बर्लिन की दीवार बनने की असल कहानी क्या थी

  • 8 अप्रैल 2018
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Image caption पूर्वी जर्मनी के अधिकारियों ने साल 1961 में अचानक बर्लिन की दीवार का निर्माण शुरू कर दिया था

द्वितीय विश्व युद्ध के ख़त्म होने के बाद बर्लिन शहर की अजीबोगरीब स्थिति बन गई थी.

ये टापू जैसे एक शहर में तब्दील हो गया था जिस पर चार मुल्कों का कब्ज़ा था. हर एक मुल्क ने बर्लिन को अपने-अपने सेक्टरों में बांट रखा था.

ये चारों मुल्क थे सोवियत संघ, अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस.

साल 1948 में एक अलग देश वेस्ट जर्मनी को अस्तित्व में लाने की कोशिशें शुरू हुईं और स्टालिन को इस पर एतराज़ था.

स्टालिन ने बदला लेने के लिए उसके सेक्टर से लगने वाले पश्चिमी बर्लिन के हिस्सों को वेस्ट जर्मनी से काट दिया.

हालात ऐसे बन गए कि पूर्वी जर्मनी के आस-पास के इलाकों के लिए पश्चिमी बर्लिन स्थाई रूप से गले की हड्डी बन गया और 13 अगस्त, 1961 को पलक झपकते ही चीज़ें नाटकीय रूप से बदल गईं.

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Image caption बर्लिन की दीवार की शुरुआत पहले कंटीले बाड़ से हुई और फिर उसकी जगह कंक्रीट के ढांचे ने ले ली

बर्लिन की दीवार

वो सुबह के एक बजे का वक़्त था, पूर्वी जर्मनी की सीमा पुलिस और सशस्त्र बल सोवियत सेक्टर की सीमाओं पर तैनात कर दिए गए.

उनके सामने दूसरी तरफ़ अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और पश्चिमी बर्लिन की पुलिस थी.

पूर्वी जर्मनी की तरफ़ बड़े पैमाने पर कंटीले तार लगाने का काम शुरू हो गया, कंक्रीट के पोल जल्दबाज़ी में खड़े कर दिए गए.

यहां तक कि पहले से मौजूद लैंपपोस्ट भी घेराबंदी के काम आ रहे थे.

चार दिनों बाद पश्चिमी जर्मनी की परवाह किए बिना पूर्वी जर्मनी में कंक्रीट से बने ज़्यादा स्थाई ढांचे का निर्माण शुरू कर दिया गया. यही बर्लिन की दीवार थी.

एक मुद्दा पूर्वी जर्मनी से पश्चिम की तरफ़ हो रहा पलायन भी था. पूर्वी जर्मनी का हर छठा आदमी पश्चिम जर्मनी चला गया था और ये पलायन बर्लिन के रास्ते हुआ था.

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Image caption इस दीवार ने अचानक कल तक पड़ोसी रहे लोगों को एक दूसरे से अलग कर दिया था

पूर्वी जर्मनी से पलायान

डॉक्टर, प्रोफ़ेसर और इंजीनियर जिस तरह से पूर्वी जर्मनी छोड़कर पश्चिम की तरफ़ जा रहे थे, इसे देखते हुए 1958 के बाद कम्युनिस्ट प्रशासन के कान खड़े होने शुरू हो गए.

एक ही साथ सख्ती और नरमी बरतने की नीति पूर्वी जर्मनी छोड़ने वाले लोगों को रोकने से नाकाम हो गई थी.

बर्लिन को चला रहे चारों मुल्कों के बीच इस बात पर भी रजामंदी हुई थी कि शहर में उनके नियंत्रण वाले इलाकों की सीमाएं खुली रखी जाएंगी.

लेकिन ये शर्त पूर्वी जर्मनी से पलायन को सहूलियत ही दे रही थी.

मई, 1960 में पूर्वी जर्मनी की कुख्यात खुफिया पुलिस का गठन हुआ, लेकिन ये भी पलायान करने वाले पांच लोगों में से एक को ही पकड़ पा रही थी.

और वे इस नतीजे पर पहुंचे, "पश्चिमी बर्लिन को पूरी तरह से बंद किया जाना मुमकिन नहीं था, इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को पूर्वी जर्मनी के भरोसे छोड़ा नहीं जा सकता था."

