विवेचना: याहया की अय्याशी की वजह से पाकिस्तान हारा था 1971 का युद्ध?

  • 21 अक्तूबर 2018
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3 दिसंबर, 1971 की दोपहर को जैसे ही जनरल याहया ख़ान अपनी जीप से वायुसेना हेडक्वार्टर्स जाने के लिए चले, एक बहुत बड़ा गिद्ध उनकी जीप के सामने आ कर बैठ गया.

याहया के बग़ल में बैठे जनरल हामिद ने धीरे-धीरे जीप बढ़ानी शुरू की, लेकिन गिद्ध ने हिलने का नाम नहीं लिया. उन्होंने हॉर्न बजाया, लेकिन गिद्ध ने उतनी ही हिकारत से उन्हें घूरा. याहया ने भी जीप से कूद कर अपने बेंत से उसे भगाने की कोशिश की, लेकिन गिद्ध टस से मस नहीं हुआ.

माजरा देख कर पास काम कर रहा माली दौड़ता हुआ आया और उसने बहुत मुश्किल से अपने फावड़े से गिद्ध को याहया के रास्ते से हटाया.

बाद में उस समय याहया ख़ान के एडीसी अर्शद समी ख़ान ने अपनी आत्मकथा 'थ्री प्रेसिडेंट्स एंड एन एड' में लिखा, "मैं अंधविश्वासी नहीं हूँ, लेकिन 3 दिसंबर, 1971 की दोपहर का वो दृश्य बार-बार मेरी आँखों के सामने कौंधता है जब एक गिद्ध ने जनरल याहया ख़ान की जीप का रास्ता रोक लिया था, मानो कोई ऊपरी ताक़त उन्हें बताने की कोशिश कर रही हो कि युद्ध पर जाने का फ़ैसला सही फ़ैसला नहीं है."

रंगीले याहया ख़ा

याहया ख़ान हालांकि फ़ारसी बोलने वाले पठान थे, लेकिन वो बहुत अच्छी पंजाबी भी बोल लेते थे. वो हाज़िर जवाब शख़्स थे और उनका 'सेंस ऑफ़ ह्यूमर' बहुत अच्छा था. वो न तो इस बात का दावा करते थे कि वो बहुत बड़े बुद्धिजीवी थे और न ही वास्तव में वो ऐसे थे.

पाकिस्तान के शासकों पर किताब 'पाकिस्तान एट द हेल्म' लिखने वाले तिलक देवेशर बताते हैं, "याहया ख़ान एक तो बहुत रंगीले आदमी थे. उनको शराब पीने का भी बहुत शौक था. अधिक शराब पीने से जो अवगुण किसी शख़्स में आ सकते हैं वो सब उनमें मौजूद थे. उनका स्तर एक डिवीजनल कमांडर का था. उससे ऊपर उन्हें नहीं जाना चाहिए था."

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Image caption 'पाकिस्तान एट द हेल्म' लिखने वाले तिलक देवेशर बीबीसी स्टूडियो में

तिलक देवेशर बताते हैं, "जब जनरल मूसा रिटायर हुए तो अयूब ने तीन जनरलों को सुपरसीड कर उन्हें सेनाध्यक्ष बनाया था. मूसा ने कहा भी था कि याहिया सैनिक रूप से तो ठीक हैं, लेकिन उनकी जो दूसरी गतिविधियाँ हैं, उसकी वजह से वो सेनाध्यक्ष नहीं बन सकते. जब अयूब ख़ान ने कहा था कि तुम उसकी फ़िक्र मत करो, वो अपने को संभाल लेंगे."

"अयूब ने उन्हें इसलिए चुना क्योंकि उन्हें लगा कि वो उनके लिए ख़तरा नहीं होंगे. उनकी बौद्धिक क्षमता भी ऐसी नहीं थी कि वो भुट्टो और मुजीब को डील कर पाते. याहिया ख़ुद भी कहा करते थे कि मैं अपने आप को सरलता और धर्मनिष्ठा के नमूने के तौर पर नहीं दिखाना चाहता. एक पापी शख़्स के तौर पर मेरे निजी चरित्र में कई खोट हैं जिसके लिए मैं अल्लाह से माफ़ी चाहता हूँ."

रात 10 बजे के बाद दिए याहया के आदेशों को नहीं माना जाता था

याहया ख़ान शराब पीने के लिए इतने बदनाम थे कि सैनिक कमांडरों को निर्देश दिए गए थे कि वो उनके ऐसे किसी मौखिक आदेश का पालन न करें जो रात के 10 बजे के बाद दिए गए हों.

