शंभू सांड़ के मारे जाने पर 11 साल पहले ब्रिटेन में मचा था हंगामा

  • 10 अगस्त 2018
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हिंदुस्तान में इस वक़्त गोरक्षा और गोहत्या को लेकर ख़ूब सियासत हो रही है. आज से 11 साल पहले ब्रिटेन में भी इस मुद्दे पर ज़बरदस्त हंगामा हुआ था.

बीबीसी के रेडियो प्रोग्राम विटनेस में साइमन वॉट्स ने ये क़िस्सा सुनाया. बात जुलाई 2007 की है. जब एक सांड़ को लेकर ब्रिटेन में रह रहे हिंदू और वहां की सरकार आमने-सामने आ गए थे.

ब्रिटेन के वेल्स सूबे में हिंदू समुदाय के लोग सरकार के एक फ़ैसले से भड़क उठे थे. एक सांड़ को टीबी होने की वजह से सरकारी नियम के हिसाब से मारा जाना था. लेकिन स्थानीय हिंदू समुदाय को सरकार का ये फ़ैसला मंज़ूर नहीं था.

वजह थी, उस सांड़ का नाम-शंभू. ये सांड़ वेल्स के स्कंद वेल नाम के मठ में रहता था. मठ में 15-20 गाय-बैल पाले जा रहे थे. शंभू इन्हीं में से एक था.

मगर, अप्रैल 2007 में उसे टीबी होने का पता चला. उस वक़्त वेल्स इलाक़ में जानवरों के बीच टीबी की बीमारी बहुत फैल रही थी. ब्रिटिश सरकार का नियम था कि जिस भी जानवर में टीबी पाई जाती थी, उसे मार दिया जाता था, ताकि वो दूसरे जानवरों में न फैले. क्योंकि टीबी संक्रामक बीमारी होती है.

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क्या टीबी होने पर इंसान को मार देते हैं?

स्कंद वेल आश्रम के स्वामी सुरैयानंद की निगरानी में ही शंभू और दूसरे जानवरों को आश्रम में पाला-पोसा जा रहा था.

स्वामी सुरैयानंद का कहना था कि हिंदू मान्यताओं के मुताबिक़ जानवरों में भी भगवान बसते हैं. इसीलिए उनके नाम देवताओं के नाम पर रखे जाते हैं. जैसे कि, शंभू नाम, जो कि शिव का एक नाम है, उसका मतलब होता है पवित्र हंस.

लेकिन, जब टीबी की वजह से शंभू को मारने का फ़ैसला किया गया, तो स्थानीय हिंदू भड़क उठे. उन्होंने इसे अपनी आस्था के साथ छेड़खानी बताया.

सौ से ज़्यादा संत और हिंदू धर्म के अनुयायियों ने शंभू को बचाने के लिए प्रदर्शन किया. इन लोगों का सवाल था कि जब हमारे किसी परिजन या रिश्तेदार को टीबी हो जाती है, तो, क्या हम उन्हें मार देते हैं?

शंभू को बचाने के लिए वेल्स के हिंदू समुदाय ने हस्ताक्षर अभियान छेड़ दिया. उसे बचाने के लिए कोर्ट जाने की तैयारी की जाने लगी. इसके लिए ब्रिटेन में रह रहे हिंदू चंदा जमा करने लगे.

स्वामी सुरैयानंद का कहना था कि अगर हम शंभू को बचाने की कोशिश नहीं करते, तो इसका ये मतलब था कि हम अपनी नैतिक ज़िम्मेदारियों से भाग रहे थे.

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क्यों शंभू को मारने का लिया गया फ़ैसला?

जिस वक़्त वेल्स के हिंदू शंभू को बचाने की मुहिम छेड़े हुए थे, उस वक़्त वेल्स के ग्रामीण इलाक़ों में गायों के बीच टीबी की बीमारी बहुत ज़्यादा फैल रही थी.

ऐसे में शंभू को यूं ही छोड़ देने से दूसरे गायों-बैलों के इस बीमारी के शिकार होने का डर था. बीमारी को बढ़ने से रोकने के लिए इसके शिकार जानवरों को मारने का काम शुरू कर दिया गया था.

लेकिन, स्कंद वेल के हिंदू शंभू की बलि देने के लिए तैयार नहीं थे. सो, उन्होंने शंभू को अपने आश्रम के अंदर ही रखने का फ़ैसला किया. शंभू के लिए एक अलग बाड़ा तैयार किया गया, ताकि उसे देखने आने वाले उसे छू भी न सकें.

उसके रख-रखाव के लिए बाड़े में जाने वाले लोग भी काफ़ी एहतियात रख रहे थे. हर बार बाड़े में आने जाने के बाद वो कीटनाशक से ख़ुद को साफ़ करते थे, ताकि बोवाइन टीबी के कीटाणु उनके साथ न फैलें.

शंभू को मंदिर परिसर के अंदर रखने की वजह से वेल्स की पुलिस के लिए उसे आश्रम से बाहर ले जाने की चुनौती और भी बड़ी हो गई. अगर शंभू के भक्तों की पुलिस से झड़प होती, तो उससे वेल्स और ब्रिटेन की बहुत बदनामी होती. आरोप लगते कि ब्रिटेन में हिंदुओं से भेदभाव हो रहा है. उनकी आस्था से खिलवाड़ किया जा रहा है.

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शंभू को बचाने का अभियान

स्वामी सुरैयानंद ने बीबीसी को बताया कि शंभू को चारों तरफ़ से लकड़ी से घिरे बाड़े में रखा गया था, ताकि उसका दूसरे जानवरों से संपर्क न हो.