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Image caption जुलाई, 1961 में निकिता ख्रुश्चेव ने पूर्वी जर्मनी के नेताओं वॉल्टर उलब्रिच्ट का ये अनुरोध मान लिया कि बर्लिन को बांटने वाली दीवार का निर्माण होने दिया जाए

ख्रुश्चेव और कैनेडी की मुलाकात

इसलिए एक क्रांतिकारी समाधान की ज़रूरत महसूस की जाने लगी थी, और वो था पश्चिमी बर्लिन का अलगाव.

यानी वो तरीका जिससे पूर्वी जर्मनी के लोगों को पूर्वी इलाके में रखा जाए और पश्चिमी जर्मनी का पूर्वी जर्मनी से संपर्क भी बना रहे.

पूर्वी जर्मनी के अधिकारी पचास के दशक में इस बात पर निजी तौर पर जोर देते रहे थे, लेकिन सोवियत संघ ने कूटनीतिक हल की उम्मीाद में इस पर वीटो कर दिया था.

मई, 1961 में पूर्वी जर्मनी के नेता वॉल्टर उलब्रिच्ट ने सोवियत संघ से इस सिलसिले में औपचारिक तौर पर आग्रह किया.

इसी साल जून में सोवियत संघ के निकिता ख्रुश्चेव और अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी की मुलाकात हुई.

ये मुलाकात तल्ख रही और दोनों के भाषण टीवी पर दिखाए गए.

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Image caption सुरक्षा के लिए बर्लिन के पश्चिमी इलाके में ब्रिटेन ने भी कंटीले तारों का बाड़ खड़ा कर दिया था

बर्लिन की घेरेबंदी

मुलाकात का ही नतीजा था कि जुलाई के आखिर में सोवियत संघ ने बर्लिन की दीवार बनाने की योजना को मंजूरी दे दी.

दीवार खड़ी करने की योजना को इस कदर गुप्त रखा गया कि पूर्वी जर्मनी छोड़ने की चाहत रखने वाले लोगों के बीच भगदड़ न मच जाए.

राष्ट्रपति कैनेडी के 26 जुलाई, 1961 के भाषण के ठीक एक दिन बाद सोवियत संघ ने फ़ैसला कर लिया.

ख्रुश्चेव ने पूर्वी जर्मनी में सोवियत संघ के राजदूत के मार्फत वॉल्टर उलब्रिच्ट को बर्लिन की कंटीले बाड़ से घेराबंदी का संदेश भिजवाया.

संदेश स्पष्ट था, ये काम किसी भी सूरत में शांति समझौता ख़त्म होने से पहले पूरा कर लिया जाना चाहिए.

हकीकत में सोवियत संघ के नेता उसी कूटनीतिक संकट को फिर से हवा दे रहे थे जिसकी बुनियाद उन्होंने नवंबर, 1958 में रखी थी.

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Image caption अमरीकी राष्ट्रपति कैनेडी ने अपने भाषण में ये साफ़ कर दिया था कि वो वेस्ट बर्लिन की हिफाजत के लिए युद्ध को भी तैयार हैं

क्या हुआ था नवंबर, 1958 में

सोवियत संघ ने उस समय पश्चिमी ताकतों से कहा था कि शांति समझौते के लिए तैयार हो जाओ या फिर वेस्ट बर्लिन खाली कर दो.

तब पश्चिमी ताकतों को इस शांति समझौते के तहत मजबूरन पूर्वी जर्मनी को एक स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता देनी पड़ी और जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक वजूद में आया.

हालांकि दुनिया ने पूर्वी जर्मनी को सोवियत संघ के कठपुतली देश के तौर पर ही देखा.

संप्रभुता मिलते ही पूर्वी जर्मनी को पश्चिमी बर्लिन से वेस्ट जर्मनी को जोड़ने वाले रास्तों पर नियंत्रण हासिल हो गया. इसमें सड़कें, रेलवे और हवाई यातायात तीनों थे.

कैनेडी ने अपने भाषण में ये साफ़ कर दिया कि वे पश्चिमी बर्लिन को बचाने के लिए युद्ध की हद तक जाने को तैयार हैं, लेकिन पूर्वी बर्लिन के मुद्दे पर वे खामोश ही रहे.

और वही हुआ, जिसका अंदाजा था. कम्युनिस्टों को अपने इलाके में पूरी छूट मिल गई.

