क्या इंसान अगली सदी देख भी पाएगा?

  • 30 मार्च 2019
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Image caption ऐसा नहीं लगता कि धरती पर पहले ऐसा नहीं हुआ.

क्या इंसानों का वही हाल होने वाला है जो डायनोसोर का हुआ था?

इस समय इंसान की नस्ल जलवायु परिवर्तन, परमाणु युद्ध, महामारी या धरती से उल्का पिंड के टकरा जाने के जानलेवा ख़तरों का सामना कर रही है.

रेडियो ब्राडकॉस्टर और दार्शनिक डेविड एडमंड्स ने इन मामलों के विशेषज्ञों से बात कर ये जानने की कोशिश की कि क्या इस शताब्दी के अंत तक इंसान का वजूद मिट तो नहीं जाएगा.

सबसे बड़ा ख़तरा क्या है?

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Image caption अगर समय के साथ जीवों की अन्य प्रजातियां लुप्त हुईं तो इंसान ही क्यों अपवाद? डोडो चिड़िया जो विलुप्त हो चुकी है.

ऑक्सफ़ोर्ड के फ्यूचर ऑफ़ ह्यूमैनिटीज़ इंस्टीट्यूट से जुड़े शोधकर्ता एंडर्स सैंडबर्ग के अनुसार,"मानव जाति के सामने लुप्त होने का ऐसा ख़तरा है जो पूरी कहानी ख़त्म कर देगा."

20वीं शताब्दी तक हम सोचते थे कि हम बहुत सुरक्षित जगह रह रहे हैं लेकिन अब स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है.

मानव जाति के लुप्त होने के ख़तरे, चिंताजनक रूप से बहुत अधिक और बहुत तरह के बढ़ गए हैं. इसके कुछ उदाहरण लिए जा सकते हैं.

उल्का पिंड के टकराने का ख़तरा

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1980 के दशक तक हमें नहीं लगता था कि आकाश से गिरने वाले उल्का पिंडों की वजह से धरती पर कोई महाविनाश आएगा.

लेकिन इसी दशक में वैज्ञानिक बाप-बेटे लुईस और वॉल्टर एवारेज़ ने एक अवधारणा रखी कि उल्का पिंडों की वहज से सारे डायनासोर मारे गए.

जब मैक्सिको की यूकटान खाड़ी में एक बड़े गढ्ढे का पता चला, इसके बाद हाल ही में वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय पैनल ने भी इस विचार का समर्थन किया है.

हालांकि उल्कापिंड के टकराने से विनाश की संभावना अभी बहुत दूर है, बल्कि उससे ज्यादा ख़तरा हम खुद पैदा कर रहे हैं.

जनसंख्या की अतिवृद्धि, स्रोतों का क्षय और जलवायु परिवर्तन

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Image caption शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर जनसंख्या वृद्धि रुक भी जाए तो भी जलवायु परिवर्तन में कमी नहीं आने वाली.

जलवायु परिवर्तन से आने वाले ख़तरों से हम परिचित हैं लेकिन लंदन विश्वविद्यालय की शोधकर्ता कैरिन कुल्हेमन जनसंख्या वृद्धि पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं.

घटते प्राकृतिक संसाधनों के साथ इसकी ख़बरें शायद ही सुर्खियां बनती हैं, क्योंकि हमें बुरा लगता है और इसलिए हम इस पर सोचना नहीं चाहते.

कैरिन के अनुसार, अन्य चीजें, जिससे इंसानी आबादी सामूहिक कब्र में दफ़्न हो सकती है, जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि का मसला भी आपसे में जुड़ा हुआ है.

उनके मुताबिक, जनसंख्या वृद्धि का जलवायु परिवर्तन पर ख़ासा असर है क्योंकि संसाधन ख़त्म हो रहे हैं और उनका दोहन बढ़ रहा है और ये जलवायु परिवर्तन को और भयावह बना रहा है.

वो कहती हैं कि अगर जनसंख्या वृद्धि रुक भी जाए तो जलवायु परिवर्तन को रोकना एक असंभव काम हो सकता है.

