बिना प्लास्टिक के एक भी दिन गुज़ारो तो सही

  • 5 जून 2018
प्लास्टिक

आज से क़रीब दस साल पहले मैंने प्लास्टिक के बग़ैर ज़िंदगी बिताने की कोशिश की थी. आज एक दशक बाद जब दुनिया भर में तमाम देश प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने या पूरी तरह से ख़त्म करने की बातें कर रहे हैं, इसके लिए ज़रूरी क़दम उठा रहे हैं. तो ये सवाल बनता है कि क्या आज एक दशक बाद बिना प्लास्टिक के ज़िंदगी बसर करना आसान हुआ है?

आज से दस साल पहले यानी 2008 में भयंकर गर्मी पड़ रही थी. मुझे वो गर्मी इसलिए याद है क्योंकि मेरे किचेन से प्लास्टिक की दूध की बोतलों और दही के ख़ाली डिब्बों के गर्म होने की बू आती थी.

जुलाई के उस महीने में मैंने अपने पूरे परिवार, यानी मेरे पति और छोटे बच्चे के इस्तेमाल किए हुए प्लास्टिक के 603 सामानों को इकट्ठा किया. इसके बाद अगले महीने यानी अगस्त 2008 में मैंने ये तजुर्बा करने की कोशिश की कि क्या प्लास्टिक के बग़ैर जिया जा सकता है.

मेरे इस प्रोजेक्ट की वजह बीबीसी की एक रिपोर्ट थी जिसने प्रशांत महासागर के बीच में प्लास्टिक की वजह से हुए प्रदूषण के बारे में बताया था. इससे मेरे ज़हन में सवाल उठा था कि क्या ये मुमकिन है कि हम एक बार इस्तेमाल करके फेंक दिए जाने वाले प्लास्टिक को अपनी ज़िंदगी से हटा सकते हैं.

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मेरे उस साल के तजुर्बे का जवाब था, ऐसा मुश्किल है. लेकिन अगस्त 2008 में भी हमारे परिवार ने अपने इस्तेमाल में आने वाले प्लास्टिक के सामान की तादाद 603 से घटाकर 116 कर ली थी. इसमें से भी 63 तो फेंक दी जाने वाली नैपी थीं.

आज एक दशक बाद हमारे घर में प्लास्टिक की नैपी का इस्तेमाल नहीं होता. आज हमारे घर में दो बच्चे हैं, तो ज़ाहिर है हमारी शॉपिंग कार्ट में उनके लिए ज़रूरी सामान भरा होता है. इसमें से ज़्यादातर सामान की पैकिंग प्लास्टिक में होती है.

इसकी वजह साफ़ है. प्लास्टिक हल्का होता है. ज़्यादा दिनों तक चलता है. इसमें पैक खाना ज़्यादा वक़्त तक ताज़ा रहता है. इसे लाना-ले जाना और रखना आसान होता है.

आज प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने की लोगों की सोच को देखते हुए, मैंने अपने 2008 के तजुर्बे को एक बार फिर से दोहराने की सोची.

मैंने सोचा कि क्या एक महीने तक, ऐसे सामान पर जिया जा सकता है, जिसमें किसी भी तरह से प्लास्टिक का इस्तेमाल न हुआ हो?

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पहला हफ़्ता: सुबह के नाश्ते की जंग

मैंने सबसे पहले अपने सुबह के नाश्ते के रूटीन से प्लास्टिक को हटाने की सोची. आज हम जागते हैं, तो हमारे घर के दरवाज़े पर दूध की बोतलें रखी होती हैं. ये कांच की बनी होती हैं. पहले जहां इन बोतलों के लिए लिखकर ऑर्डर देना होता था, वहीं अब ये ऑनलाइन ख़रीदी जा सकती हैं.

बच्चों को ये नया तजुर्बा बहुत रास आया. मेरी आठ साल की बच्ची को मैंने अपनी दोस्त से ये कहते हुए सुना कि, 'हमारे दरवाज़े पर रात के वक़्त अपने आप ही दूध की बोतलें आ जाती हैं'.

साल 2018 में प्लास्टिक की थैलियों और पैकेट में बंद दूध की जगह दूध की बोतलें ख़रीदने वाले हम अकेले नहीं. ब्रिटेन में ऐसे दूध की सप्लाई करने वाली कंपनी मिल्क ऐंड मोर कहती है कि जनवरी से अब तक उसके दस हज़ार से ज़्यादा ऑनलाइन ग्राहक बढ़े हैं. ऐसा तब हुआ है, जब 2008 के मुक़ाबले दूध की खपत में क़रीब 7 प्रतिशत की गिरावट आई है.