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Image caption पूर्वी जर्मनी के कम ही नेताओं को इस योजना के बारे में जानकारी थी, इनमें एरिक होनेकेर भी एक थे

योजना पर अमल शुरू

इसके बाद से 'ऑपरेशन पिंक' की शुरुआत हुई. बेहद खुफिया तरीके से पश्चिमी बर्लिन की घेराबंदी की योजना पर काम शुरू हो गया.

कई आला सरकारी अधिकारियों को इस योजना से अनजान रखा गया. कहा जाता है कि पूर्वी जर्मनी में केवल 60 लोगों को ये पता था कि ऐसा कुछ होने जा रहा है.

ईस्ट जर्मनी कम्युनिस्ट पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले एरिक होनेकेर भी इनमें से एक थे. दशक भर बाद वे पूर्वी जर्मनी के नेता बने.

पोलित ब्यूरो में उनका दर्जा सुरक्षा सचिव का था और वे देश के आंतरिक और बाह्य दोनों ही मोर्चों पर रक्षा के लिए जिम्मेदार थे.

इस काम को शनिवार की रात शुरू होकर रविवार सुबह तक ख़त्म कर लिया जाना था. 17 जून, 1953 के हमले को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी की कड़वी यादें इससे जुड़ी थी.

24 जुलाई को पार्टी के सुरक्षा विभाग ने ये हिसाब लगाया कि 27,000 लोगों पर काम लगाए जाने की ज़रूरत होगी और इस काम में 500 टन कंटीले तार लगेंगे.

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Image caption बर्लिन की घेराबंदी के काम को सपोर्ट करने के लिए सोवियत संघ और पूर्वी जर्मनी ने टैंक तैनात कर रखे थे

एक अनिश्चित विकल्प

लोहे के कंटीले तार को सीमावर्ती इलाकों से आहिस्ता-आहिस्ता राजधानी पहुंचाया गया.

कंटीले बाड़ से घेराबंदी के काम को अंजाम देने के लिए सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर टैंक तैनात किए गए.

गोपनीयता इस कदर बरती गई तो पश्चिमी ताकतों को इसकी जरा सी भी भनक तक नहीं लगी.

हालांकि सीआईए और ब्रितानी खुफिया एजेंसी ने अतीत में इसकी संभावना ज़रूर जाहिर की थी.

पश्चिमी जर्मनी के खुफिया संगठन ने चांसलर कोनराड एडेनाउएर को इस योजना के बारे में जानकारी दी थी.

इतनी बात तो तय थी कि पश्चिमी देशों को इसका अंदाजा था कि वेस्ट बर्लिन की घेराबंदी एक विकल्प है और पूर्वी जर्मनी इस योजना पर काम कर रहा है.

लेकिन वे इसकी तारीख को लेकर निश्चित नहीं थे.

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Image caption पश्चिम जर्मनी के चांसलर कोनराड एडेनाउएर ने पूर्वी जर्मनी के कम्युनिस्ट निज़ाम के लिए वेस्ट बर्लिन की अहमियत को लेकर आगाह भी किया था

'ऑपरेशन पिंक'

पूर्वी जर्मनी की खुफिया एजेंसी स्टासी के एक दस्तावेज़ के मुताबिक़, "13 अगस्त की सफल कार्रवाई का सबसे अहम सबक ये है कि किसी ऑपरेशन को खुफिया रखा जाए. ये उतना ही कारगर होता है जितना सही वक्त पर सही जगह दुश्मन पर बोला गया कामयाब हमला.

एक अगस्त को ख्रुश्चेव और वॉल्टर के बीच फोन पर लंबी बात हुई जिसे कुछ साल पहले मॉस्को ने जारी किया था. शुरुआत में हल्की-फुल्की बातों के बाद दोनों ने वेस्ट बर्लिन की सुरक्षा के मुद्दे और दीवार की योजना पर बात की.

12 अगस्त को वॉल्टर ने इस योजना पर अमल के आदेश दिए. 'ऑपरेशन पिंक' पर काम शुरू हो गया था.

जॉन एफ़ कैनेडी ने बाद में कहा भी था, "दीवार बहुत अच्छी चीज़ नहीं होती, लेकिन एक जंग से कहीं बेहतर विकल्प ज़रूर है."

(पैट्रिक मेजर यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग में मॉडर्न हिस्ट्री के प्रोफ़ेसर हैं.)

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