहतर विकल्प है. 1987 में लोकतंत्र का रास्ता चुनने के बाद दक्षिण कोरिया क्षेत्र की राजनीति में एक ज़िम्मेदार शक्ति बन गया.

इस सूरत में उत्तर कोरियाई नेता को ख़त्म करने की कोई भी कोशिश नैतिकता और नफ़ा-नुकसान के लिहाज़ से भी ग़ैरवाजिब मानी जाएगी. किम जोंग उन के क़त्ल की दक्षिण कोरियाई योजना से जुड़ी कोई भी रिपोर्ट ध्यान से पढ़ने पर ये पता लगता है कि इस पर तभी अमल किया जाएगा जब कोई आपातकालीन स्थिति होगी. यानी युद्ध शुरू हो जाए.

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चीन की भूमिका

इस खेल में एक और अहम खिलाड़ी है और वो है चीन. वो कभी अमरीका और दक्षिण कोरिया को ऐसी किसी ख़तरनाक और भड़काने वाली कोशिश की इजाज़त नहीं देगा. ऐसी ख़बरों के साथ दूसरी दिक्कत ये भी है कि लोग उत्तर कोरिया को इराक़, लीबिया और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों की तरह मान लेते हैं.

इन देशों में किसी विदेशी फ़ौज का दाखिल होना नामुमकिन तो नहीं, हां मुश्किल ज़रूर है. इस बात का ज़िक्र करना ज़रूरी है कि उत्तर कोरिया अनूठे तरीके से अलग-थलग पड़ा देश है जहां हर नागरिक की कई स्तरों पर निगरानी वाली ठोस व्यवस्था है.

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सत्ता और सेना

इसका मतलब ये हुआ कि किसी बाहरी आदमी का उत्तर कोरिया के समाज में दाखिल होना तक़रीबन पूरी तरह से एक नामुमकिन ख़्याल है. उत्तर कोरिया एक ऐसा सर्वसत्तावादी समाज है जहां नेताओं के प्रति वफ़ादारी के आधार पर समाज में वर्ग विभाजन किया गया है.

सत्ता और सेना में केवल उन्हीं परिवार के लोगों को ऊंचे पदों पर रखा जाता है जो पीढ़ियों से वफ़ादारी दिखलाते आए हैं. यही लोग अपने परिवारजनों के साथ एक-दूसरे की जासूसी और निगरानी करते हैं और इस काम में ज़रा-सी चूक भी उन्हें पूरे परिवार के साथ बंदी शिविरों में पहुंचा सकती है.

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उत्तर कोरिया का नेतृत्व

यहां तक कि केवल संदेह के आधार पर उन्हें बिना सफ़ाई का मौका दिए मौत के घाट उतारा जा सकता है. सरकार के इन दमनकारी तौरतरीकों के अलावा उत्तर कोरियाई लोगों को शिक्षा, विचारधारा, सामाजिक समूहों और अन्य ज़रियों से वफ़ादारी सिखाई जाती है.

इन सारी बातों के असर के बारे में सोचना किसी ऐसे व्यक्ति के लिए कल्पना से भी परे है जो उत्तर कोरिया नहीं गया है या फिर जिसने इस देश को समझने के लिए अच्छा-ख़ासा वक्त बिताया है. अगली महत्वपूर्ण बात उत्तर कोरिया के नेता की कई स्तरों वाली सुरक्षा व्यवस्था है.

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Image caption दक्षिण कोरिया और अमरीका की सेना संयुक्त सैन्याभ्यास करते हुए

सुरक्षा व्यवस्था

किम जोंग-उन की सुरक्षा के लिए एक ऐसी आड़ी-तिरछी सुरक्षा व्यवस्था अपनाई जाती है जिसमें विचारधारा के नाम पर प्रतिबद्ध गार्डों की तैनाती के साथ-साथ ऐसे सुरक्षा कर्मी भी तैनात किए जाते हैं जिनका किसी विचारधारा से कोई रिश्ता नहीं होता है. इसमें सशस्त्र गार्ड भी होते हैं और बिना हथियारों वाले सुरक्षाकर्मी भी.

किम जोंग-उन भी वे तमाम एहतियात बरतते हैं जिनका दुनिया भर के दूसरे नेता ख्याल रखते हैं- जैसे अचानक दौरों का कार्यक्रम बनाना, सार्वजनिक कार्यक्रमों में सावधानी से शरीक होना. ऐसी भी रिपोर्टें हैं कि किम जोंग-उन अपने बॉडी डबल्स या हमशक्ल भी रखते हैं जिससे क़ातिलों को धोखा दिया जा सके.