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जो दूध घर पहुंचाया जाता है, वो महंगा होता है. लेकिन, इससे हम दूध लेने के लिए बार-बार दुकान जाने से भी तो बच जाते हैं. दूध की प्लास्टिक वाली बोतलों को सबसे ज़्यादा रिसाइकिल किया जाता है. आज की तारीखञ में प्लास्टिक के थैले, पाउच और डिब्बों के मुंह बंद करने में इस्तेमाल होने वाला कवर, हमारे घर में मौजूद कुल प्लास्टिक का एक चौथाई होते हैं.

नाश्ते में हम अक्सर गोल ब्रेड के पैकेट इस्तेमाल करते हैं, जो प्लास्टिक में पैक होकर आते हैं. इसके अलावा हम जो अनाज इस्तेमाल करते हैं, वो भी प्लास्टिक के डिब्बों में आते हैं.

प्लास्टिक के बग़ैर महीना गुज़ारने की मुहिम के तहत मैंने बाहर से ब्रेड लेने के बजाय उन्हें घर में ही बनाने की सोची. काम तो उतना मुश्किल नहीं था, हां, देखने में वो ब्रेड इतनी अच्छी नहीं थी, जितनी बाज़ार की होती है.

अब रही बात अनाज की. तो वो प्लास्टिक के पैकेटों में आते हैं. मैंने अपने परिवार से कहा कि वो अनाज के पैकेट के बजाय हलवे से काम चलाएं. सबके मुंह इस बात पर फूल गए. फिर मैंने पास ही एक दुकान तलाशी, जो बिना प्लास्टिक की पैकिंग वाला अनाज बेचता था. वहां अपने डिब्बे ख़ुद लेकर जाना होता था, ताकि आप उसमें भर कर सामान ला सकें.

इन कोशिशों से मैंने सुबह के नाश्ते की जंग जीत ली थी.

दूसरा हफ़्ता: सुपरमार्केट

इसमें कोई दो राय नहीं कि अलग-अलग सामान लेने के लिए अलग दुकानों में जाना थकाऊ और बहुत वक़्त लेने वाला है. इसके बजाय एक ही बार में सुपरमार्केट जाकर ख़रीदारी करना आसान है.

तो, मैंने अपने बिना प्लास्टिक के जीने की मुहिम के साथ सुपरमार्केट जाने का फ़ैसला किया. आज की तारीख़ में तो हर सामान प्लास्टिक की थैली, पैकेट या डिब्बे में बंद होकर आता है नतीजा ये कि सुपरमार्केट में ऐसा सामान तलाशना, जो प्लास्टिक में पैक न हो, बहुत मुश्किल था.

सलाद से लेकर पास्ता और कच्ची सब्ज़ियां तक बिना प्लास्टिक की पैकिंग के खोजना मुश्किल था. इसके बजाय टिन के डिब्बों में बंद खाने की चीज़ें ख़रीदी गईं. घर से झोला ले जाकर मैंने कई सामान ख़ुदरा ख़रीदे.

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बोतल के पानी में प्लास्टिक

दिक़्क़त ये थी बच्चों के लिए जैम ख़रीदना हो, या चॉकलेट हैज़ेलनेट स्प्रेड. अगर डिब्बे कांच या टिन के थे, तो उनके ढक्कन प्लास्टिक वाले थे. इसी वजह से मैंने बच्चों की पसंद के कई सामान नहीं लिए.

कुल मिलाकर हालात दस बरस पहले वाले ही थे. खाने-पीने का ज़्यादातर सामान अब भी प्लास्टिक की पैकिंग में ही आ रहा था. ये मोर्चा बेहद मुश्किल रहा. हालांकि बहुत सी कंपनियों ने अब बिना प्लास्टिक की पैकिंग भी बाज़ार में उतारी है. मगर, फिलहाल उसकी तादाद बहुत कम है.

अब टोमैटो केचप गत्तों में आने लगे हैं. वहीं मांस को प्लास्टिक की जगह दूसरी चीज़ों से बनी थैलियों में पैक किया जा रहा है. इसी तरह फ्रोज़ेन फ़ूड भी प्लास्टिक के बजाय दूसरी पैकिंग में आने लगा है. आइसलैंड नाम की ब्रिटिश कंपनी ने 2023 तक अपनी पैकिंग में प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह ख़त्म करने का एलान किया है.