तिलक देवेशर बताते हैं, "सब को मालूम था कि याहया शाम आठ बजे से शराब पीना शुरू कर देते थे और 10 बजे तक काबू से बाहर हो जाते थे."

"पाकिस्तान के चीफ़ ऑफ़ द स्टाफ़ जनरल अब्दुल हमीद ख़ान ने राज्यों के आला सैनिक अधिकारियों को ताक़ीद कर रखी थी कि रात दस 10 के बाद दिए गए राष्ट्रपति के मौखिक आदेशों का तभी पालन किया जाए जब अगले दिन वो खुद उसकी पुष्टि राष्ट्रपति कार्यालय से कर लें."

"मिलिट्री चेन ऑफ़ कमांड में आपका प्रेसिडेंट हुकुम दे रहा है और वरिष्ठ सैन्य अधिकारी कह रहे हैं कि हुकुम मत मानो, क्योंकि पता नहीं किस हालत में आपने हुकुम दिया है."

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Image caption याहया की अय्याशी का तरीका यह था कि वो शराब पीने के लिए बड़ी और नामी हस्तियों को अपनी हाउस वार्मिंग पार्टी में बुलाते थे

याहया की हाउ वार्मिंग पार्टी

हसन अब्बास अपनी किताब 'पाकिस्तान्स ड्रिफ़्ट इन टू एक्सट्रीमिज़्म' में याहया की अय्याशी का उदाहरण देते हुए लिखते हैं, "1971 में पाकिस्तान के 'सरेंडर' से कुछ दिन पहले याहया ने पेशावर में बने अपने नए घर पर एक 'हाउस वार्मिंग' पार्टी दी. बुलाए गए मेहमानों में से एक थीं एक बंगाली महिला श्रीमती शमीम जिन्हें 'ब्लैक पर्ल' के नाम से जाना जाता था."

"याहया ने उनको ऑस्ट्रिया में पाकिस्तान का राजदूत भी नियुक्त किया था. जैसे-जैसे पार्टी परवान चढ़ती गई, लोगों ने शराब के नशे में अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए. एक समय ऐसा आया कि सभी लोग बिना कपड़ों के थे, सिवाए याहया के सैनिक सचिव मेजर जनरल इशाक के. तभी 'ब्लैक पर्ल' ने इच्छा प्रकट की कि वो अपने घर जाना चाहेंगी. याहया ने ज़ोर दिया कि वो उसी हालत में उन्हें खुद ड्राइव करके उन्हें उनके घर छोड़ने जाएंगे."

"जनरल इशाक पाकिस्तान को तो नहीं बचा पाए, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के मन में इतनी सद्बुद्धि भर दी कि वो बाहर निकलने से पहले अपनी पैंट पहन लें."

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इंदिरा गांधी ने छत्तीस का आंकड़ा

याहया को इंदिरा गांधी से सख़्त नफ़रत थी. निज़ी ज़िंदगी में वो उन्हें 'दैट वूमैन' यानी 'वो औरत' कह कर पुकारते थे.

पाकिस्तान के विदेश सचिव रहे सुल्तान मोहम्मद ख़ान अपनी आत्मकथा 'मेमोरीज़ एंड रेफ़्लेक्शन्स ऑफ़ अ पाकिस्तानी डिप्लोमैट' में लिखते हैं, "जब याहया की रूस यात्रा के दौरान रूस के राष्ट्रपति पोडगोर्नी ने ज़ोर दे कर कहा कि आपको इंदिरा गाँधी से मिलना ही होगा तो याहया ने साफ़ शब्दों में जवाब दिया कि कोई भी मुझे इस बैठक के लिए बाध्य नहीं कर सकता."

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वो आगे लिखते हैं, "पोडगोर्नी ने मेज़ पर हाथ मारते हुए दोहराया, 'आप दोनों को मिलना ही होगा.' इस पर याहया ख़ान ने मेज़ पर इतनी ज़ोर से हाथ मारा कि बग़ल में रखे वाइन के ग्लास से छलक कर शराब की कुछ बूंदें मेज़ पर गिर गईं. याहिया बोले, 'मैं भारत की प्रधानमंत्री से किसी भी हालत में मिलने के लिए तैयार नहीं हूँ.'

