जब चंगेज़ के पोते हलाकू ने बग़दाद को लाशों से पाट दिया था

  • 11 फरवरी 2018
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Image caption मंगोलों ने 1258 में बग़दाद पर किया था हमला.

मंगोल फ़ौज ने पिछले 13 दिन से बग़दाद को घेरे में ले रखा था. जब प्रतिरोध की तमाम उम्मीदें दम तोड़ गईं तो 10 फ़रवरी सन 1258 को समर्पण के दरवाज़े खुल गए.

37वें अब्बासी ख़लीफ़ा मुस्तआसिम बिल्लाह अपने मंत्रियों और अधिकारियों के साथ मुख्य दरवाज़े पर आए और हलाकू ख़ान के सामने हथियार डाल दिए.

हलाकू ने वही किया जो उसके दादा चंगेज़ ख़ान पिछली आधी सदी से करते चले आए थे.

उसने ख़लीफ़ा के अलावा तमाम आला ओहदेदारों को मौत के घाट उतार दिया और मंगोल सेना बग़दाद में दाख़िल हो गई.

इसके अगले चंद दिन तक जो हुआ उसका कुछ अंदाज़ा इतिहासकार अब्दुल्ला वस्साफ़ शिराज़ी के शब्दों से लगाया जा सकता है.

वह लिखते हैं, "वो शहर में भूखे गधों की तरह घुस गए और जिस तरह भूखे भेड़िये भेड़ों पर हमला करती हैं वैसा करने लगे. बिस्तर और तकिए चाकूओं से फाड़ दिए गए. महल की औरतें गलियों में घसीटी गईं और उनमें से हर एक तातरियों का खिलौना बनकर रह गईं."

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Image caption चंगेज़ ख़ान

बग़दाद का पतन

दजला नदी के दोनों किनारों पर आबाद बग़दाद, अलीफ़ लैला का शहर, ख़लीफ़ा हारून अलरशीद का शहर था.

इस बात का सही अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कितने लोग इस क़त्लेआम का शिकार हुए. इतिहासकारों का अंदाज़ा है कि दो लाख से लेकर 10 लाख लोग तलवार, तीर या भाले से मार डाले गए थे.

इतिहास की किताबों में लिखा है कि बग़दाद की गलियां लाशों से अटी पड़ी थीं. चंद दिनों के अंदर-अंदर उनसे उठने वाली सड़ांध की वजह से हलाकू ख़ान को शहर से बाहर तम्बू लगाने पर मजबूर होना पड़ा.

इसी दौरान जब विशाल महल को आग लगाई गई तो इसमें इस्तेमाल होने वाली आबनूस और चंदन की क़ीमती लकड़ी की ख़ुशबू आसपास के इलाके के वातावरण में फैली बदबू में मिल गई.

कुछ ऐसी ही दजला नदी में भी देखने को मिला. कहा जाता है कि उस नदी का मटियाला पानी कुछ दिनों तक लाल रंग में बहता रहा और फिर नीला पड़ गया.

लाल रंग की वजह वो ख़ून था जो गलियों से बह-बहकर नदी में मिलता रहा और सियाही इस वजह से कि शहर के सैंकड़ों पुस्तकालयों में महफ़ूज़ दुर्लभ नुस्खे नदी में फेंक दिए गए थे और उनकी सियाही ने घुल-घुलकर नदी के लाल रंग को हल्का कर दिया था.

फ़ारसी के बड़े शायर शेख़ सादी काफ़ी वक़्त बग़दाद में रहे थे और उन्होंने यहां के मदरसे निज़ामिया में शिक्षा हासिल की थी.

इसलिए उन्होंने बग़दाद के पतन पर यादगार नज़्म लिखी जिस का एक-एक शेर दिल को दहला देता है.

हलाकू ख़ान ने 29 जनवरी सन 1257 को बग़दाद की घेराबंदी की शुरुआत की थी.

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Image caption मंगोल सिपाहियों ने एक पीढ़ी के अंदर दुनिया के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था.

हलाक़ू का खत

हमले से पहले हलाक़ू ने ख़लीफ़ा को लिखा था, "लोहे के सूए को मुक्का मारने की कोशिश न करो. सूरज को बुझी हुई मोमबत्ती समझने की ग़लती न करो. बग़दाद की दीवारें फ़ौरन गिरा दो. उसकी खाइयां पाट दो, हुकूमत छोड़ दो और हमारे पास आ जाओ. अगर हमने बग़दाद पर चढ़ाई की तो तुम्हें न गहरे पाताल में पनाह मिलेगी और न ऊंचे आसमान में."