Image caption ब्रिटेन के समुद्री रिजॉर्ट ब्यूड से जुड़ी एवरिल सैन्सबरी

तीसरा हफ़्ता: समुद्री किनारे पर असर

मेरे तजुर्बे का आधा वक़्त बीत चुका था. तब हमने छुट्टियों में लंदन से कॉर्नवाल जाने का फ़ैसला किया. मैं रास्ते के लिए अपना दोबारा इस्तेमाल हो सकने वाला कप और बोतल रखना भूल गई. नतीजा ये हुआ कि पूरे रास्ते में हमें प्लास्टिक में पैक सामान लेना पड़ा.

ब्रिटेन में रोज़ाना 2 करोड़ दस लाख पानी की बोतलें और 68 लाख कॉफ़ी के कप एक बार इस्तेमाल करके फेंक दिए जाते हैं.

मैंने सोशल मीडिया की मदद ली और प्लास्टिक मुक्त जीवन की मेरी मुहिम दोबारा पटरी पर लौटी. आज सोशल मीडिया पर तमाम हैशटैग के साथ प्लास्टिक मुक्ति की मुहिम चलाई जाती हैं.

Image caption डेब रॉसर ब्रांडेड रीफिल वॉटर बोतल और कॉफी कप थामे हुए

2014 में ब्रिटेन के समुद्री रिजॉर्ट ब्यूड में प्लास्टिक के प्रदूषण से मुक्ति के लिए #2minutesbeachclean हैशटैग के साथ मुहिम चलाई गई थी. इससे जुड़ी एवरिल सैन्सबरी कहती हैं कि 'आज लोग काफ़ी जागरूक हो गए हैं. पहले घरों में प्लास्टिक के सामान भरे पड़े होते थे. आज उनकी तादाद काफ़ी कम हो गई है. लोग प्लास्टिक को यहां-वहां फेंकने से परहेज़ करते हैं.'

लेकिन ब्यूड रिजॉर्ट की एक ख़ूबी है. यहां आप किसी भी दुकान में चले जाएं, तो लोग आप की पानी की बोतल भर देंगे. इससे प्लास्टि की बोतलों में बंद पानी ख़रीदने का चलन कम हुआ है. समुद्री किनारों पर प्लास्टिक के कचरे के ढेर भी कम हुए है.

आज पूरे ब्रिटेन में पानी भरने के ऐसे 7800 सार्वजनिक नल लगाए गए हैं.

Image caption ब्यूड में समुद्र तट पर प्लास्टिक के छोटे टुकड़े

चौथा हफ़्ता: फ़ैसले की घड़ी

मेरे तजुर्बे के आख़िरी हफ़्ते में मैंने देखा कि प्लास्टिक में पैक टॉयलेट के सामान अभी भी हमारे घर में आ रहे हैं. हालांकि मैंने बांस के ब्रश ज़रूर ख़रीदे थे. लेकिन मुझे पता है कि उसके रेशे, प्लास्टिक के ही थे. हां, प्लास्टिक की शैंपू की बोतल की जगह मैंने शैम्पू बार ख़रीदा था.

महीने के आख़िर में मैंने देखा कि भले ही हमारी ज़िंदगी से प्लास्टिक पूरी तरह नहीं मिटा था. लेकिन, हम इसकी तादाद काफ़ी कम करने में कामयाब रहे थे. हां, ऐसा करने में वक़्त ज़्यादा लग रहा था. लेकिन, ये महंगा सौदा नहीं था.

कुल मिलाकर अब भी हमारे घर में काफ़ी सामान ऐसा आ रहा था, जो प्लास्टिक में पैक होता था. इसमें खाने-पीने का सामान ज़्यादा था.

Image caption वो 48 प्लास्टिक वस्तुएं जो हम एक महीने के दौरान इस्तेमाल करते हैं

आज तो हमारे दफ़्तर में भी फिर से इस्तेमाल हो सकते वाले कॉफी के मग और पानी की ग्लास इस्तेमाल हो रही हैं.

कुल मिलाकर, आज दस साल बाद भी मैंने ये पाया कि प्लास्टिक मुक्त जीवन नामुमकिन और अव्यवहारिक है. हां, बदलाव तेज़ी से आ रहा है. तमाम कंपनियां अपने सामान ऐसी पैकिंग में ला रही हैं, जो प्लास्टिक में न हो. दुकानों में लोग दोबारा झोला लेकर जाने लगे हैं. कॉफ़ी और पानी पीने के लिए ऐसे कप और बोतलें प्रयोग की जा रही हैं, जिनका दोबारा इस्तेमाल हो सके.

यानी अभी भले ये मुमकिन न हो, पर शायद अगले कुछ सालों में हम प्लास्टिक के बग़ैर जीना सीख लेंगे.

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