इसके बाद पूरे कमरे में सन्नाटा सा छा गया. थोड़ी देर बाद दोनों तरफ़ के राजनयिकों ने महसूस किया कि बात बिगड़ रही है. उन्होंने तुरंत एक-दूसरे के लिए जाम उठा कर बात को संभाला."

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Image caption अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ख़ास मौकों पर पाकिस्तान के जनरल याहया ख़ान को अपने व्हाइट हाउस बुलाते थे

किसिंजर की नज़र में याहया का 'आई क्यू' साधारण

अमरीका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के मन में याहया ख़ान के लिए बहुत 'सॉफ़्ट कॉर्नर' था, लेकिन उनके विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर पर याहया कोई ख़ास असर नहीं डाल पाए थे.

किसिंजर अपनी आत्मकथा 'द वाइट हाउस इयर्स' में लिखते हैं, "मैंने निक्सन को बताया कि याहया और उनकी टीम को ऊँचे 'आई क्यू' के लिए कोई पुरस्कार नहीं दिया जा सकता."

"वो हमारे लिए वफ़ादार हैं, स्पष्टवादी भी हैं, लेकिन उनमें ये समझने की बौद्धिक क्षमता ही नहीं है कि क्यों पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान का हिस्सा नहीं होना चाहिए. उन्हें इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि भारत युद्ध की तैयारी कर रहा है. और अगर इसका थोड़ा बहुत अंदाज़ा उनको था भी तो उन्हें ये ख़ुशफ़हमी थी कि जीत उनकी ही होगी."

"मैंने दबी ज़ुबान से उनसे पूछने की कोशिश भी की कि आप भारत के संख्य़ा में अधिक सैनिकों और हथियारों का सामना कैसे करेंगे? उनका जवाब था कि मुस्लिम सैनिक भारतीय सैनिकों से बेहतर लड़ाका हैं."

"उस दिन याहया शराब के नशे में हर मेहमान के पास जा कर पूछ रहे थे, क्या मैं आपको 'डिक्टेटर' दिखाई देता हूँ? जब उन्होंने मुझसे भी यही सवाल किया तो मैंने जवाब दिया, मुझे पता नहीं राष्ट्रपति महोदय, लेकिन आप अगर 'डिक्टेटर' हैं भी, तो आपको पता ही नहीं था कि चुनाव किस तरह लड़वाया जाता है."

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Image caption मलका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ को याहया 'नूरी' कह कर पुकारते थे

याहया थे 'लेडीज़ मैन'

याहया ख़ान को 'लेडीज़ मैन' कहा जाता था. कई महिलाओं के साथ उनकी दोस्ती थी. उनकी सबसे नज़दीक महिला दोस्त थीं अक्लीम अख़्तर जो 'जनरल रानी' के नाम से मशहूर थीं.

मलका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ को याहया 'नूरी' कह कर पुकारते थे. वो भी याहया को 'सरकार' कह कर बुलाती थीं. महिलाओं के साथ उनके संबंधों को ले कर एक बार बहुत बड़ी प्रोटोक़ॉल समस्या उठ खड़ी हुई थी.

एक ज़माने में पाकिस्तान में बीबीसी के संवाददाता रहे ओवेन बेनेट जोंस अपनी किताब 'पाकिस्तान: आई ऑफ़ द स्टॉर्म' में लिखते हैं, "एक बार ईरान के शाह पाकिस्तान के सरकारी दौरे पर वहाँ पहुंचे. जब उनके लौटने का समय आया तो उन्हें देर होने लगी क्योंकि याहिया अपने शयनकक्ष से बाहर ही नहीं निकल रहे थे."

"अंतत: 'उनकी नज़दीकी दोस्त जनरल रानी को मनाया गया कि वो उनके बेडरूम में जा कर उन्हें बाहर लाएं. जब वो अंदर घुसीं तो उन्होंने उन्हें अपने बिस्तर पर पाकिस्तान की एक मशहूर गायिका के साथ पाया."

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Image caption याहया ख़ान के बेटे अली याहया ख़ान की शादी में पहुंचे अर्शद समी ख़ान

तोहफ़े देने के शौकीन

याहया के मानवीय पक्ष के बारे में बहुत कम लोगों को पता है. उन्हें तोहफ़े देने का बहुत शौक था. और हां, इसके लिए वो सरकारी पैसे के बजाए अपना खुद का पैसा ख़र्च करते थे.