जैव विविधता का विनाश

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Image caption मधुमख्खियों की संख्या में आई भारी कमी ने पहले ही ख़तरे की घंटी बजा दी है.

कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि इस सदी के मध्य तक आते आते व्यावसायिक मछली पकड़ने के उद्योग के लिए समंदर में पर्याप्त मछलियां नहीं बचेंगी.

इसका मतलब है कि दुकानों में खरीदने के लिए मछली, चिप्स या फ़िश करी नहीं मिलेगी.

कीट पतंगे भी तेजी से लुप्त हो रहे हैं और इसके साथ ही चिड़ियों की कई किस्में ख़त्म हो रही हैं क्योंकि इनका भोजन वो कीट हैं जो अब बचे ही नहीं.

कैरिन कहती हैं कि हम नहीं जानते कि ख़त्म होती जैव विविधता का क्या असर होगा लेकिन ऐसा ज़रूर लगता है कि इसका हमारे ऊपर सबसे बुरा असर पड़ने वाला है.

महामारी

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Image caption फ्लू वायरस में लगातार प्रतिरोधक शक्ति का बढ़ता जाना वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है.

कैंब्रिज के सेंटर फॉर एक्सटेंशियल रिस्क से जुड़ी ललिथा सुंदरम बॉयोलॉजिकल ख़तरे का अध्ययन कर रही हैं.

वो कहती हैं कि 1918 में स्पैनिश फ्लू की महामारी के दौरान एक अनुमान के अनुसार, क़रीब आधी आबादी इसकी चपेट में आ गई थी और इसे पांच से 10 करोड़ लोगों की मौत हो गई थी.

महामारी तब होती है जब बड़े पैमाने पर विस्थापन होता हो, उस समय भी लोगों को युद्ध से वापस भेजा जा रहा था और वे दड़बे नुमा कमरों में रहते थे.

हालांकि वैक्सीन बनाने में हम पहले से अधिक कुशल हुए हैं लेकिन वैश्विकरण के अपने ख़तरे हैं.

स्पैनिश फ्लू के दौरान लोग ट्रेन और नावों से सफ़र करते थे, लेकिन हवाई यात्रा के इस दौर में महामारी के कहीं तेजी से फैलने की आशंका है.

सिरफ़िरों से ख़तरा

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Image caption मार्च 1995 में टोक्यो में दुनिया के विनाश में विश्वास रखने वाले एक सम्प्रदाय ने सरीन गैस से हमला किया था. इसमें मौके पर ही 12 लोग मारे गए थे.

मानव निर्मित विनाश के अधिकांश ख़तरों के पीछे कोई मंशा नहीं होती.

लेकिन विज्ञान और तकनीक के इस दौर में विनाशकारी हमलों की संभावना बढ़ रही है. उदाहरण के लिए सिंथेटिक बॉयोलॉजी का इस्तेमाल कर लैब में जानलेवा वायरस बनाना.

फ़्यूचर ऑफ़ लाइफ़ इंस्टीट्यूट में शोधकर्ता फ़िल टोरेस के अनुसार, अगर कोई विनाशकारी बटन हो जो सबकुछ नष्ट कर दे, तो ऐसे लोगों की कमी नहीं जो उस बटन को दबा देना चाहेंगे.

ये बटन दबाने वाले धार्मिक कट्टरपंथी हो सकते हैं जो ये मानते हैं कि उन्हें भगवान की ओर से दुनिया को नष्ट करने का आदेश मिला है ताकि उसे बचाया जा सके. जैसा जापान में हुआ.

फ़िल के अनुसार, ऐसे लोगों से भी ख़तरा है जो मानव जाति के विनाश को लेकर अपने अपने कारणों से खुद ही प्रेरित हो जाते हैं जैसे सार्वजनिक जगहों पर अंधाधुंध गोली बारी करने वाले.

ये सार्वजनिक या निजी स्तर पर सबको ख़त्म कर देने की इच्चा व्यक्त करने वाले लोग हो सकते हैं.