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गंभीर नुक़सान

ये सारी बातें किसी विदेशी व्यक्ति के लिए उत्तर कोरिया के नेता तक पहुंचने और उन्हें गंभीर नुक़सान पहुंचाने के ख़्याल को भी नामुमकिन बना देती हैं. इसका ये भी मतलब निकलता है कि उत्तर कोरिया में भी किसी ऐसे शख़्स को खोजना बहुत आसान नहीं है जो ये काम करने के लिए राज़ी हो जाए.

अगर कोई उत्तर कोरियाई व्यक्ति इसके लिए तैयार हो भी जाता है तो किम जोंग-उन के क़त्ल को कामयाबी से अंजाम देना नामुमकिन होगा.

उत्तर कोरिया के नेता के क़त्ल की साज़िश से जुड़ी खबरों के साथ तीसरी दिक्कत ये है कि अगर अमरीका और दक्षिण कोरिया वाक़ई में किम जोंग-उन की गतिविधियों पर सैटेलाइट्स के ज़रिए निगरानी कर पाने की स्थिति में होते तो कमांडो कार्रवाई की बजाय अचानक हमला करके भी ये इरादा पूरा किया जा सकता था.

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हत्या का विकल्प

चार जुलाई, 2017 को ऐसी रिपोर्टें आई थीं कि अमरीका और दक्षिण कोरिया के पास किम जोंग-उन के ठिकाने और गतिविधियों की लाइव सूचना थी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उत्तर कोरियाई नेता के मर्डर के विकल्प के बारे में नहीं सोचा.

इससे ये बात तो पता चलती है कि उत्तर कोरियाई नेता की हत्या अमरीका और दक्षिण कोरिया के लिए हक़ीक़त में अमल करने वाली योजना नहीं है. उत्तर कोरिया के नेताओं के क़त्ल की कोशिश में नाकामयाबी की संभावना ही वो एकमात्र वजह नहीं है जिससे अमरीका और दक्षिण कोरिया ऐसे किसी तरीक़े को अपनाने से हिचकते हैं.

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उत्तर कोरियाई सरकार

इसकी वजह ये भी है कि ऐसे किसी प्लान के बूते सबकुछ हासिल नहीं किया जा सकता है. अगर किम जोंग-उन की हत्या हो भी जाती है तो इस बात की कोई गांरटी नहीं है कि उत्तर कोरिया में सरकार की चाल और चरित्र अचानक से बदल जाएंगे.

उत्तर कोरियाई नेताओं के पास ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से वे किम जोंग-उन के परिवार के ख़ात्मे के बाद भी वैसी ही नीतियों पर अमल करते रहेंगे. इसके आगे भी और वजहें हैं. नेतृत्व विहीन उत्तर कोरिया के बचाव के लिए चीन आगे आ सकता है.

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कोरियन वर्कस पार्टी

वह उत्तर कोरिया पर कब्ज़े के लिए कोरियन वर्कर्स पार्टी को सत्ता पर कब्ज़ा करने में मदद कर सकते हैं. चीन के समर्थन से या उसके बगैर कोरियन वर्कर्स पार्टी के शासन में आज का उत्तर कोरिया नहीं बदलने वाला है. यही वजह है कि अमरीका और दक्षिण कोरिया किम जोंग-उन की हत्या के किसी प्लान पर अमल करने से हिचकेंगे.

इतना ही नहीं, दक्षिण कोरिया और अमरीका ऐसी किसी कार्रवाई के बुरे परिणाम वाले नतीज़े से भी वाकिफ़ हैं. अगर उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन की हत्या हो जाती है तो थोड़े समय के लिए वहां अफ़रा-तफ़री का माहौल पैदा हो जाएगा.

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परमाणु बम

ये भी मुमकिन है कि वहां सत्ता और सेना में बैठे लोग अगर इस अफ़रा-तफरी और जल्दबाज़ी के माहौल में उसके खतरनाक हथियारों जिसमें परमाणु बम भी शामिल है, का इ्तेमाल कर बैठते हैं तो कोरियाई प्रायद्वीप को भयावह अंजाम से दोचार होना पड़ेगा.

इसलिए किम जोंग उन के मर्डर प्लान से जुड़ी अफ़वाहों में कोई बहुत ज़्यादा दम नहीं है. हां, ये ज़रूर हो सकता है कि दक्षिण कोरिया और अमरीका ऐसी किसी योजना पर काम कर रहे हों जिसमें उत्तर कोरिया पर अचानक हमला बोल दिया जाए और किम जोंग उन के क़त्ल की कोशिश भी उन्हीं में से एक हो.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कोरिय स्टडीज विभाग में कार्यरत हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं)

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