अर्शद समी ख़ाँ ने मुझे बताया था, "जैसे ही याहया राष्ट्रपति बने, उन्होंने मुझे निर्देश दिए कि मैं हमेशा अपने साथ कुछ उपहार तैयार रखूँ जिन्हें वो स्थानीय और विदेशी मेहमान को दे सकें."

"एक बार बेगम याहया की एक दोस्त ढाका से मिलने उनके पास आईं. वो उनके साथ राष्ट्रपति भवन के दालान में बैठ कर चाय पी रही थीं. तभी याहया गोल्फ़ खेल कर वापस लौटे. बेगम याहया ने उनसे फ़ारसी में कहा, आज मेरी दोस्त का जन्मदिन है. याहया बोले, मैं आपको तोहफ़े में क्या दे सकता हूँ? उस महिला ने बहुत सकुचाते हुए कहा, अगर आप तोहफ़ा देने के लिए इतना ज़ोर दे रहे हैं, तो अपनी इस्तेमाल की हुई कोई चीज़ मुझे दे दीजिए."

"याहया ने कहा, इस समय तो मेरे पास ये गोल्फ़ टी शर्ट, पैंट और जूते हैं. ये चीज़े किसी महिला को नहीं दी जा सकतीं. मेरे पास एक टावल रुमाल भी है जो मेरे पसीने से भरा हुआ है. हाँ एक चीज़ है मेरे पास आपके लिए. आप अपनी आँखें बंद करें और अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाएं. उस महिला ने अपनी आँखें बंद कीं और झिझकते हुए याहया की तरफ़ अपना हाथ आगे बढ़ा दिया."

"याहिया ने अपने हाथ से सोने की 'ओएस्टर रोलेक्स' घड़ी उतारी और उस महिला की कलाई में पहना दी. आँखें खोलते ही उस महिला ने विरोध करते हुए कहा, मैं तो आपसे एक रुमाल की उम्मीद कर रही थी. ये तो बहुत मंहगी चीज़ है. आप इसे वापस ले लीजिए. याहया हंसते हुए बोले, एक बार दिए जाने के बाद तोहफ़ा वापस नहीं लिया जाता."

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Image caption अपने बंकरों में भारतीय सैनिकों का इंतज़ार करते पाकिस्तानी सैनिक

1965 के युद्ध में जीत का मौका गंवाया

एक सैनिक अधिकारी के रूप में याहया ने कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया- इंस्ट्रक्टर, स्टाफ़ कॉलेज, क्वेटा, डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन, डिवीजन कमांडर और चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़.

मैंने तिलक देवेशर से पूछा कि आप एक सैनिक कमांडर के रूप में याहया ख़ान को किस तरह आंकते हैं? देवेशर का जवाब था, "देखिए उनका सैनिक करियर बहुत अच्छा था, लेकिन हर आदमी के जीवन में एक समय आता है उनकी परीक्षा लेने का."

"याहया के सामने ये मौका आया 2 सितंबर, 1965 को, जब उन्हें अख़नूर पर हमला करने का कमांड दिया गया. पहले कोई और डिविजनल कमांडर थे. उनकी जगह याहया को कमांडर बनाया गया. अख़नूर सिर्फ़ 10 किलोमीटर की दूरी पर था. पाकिस्तानी सेनाएं आगे बढ़ रही थीं."

"ग्रैंड स्लैम योजना का मुख्य बिंदु ही यही था कि पाकिस्तानी सेना जोरियाँ को बाई पास कर सीधे अख़नूर की तरफ़ जाए. क्योंकि एक बार अख़नूर गिर जाता है तो भारतीय सेनाओं का कश्मीर का रास्ता कट जाएगा. लेकिन जब याहया ख़ान को ये मौका मिला तो उन्होंने कहा कि मैं पहले अख़नूर पर हमला नहीं करूंगा, पहले जोरियाँ पर कब्ज़ा करूंगा."

"इसकी वजह से भारतीय सेना को 36 घंटे मिल गए और उन्होंने अख़नूर का रक्षण मज़बूत कर लिया. पाकिस्तानी अख़नूर को नहीं ले पाए और ग्रैंड-स्लैम प्लान वहीं तहस-नहस हो गया."