37वें अब्बासी ख़लीफ़ा मुसतआसिम बिल्लाह की वो शानो शौकत तो नहीं थी जो उनके पूर्वजों के हिस्से आई थी.

लेकिन फिर भी मुस्लिम दुनिया के अधिकतर हिस्से पर उनका सिक्का चलता था और ख़लीफ़ा की यह ताक़त थी कि उन पर हमले की ख़बर सुनकर मराकश से लेकर ईरान तक के सभी मुसलमान उनके समर्थन में खड़े हो जाते थे.

इसलिए ख़लीफ़ा ने हलाकू को जवाब में लिखा, "नौजवान, दस दिन की ख़ुशकिस्मती से तुम ख़ुद को ब्रह्मांड का मालिक समझने लगे हो. मेरे पास पूरब से पश्चिम तक ख़ुदा को मानने वाली जनता है. सलामती से लौट जाओ."

हलाकू ख़ान को अपने मंगोल सिपाहियों की क्षमता पर पूरा भरोसा था.

वो पिछले चार सालों के दौरान अपने देश मंगोलिया से निकलकर चार हज़ार मील दूर तक आ पहुंचे थे और इस दौरान दुनिया के बड़े हिस्से को अपना बना चुके थे.

बग़दाद पर हमले की तैयारियों के दौरान न सिर्फ़ हलाकू ख़ान के भाई मंगू ख़ान ने नए सैनिक दस्ते भिजवाए थे बल्कि अरमेनिया और जॉर्जिया से ख़ासी संख्या में इसाई फ़ौजें भी उनके साथ आ मिली थीं जो मुसलमानों से सलीबी जंगों में पूरब की हार का बदला लेने के लिए बेताब थीं.

यही नहीं मंगोल फ़ौज तकनीकी लिहाज़ से भी कहीं ज़्यादा बड़ी और आधुनिक थी. मंगोल फ़ौज में चीनी इंजीनियरों की इकाई थी जो बारूद के इस्तेमाल में महारत रखती थी.

बग़दाद के लोग उन तीरों के बारे में जानते थे जिन पर आग लगाकर फेंका जाता था लेकिन बारूद से उनका कभी वास्ता नहीं पड़ा था.

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Image caption हलाकू ख़ान (बाएं से दूसरे)

बारूद से वास्ता

उस समय का बारूद देर से जलता था, मंगोलों ने उसमें तेज़ी पैदा की. उसे लोहे या पकाई गई मिट्टी की ट्यूबों में रख दिया जाता था जिससे वो धमाके से फट जाता था.

उसके अलावा मंगोलों ने धुएं के बम बनाने में महारत हासिल कर ली थी. उनके मंजनीकों (युद्ध में पत्थर बरसाने वाला यंत्र) ने शहर पर आग बरसाना शुरू कर दिया.

यही नहीं मंगोलों ने शहर की चारदीवारी के नीचे बारूद लगाकर उसे भी जगह-जगह से तोड़ना शुरू कर दिया.

बग़दाद के निवासियों ने ऐसी आफ़त इससे पहले कभी नहीं देखी थी.

अभी घेराबंदी को एक सप्ताह भी न गुज़रा था कि ख़लीफ़ा ने हलाकू ख़ान को काफ़ी पैसा और अपनी सल्तनत में जुमे के ख़ुतबे में उसका नाम पढ़ने की शर्त पर सुलह की पेशकश की, लेकिन हलाकू को जीत सामने नज़र आ रही थी, उसने यह पेशकश फ़ौरन ही ठुकरा दी.

आख़िर 10 फ़रवरी का दिन आया जब ख़लीफ़ा ने शहर के दरवाज़े मंगोलों के लिए खोल दिए.

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Image caption बग़दाद का एक पुस्तकालय

मंगोल धर्म में किसी बादशाह का ज़मीन पर ख़ून बहाना अपशकुन समझा जाता था.

इसलिए हलाकू शुरू में ख़लीफ़ा को यह विश्वास दिलाता रहा कि वह बग़दाद में उसका मेहमान बनकर आया है.

ख़लीफ़ा की मौत के बारे में कई कहानियां मशहूर हैं. हालांकि, अधिक भरोसेमंद हलाकू के मंत्री नसीरूद्दीन तोसी का बयान है जो उस मौके पर मौजूद थे.

वो लिखते हैं कि ख़लीफ़ा को चंद दिन भूखा रखने के बाद उनके सामने एक ढका हुआ बर्तन लाया गया.