लेकिन इनकी संख्या कितनी होगी? एक अनुमान के मुताबिक, इस समय दुनिया में मानसिक बीमार (साइकोपैथ) लोगों की संख्या 30 करोड़ हो सकती है, इनमें से कई लोग ख़तरा बन सकते हैं.

परमाणु युद्ध

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Image caption परमाणु विस्फ़ोट से पैदा हुआ मशरूम के आकार का गुबार, जिसे आप निश्चित ही नहीं देखना चाहेंगे. (1971 में फ्रांस के परमाणु बम परीक्षण का दृश्य.)

परमाणु युद्ध हमें पूरी तरह नहीं ख़त्म कर सकता है, लेकिन इसका असर हो सकता है कि हमें ख़त्म कर दे.

ग्लोबल कैटोस्ट्रोफ़िक रिस्क इंस्टीट्यूट के सेथ बॉम के अनुसार, परमाणु विस्फ़ोट से धूल का गुबार वायुमंडल में बहुत ऊंचा जा सकता है.

ये गुबार दशकों तक वहां बना रह सकता है और सूरज की रोशनी को रोक सकता है.

परमाणु युद्ध के कारण, पहला असर बड़े पैमाने पर विनाश, फिर आर्थिक बाधाएं और अंत में वैश्विक पर्यावरण का बुरा असर हो सकता है.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस

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Image caption मशीन का कोड शून्य और 1 के अलग अलग संयोजन से बनता है.

आर्टिफ़िशियल ख़तरे कई तरह के हो सकते हैं. कम्प्यूटर की स्वतंत्र गणनाओं में दुर्घटनावश ख़राबी आ जाने से पूरी दुनिया का शेयर बाज़ार ढह सकता है जिससे अर्थयव्यवस्था नष्ट हो जाए या मशीनों के नियंत्रण से बाहर होने की कल्पाना सच हो जाए.

लेकिन एक बात जिससे विशेषज्ञ चिंतित हैं, वो है 'डीप फ़ेक वीडियो' जिसमें किसी मशहूर व्यक्ति के फ़ुटेज से इस तरह छेड़छाड़ की जाती है कि वो ऐसा करते हुए या कहते हुए दिख सकता है जैसा उस वीडियो को बनाने वाला चाहे.

संदिग्ध एजेंट ऐसा कर दो देशों में लड़ाई करवा सकते हैं उनके बीच परमाणु युद्ध की नौबत ला सकते हैं.

ये तकनीक पहले से ही मौजूद है और इससे असल और नकल में अंतर करना लगातार कठिन होता जा रहा है.

इन ख़तरों को कैसे कम किया जा सकता है?

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Image caption हम अगर जल्द कदम उठाएं तो इन ख़तरों से बचा जा सकता है.

तो, हमारी सभ्यता कितने संकट में है? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि किस ख़तरे की बात की जा रही है.

ध्यान में रखने वाली सबसे अहम बात ये है कि भविष्य पत्थर पर लिखी कोई इबारत नहीं.

ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिनको हम कर सकते हैं और अब समय कदम उठाने का है.

लेकिन कैरिन कुहलमन मानती हैं कि जनसंख्या वृद्धि सबसे बड़ी समस्या है.

वो कहती हैं, "परिवार के आकार से जुड़े सामाजिक तौर तरीक़ों को बदलने की ज़रूरत है और ये रवैया छोड़ने की ज़रूरत है कि हमें मनचाहे बच्चे पैदान करने और जो मन करे खाने की आज़ादी है."

इस तरह से हम वैश्विक विनाश को रोकने में अपनी भूमिका निभा सकते हैं.

दूरदर्शी एहतियात बरतने के मामले में इंसानों का बहुत बुरा रिकॉर्ड रहा है और हमारी संस्थाएं भविष्य की पीढ़ी के हित में बहुत तत्पर नहीं दिखतीं.

लेकिन कैरिन कहती हैं कि 21वीं सदी आखिरी न साबित हो, इसके लिए हमें इन ख़तरों को और गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.

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