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निक्सन से आधी रात फ़ोन पर बातचीत

13 दिसंबर, 1971 तक ये बिल्कुल स्पष्ट हो गया था कि पाकिस्तान पूर्वी मोर्चे पर बुरी तरह पिछड़ रहा है. जब चीन से मदद की सारी उम्मीदें ख़त्म हो गईं तो याहया ने मजबूरन अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को फ़ोन मिलाया.

अर्शद समी ख़ान अपनी किताब 'थ्री प्रेसिडेंट एंड एन एड' में लिखते हैं, "याहया ने जब निक्सन को फ़ोन किया तो वो किसी मीटिंग में थे. 13, दिसंबर 1971 की रात 02 बजे राष्ट्रपति भवन के टेलीफ़ोन ऑपरेटर ने मुझे फ़ोन किया कि राष्ट्रपति निक्सन लाइन पर हैं. मैंने 'इंटरकॉम' से फ़ोन कर याहया को जगाया."

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अर्शद समी ख़ान आगे अपनी किताब में लिखते हैं, "नींद में चूर याहया ने फ़ोन उठाया. लाइन बहुत ख़राब थी. इसलिए याहया ने मुझसे कहा कि मैं दूसरी लाइन पर सारी बातें सुनूँ और अगर लाइन टूट जाए तो निक्सन से बात करना जारी रखूँ."

"निक्सन की बातों का लब्बोलुआब था कि वो पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए बहुत चिंतित हैं और उन्होंने उसकी मदद के लिए सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया है. जैसे ही निक्सन ने फ़ोन रखा, याहिया ने मुझसे कहा कि मैं जनरल हमीद को तुरंत फ़ोन लगाऊँ. जैसे ही हमीद ने फ़ोन उठाया याहया लगभग चिल्लाते हुए बोले, 'हैव डन इट. अमेरिकंस आर ऑन देयर वे.''

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रंगीले जनरल याहिया ख़ाँ का उथलपुथल भरा जीवन

पूर्व का रक्षण पश्चिम में

अमरीकी बेड़ा अगले दिन तो दूर ढाका के गिरने तक बंगाल की खाड़ी में नहीं पहुंचा. इस हार के लिए याहया की थ्योरी कि 'पूर्व की रक्षा पश्चिम से होगी' को ज़िम्मेदार ठहराया गया.

तिलक देवेशर बताते हैं, "ये वास्तव में अयूब ख़ान की रक्षा रणनीति थी. उनका मानना था कि हमारी फ़ौज इतनी बड़ी नहीं है. अगर सेना को दो हिस्सो में बांट दिया गया और पाकिस्तान के दोनों हिस्सों में बराबर-बराबर तैनात किया गया, तो कोई भी हिस्सा भारत के हमले को सह नहीं पाएगा और भारत को वॉक ओवर मिल जाएगा."

"अगर भारत पूर्व में हमला करेगा तो हम पश्चिम में उस पर जवाबी हमला बोलेंगे. जब पूर्वी पाकिस्तान गिर गया तो याहया ने कहा कि हम युद्ध विराम करेंगे. नियाज़ी लड़ना चाहते थे, लेकिन याहया ने कहा कि इससे पश्चिमी पाकिस्तान ख़तरे में पड़ जाएगा.."

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Image caption 1971 युद्ध में हथियार डालने से पहले जनरल नियाज़ी जगजीत सिंह अरोड़ा के साथ

नियाज़ी की नज़र में याहया थे 1971 के असली विलेन

कई साल पहले जब मैंने जनरल नियाज़ी से संपर्क किया तो उन्होंने भी 1971 की हार का ठीकरा जनरल याहया के सिर पर ही फोड़ा. उन्होंने कहा, "अल्लाह ग़ारत करे याहया को कि हमने जीती हुई बाज़ी हार दी. ये शिकस्त मग़रिब में थी और लानत हम पर पड़ी. मैं जब लड़ रहा ता मैंने 13 तारीख़ को हुक्म दिया, आख़िरी गोली आख़िरी आदमी. ये हुक्म फ़ौज के लिए मौत का वारंट होता है."

"मग़रबी (पश्चिम) पाकिस्तान वालों को लगा कि ये लड़ाई तो लंबी होगी. वो मग़रबी (पश्चिम) पाकिस्तान पर हुकूमत करना चाहते थे. 13 तारीख़ को उनका हुकुम आया, स्टॉप फ़ाइटिंग एंड सरेंडर. इस तरह मग़रबी (पश्चिम) पाकिस्तान को बचाने के लिए हमें मशरकी (पूर्व) पाकिस्तान देना पड़ा."