भूखे ख़लीफ़ा ने बेताबी से ढक्कन उठाया तो देखा कि बर्तन हीरे-जवाहरात से भरा हुआ है. हलाकू ने कहा, 'खाओ.' मुसतआसिम बिल्लाह ने कहा, "हीरे कैसे खाऊं?"

हलाकू ने जवाब दिया, "अगर तुम इन हीरों से अपने सिपाहियों के लिए तलवारें और तीर बना लेते तो मैं नदी पार न कर पाता."

अब्बासी ख़लीफ़ा ने जवाब दिया, "ख़ुदा की यही मर्ज़ी थी." हलाकू ने कहा, "अच्छा तो अब मैं जो तुम्हारे साथ करने जा रहा हूं वो भी ख़ुदा की मर्ज़ी है."

उसने ख़लीफ़ा को नमदों में लपेटकर उसके ऊपर घोड़े दौड़ा दिए ताकि ज़मीन पर ख़ून न बहे.

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Image caption इस तस्वीर में दिखाया गया है कि हलाकू ख़ान ने भूखे ख़लीफ़ा को खाने के लिए हीरे-जवाहरात दिए.

नौवीं सदी का बग़दाद

बग़दाद की बुनियाद सन 762 में अबू जफ़र बिन अलमंसूर ने बग़दाद नाम के एक छोटे से गांव के क़रीब रखी थी.

कुछ ही दशकों के भीतर यह बस्ती दुनिया के इतिहास के बड़े शहरों में शामिल हो गई.

हिंदुस्तान से लेकर मिस्र तक के शिक्षाविद, विद्वान, कवि, दार्शनिक, वैज्ञानिक और विचारक यहां पहुंचने लगे.

इसी ज़माने में मुसलमानों ने चीनियों से काग़ज़ बनाने का तरीक़ा सीख लिया और देखते ही देखते शहर शैक्षिक गतिविधियों से भर गया.

नौवीं सदी में बग़दाद का हर शहरी पढ़ लिख सकता था.

इतिहासकार टरटॉयस चैंडलर के शोध के मुताबिक़ सन 775 से लेकर सन 932 तक जनसंख्या के लिहाज़ से बग़दाद दुनिया का सबसे बड़ा शहर था.

इसके अलावा इसे दस लाख की आबादी तक पहुंचने वाले दुनिया का पहला शहर होने का सम्मान प्राप्त था.

वहां यूनानी, लातिनी, संस्कृत, सीरियन और दूसरी भाषाओं की किताबें भी अनुदित होने लगीं.

यही किताबें सदियों बाद पूरब पहुंचीं और उन्होंने पूरब में अहम किरदार अदा किया. अलजेब्रा, एलगोरिद्म, अलकेमी, अल्कोहल आदि जैसे दर्जनों शब्द बग़दाद की इसे सुनहरे दौर की देन हैं.

बग़दाद
Image caption दवाई बनाने के तरीके पर आधारित एक किताब का पन्ना.

बग़दाद में बसने वाली चंद मशहूर हस्तियों के नाम भी देख लीजिए: जाबिर बिन हय्यान (आधुनिक रसायन शास्त्र के विद्वान), अल-ख़्वारिज़्मी (बीजगणित के विद्वान), अल-किंदी और अल-राज़ी (मशहूर दार्शनिक), अल-ग़ज़ली (मशहूर विचारक), अबू नुवास (प्रसिद्ध अरबी कवि), शेख़ सादी (प्रसिद्ध फ़ारसी कवि), ज़िरयाब ( मशहूर संगीतकार), तबरी (मशहूर इतिहासकार), इमाम अबू हनीफ़ा, इमाम अहमद बिन हंबल, इमाम अबू यूसुफ़ (धार्मिक नेता).

आज से ठीक 760 साल पहले बग़दाद पर चलने वाली उस आकस्मिक आंधी ने मेसोपोटामिया की हज़ारों साल पुरानी संस्कृति के क़दम ऐसे उखाड़े कि वो आज तक संभल नहीं पाए.

यही नहीं बल्कि इसके बाद से आज तक कोई मुस्लिम शहर बग़दाद की शानो शौकत तक नहीं पहुंच सका.

कुछ विशेषज्ञों ने लिखा है कि पश्चिमी सभ्यता इसी वजह से फल-फूल सकी कि मंगोलों ने उस वक़्त की बेहतर मुस्लिम सभ्यता को तबाह करके पश्चिम के लिए रास्ता साफ़ कर दिया था.

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