मंदिर के बाहर बोर्ड लगा दिया गया कि यहां पर पवित्र सांड़ शंभू का मंदिर है. उसे देखने आने वालों की संख्या अचानक बढ़ गई. स्कंद वेल में रोज़ उसकी पूजा होती थी. उसे फूलों के हार पहनाए जाते और आरती उतारी जाती.

शंभू को बचाने के लिए संतों की मुहिम दुनिया भर में सुर्ख़ियां बटोर रही थी. उसको बचाने के लिए चलाए गए हस्ताक्षर अभियान को 20 हज़ार से ज़्यादा लोगों का समर्थन मिला. स्कंद वेल ने शंभू की पूजा-अर्चना का लाइव वेबकास्ट करना शुरू कर दिया. इसे दुनिया भर में लाखों लोग देखने लगे थे. यानी दुनिया भर में "पवित्र सांड़" शंभू की शोहरत बढ़ रही थी.

कोर्ट का फ़ैसला

वहीं, स्कंद वेल के वक़ील कोर्ट में उसे बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे. निचली अदालत ने शंभू को मारने की वेल्स सरकार के आदेश पर रोक लगा दी. लेकिन, सरकार ने हाई कोर्ट में अपील की. हाई कोर्ट ने निचली अदालत का फ़ैसला पलट दिया.

हाई कोर्ट ने कहा कि हालांकि ये लोगों की आस्था में दख़ल है. लेकिन, एक तेज़ी से बढ़ रही बीमारी से लड़ने के लिए आस्था में इस मामूली दख़ल को ग़लत नहीं कहा जा सकता.

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि स्थानीय पशुधन को बीमारी से बचाने के लिए उन जानवरों को मारना ज़रूरी है, जिनसे जानवरों की टीबी फैलने का डर है.

हाई कोर्ट के आदेश के बाद स्कंद वेल आश्रम के पास कोई चारा नहीं बचा था. अदालती लड़ाई हारने के बाद संतों ने आस्था से सरकारी आदेश का मुक़ाबला करने की ठानी. उन्होंने शंभू के बाड़े के सामने एक छोटा सा मंदिर बना दिया. तमाम श्रद्धालुओं ने उस बाड़े को घेर लिया और भजन-कीर्तन शुरू कर दिया.

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जब पुलिसवाले आश्रम पहुंचे...

स्वामी सुरैयानंद बताते हैं कि अदालत के आदेश के बाद वेल्स पुलिस का एक दस्ता शंभू को आश्रम से ले जाने के लिए आया. लेकिन उनके पास वारंट नहीं था. तभी एक पुलिसवाला आया और भजन-कीर्तन कर रहे लोगों पर चीखने लगा कि हमारे पास शंभू को ले जाने का वारंट है और तुम सब रास्ते से हट जाओ.

लेकिन, भजन कर रहे लोगों ने पुलिसवाले की अनदेखी कर दी और कीर्तन करते रहे. थोड़ी देर बाद पुलिस की और टीमें वहां आकर इलाक़े को घेरने लगीं. वहां जमा लोगों को हटाया जाने लगा. एक पुलिसवाले ने आकर स्वामी सुरैयानंद से कहा कि आप हमारे रास्ते से हट जाएं क्योंकि हम सांड़ को ले जाने आए हैं. इसके बाद स्वामी सुरैयानंद ने ख़ुद को पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस की आशंका के विपरीत उन्हें ज़्यादा विरोध का सामना नहीं करना पड़ा. स्वामी सुरैयानंद बताते हैं कि कई पुलिस वाले तो हमारी आस्था देखकर ही हैरान रह गए. शंभू के बाड़े को अच्छे से सजाया गया था. लोग जज़्बाती हो रहे थे. भजन-कीर्तन भी जारी था. हालांकि पुलिस की किसी से झड़प नहीं हुई.

पुलिसवालों ने शंभू के बाड़े में लगे सजावट के कपड़े हटाए. उन्हें सलीक़े से तह कर के अलग रखा. फिर उसके बाड़े के सामने लगा शीशा हटाया.

शंभू की अंतिम विदाई

स्वामी सुरैयानंद बताते हैं कि जब पुलिस अपना काम कर रही थी, तो वो सब पुलिस के घेरे में शांत खड़े हुए थे. पुलिसवालों ने बाड़े के खिड़की-दरवाज़े काटे और अंदर दाखिल हुए.

शंभू को घोड़ा गाड़ी में लाद कर क़साईख़ाने ले जाया गया. शंभू को बचाने की मुहिम जिस नाटकीय अंदाज़ में शुरू हुई थी, उसी तरह उसका अंत भी हो गया. संत और दूसरे श्रद्धालु शंभू को क़त्ल के लिए ले जाए जाने का शोक मना रहे थे. वहीं फूल-मालाएं पहने हुए शंभू बड़े आराम से ट्रक में सवार हो गया.

स्वामी सुरैयानंद बताते हैं कि पूरा माहौल ऐसा था जैसे किसी का अंतिम संस्कार हो रहा हो. पुलिसवाले क़तार में खड़े थे. जैसे वो शंभू की पवित्रता का सम्मान कर रहे हों.

स्वामी सुरैयानंद के मुताबिक़ वो भी बड़े जज़्बाती हो गए थे. क्योंकि, जिस मुहिम को वो पिछले कई महीनों से चला रहे थे, वो अब ख़त्म हो गई थी. शंभू को क़साईख़ाने ले जाया जा रहा था.

पुलिस ने बाद में बताया कि 27 जुलाई 2007 को शंभू को मार दिया गया.

(बीबीसी रेडियो पर इस स्टोरी को अंग्रेज़ी में सुनने के लिए यहां क्लिक करें)

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