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Image caption जीत का जश्न मनाते भारतीय सैनिक

हार की ख़बर ऑल इंडिया रेडियो से मिली

दिलचस्प बात ये है कि इस हार की ख़बर पाकिस्तानी लोगों को ऑल इंडिया रेडियो से मिली. रेडियो पाकिस्तान ने उस दिन अपने शाम 5 बजे के समाचार बुलेटिन में कहा, "भारत और पाकिस्तान के कमांडरों के बीच सहमति के बाद पूर्वी क्षेत्र में लड़ाई रुक गई है और भारतीय सैनिकों ने ढाका में प्रवेश कर लिया है."

उस दिन याहया ने देश को संबोधित ज़रूर किया, लेकिन उसमें हार का कोई ज़िक्र नहीं था. याहया बोले, "इतनी बड़ी जंग में किसी एक महाज़ पर वक़्ती तौर पर पीछे हटने का ये मतलब हरग़िज़ नहीं है कि लड़ाई ख़त्म हो चुकी है. भारत के साथ लड़ाई जारी रहेगी. इंशा अल्लाह आख़िरी फ़तह हमारी ही होगी..."

तिलक देवेशर कहते हैं, "पाकिस्तान का प्रापगैंडा हमेशा झूठ पर मबनी था- 1965 में भी और 1971 में भी. लोगों को बताया गया था कि पाकिस्तानी सेनाएं ज़मीन, आसमान और समंदर में हर जगह फ़तह पर फ़तह पा रही हैं."

"15 दिसंबर तक यही कहानी चली. लेकिन जब वो सरेंडर करने लगे तो उनके सामने समस्या आई कि लोगों को क्या बताया जाए. पहले तो उन्होंने अपने लोगों को बताया ही नहीं. फिर याहया ने देश को संबोधित किया और कहा कि हम लड़ना जारी रखेंगे...."

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Image caption जीत के बाद भारतीय सैनिकों का स्वागत करते बांग्लादेशी

बंगालियों के बारे में ग़लतफ़हमी

याहया के शासन काल का सबसे अच्छा आकलन सत्तर के दशक में पाकिस्तान के विदेश सचिव रहे सुल्तान मोहम्मद ख़ान ने अपनी आत्मकथा 'मेमोरीज़ एंड रेफ़्लेक्शन्स ऑफ़ अ पाकिस्तानी डिप्लोमैट' में किया है.

सुल्तान लिखते हैं, "याहया ये विश्वास करने के लिए कतई तैयार नहीं थे कि भारत पूर्वी पाकिस्तान में हस्तक्षेप भी कर सकता है. उस समय पाकिस्तानी सेना के जनरलों को ये गुमान था कि वो ग़ैर लड़ाकू बंगालियों को महज़ एक छर्रे के बल पर झुका देंगे."

"इतिहास ने बाद में सिद्ध किया कि वो कितने ग़लत थे. इस लड़ाई के बाद पाकिस्तान का आकार आधा रह गया. उन्हें बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी और उस मानसिक आघात से उबरने में उन्हें बहुत समय लगा. एक राष्ट्रपति के रूप में एक बिखरी हुई आबादी का नेतृत्व करने की क़ाबलियत उनमें नहीं थी. अनैतिक राजनीतिज्ञों से निपटने और विश्व राजनीति के दांवपेचों को समझने की उनकी क्षमता भी बहुत सीमित थी."

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Image caption जुल्फ़िकार अली भुट्टो के सत्ता में आने के बाद याहया को एक रेस्ट हाउज़ में नज़रबंद कर दिया गया

जुल्फ़िकार अली भुट्टोने किया नज़रबंद

जुल्फ़िकार अली भुट्टो के सत्ता में आने के बाद याहया को खारियाँ के पास बन्नी के एक रेस्ट हाउस में नज़रबंद कर दिया गया. उन्हें किसी दोस्त या रिश्तेदार से मिलने की इजाज़त नहीं थी.

रेस्ट हाउस में मक्खियों, मच्छरों और सांपों का बोलबाला था. वहाँ कुछ समय के लिए ही पानी आता था और अक्सर बिजली चली जाती थी. भुट्टो के सत्ता से हटने के बाद ज़िआउल हक़ ने उन्हे नज़रबंदी से मुक्त किया.

10 अगस्त, 1980 को जनरल याहया ख़ान का देहावसान हो गया.

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