हिंसाग्रस्त इलाक़े में बसी एक जन्नत

  • 30 अप्रैल 2019

भूमध्य सागर में स्थित देश साइप्रस पिछले क़रीब 45 साल से दो हिस्सों में बंटा हुआ है. इसकी राजधानी निकोसिया भी तुर्की और ग्रीस के बीच क़ब्ज़े की लड़ाई की शिकार है.

1974 में तुर्की की सेना ने साइप्रस पर हमला कर के इसके एक हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था. साइप्रस में यूनानियों और तुर्की मूल के लोगों की आबादी कमोबेश बराबर है. 1974 में जंग के बाद तुर्की ने साइप्रस के 40 फ़ीसद हिस्से पर अपना अधिकार जमा लिया. आख़िरकार जब युद्ध विराम हुआ, तो देश दो हिस्सों में बंट गया.

30 साल पहले बर्लिन की दीवार गिरने के बाद निकोसिया ही दुनिया का इकलौता शहर है जो दो देशों के बीच बंटा हुआ है. 1974 में हुए युद्ध विराम के बाद तुर्की और ग्रीस के क़ब्ज़े वाले इलाक़ों के बीच में 180 किलोमीटर लंबा गलियारा संयुक्त राष्ट्र ने बनाया था, जो निकोसिया के बीच से गुज़रता है. इसे ग्रीन लाइन कहा जाता है.

बंटवारे की वजह से साइप्रस की 25 फ़ीसद आबादी बेमुल्क और बेघर हो गई थी. तुर्की के क़ब्ज़े वाले इलाक़े में रहने वाले यूनानी मूल के क़रीब डेढ़ लाख लोगों को निकाल दिया गया था. इसी तरह यूनान के क़ब्ज़े वाले इलाक़े से तुर्की मूल के 50 हज़ार लोगों को निकाल दिया गया था.

निकोसिया की रहने वाली मारिया बाल्ताज़ी उन लोगों में से हैं जिनका परिवार इस बंटवारे का शिकार हुआ था. उनके चाचा जॉर्ज डेविड, पेट्रा नाम के गांव में पले-बढ़े थे. जंग के दौरान ये बर्बाद हो गया था. अब ये ग्रीन लाइन में पड़ता है. यहां आबादी अब नहीं बची है. बाल्ताज़ी के परिवार की 45 हेक्टेयर ज़मीन इसी इलाक़े में पड़ती है. इनमें क़रीब 6 हज़ार जैतून के पेड़ हैं, जिनमें से कुछ तो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराने हैं. इस इलाक़े में संयुक्त राष्ट्र की सेनाएं गश्त लगाती रहती हैं.

2003 के बाद से इस इलाक़े में बिछी बारूदी सुरंगों को हटाने का काम शुरू हुआ था. क़रीब 27 हज़ार बारूदी सुरंगें साफ़ की गईं. जिसके बाद यहां लोगों को खेती करने की इजाज़त दे दी गई है.

मारिया बाल्ताज़ी का ख़्वाब था कि वो अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर खेती करें. छह साल पहले अपने देश लौटने के बाद मारिया ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर खेती के नए तरीक़ों को अपनाया और अब वो अपने गांव में ऑर्गेनिक फार्म चलाती हैं. उन्होंने ग्रीस की राजधानी एथेंस में अपनी मार्केटिंग की नौकरी छोड़कर ये काम शुरू किया है. उनके दोस्त नेतिएन इस मिशन में साझीदार हैं. बरसों से वीरान पड़ी ज़मीन पर फ़सलें लहलहाने लगी हैं.

जब मारिया के दोस्त नेतिएन ने छह साल पहले ये ज़मीन देखी थी, तो ये इलाक़ा सूखा हुआ था. वजह ये थी कि साइप्रस के लोगों को इस बफ़र ज़ोन में आने की इजाज़त नहीं थी. यहां बारूदी सुरंगें बिछी होने से उनकी जान को ख़तरा था. लेकिन, बारूदी सुरंगें हटाए जाने के बाद यहां खेती शुरू हो चुकी है.

नेतिएन कहते हैं कि, 'यहां पर 1974 के बाद से कीटनाशकों का छिड़काव नहीं हुआ था. यानी यहां कीड़े-मकोड़ों की तमाम नस्लें बची हुई थीं. इसका फ़ायदा ये है कि जैतून पर लगने वाले कीड़े, पेड़ पर पहुंचें उससे पहले ही उन्हें शिकारी जीव चट कर जाते हैं.'

यहां पर हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराने जैतून के पेड़ हैं. इसके अलावा मारिया की ज़मीन पर तरह-तरह के जीव जैसे ख़रगोश, लोमड़ी और कई परिंदे आबाद हैं.

आज मारिया और नेतिएन यहां पर घोड़े, गाय, मुर्गियां और गधे पालते हैं. अपनी ज़मीन प अंजीर, नाशपाती और दूसरी फ़सलें उगाते हैं. वो अपने बाग़ से एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल निकालते हैं.

मारिया कहती हैं कि उन्होंने सैकड़ों सैनिकों के बीच रहने का तसव्वुर भी नहीं किया गया था. लेकिन, अब यहां बहुत सुकून मिलता है. प्रदूषण नहीं है. गिने-चुने लोग रहते हैं, जो एक-दूसरे को जानते हैं.

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मारिया के दोस्त और साझीदार नेतिएन कहते हैं कि कई दशक से कीटनाशक न छिड़के जाने से यहां नुक़सानदेह कीड़ों को खाने वाले छोटे जीव मौजूद हैं, जो पेड़ों को नुक़सान पहुंचाने वाले कीड़े-मकोड़ों को चट कर जाते हैं.

मारिया को अपने पुश्तैनी गांव में आकर रहने की तब सूझी, जब उनके चाचा लगातार वहां के बचपन के क़िस्से सुनाते थे. आज वो यहां रहकर जड़ों से जुड़े होने का एहसास पाती हैं.

मारिया और नेतिएन अपने खेतों में कई तरह की फ़सलें और जड़ी-बूटी उगाते हैं. हज़ारों जैतून के पेड़ों से वो ख़ास तौर से तैयार होने वाला जैतून का तेल निकालते हैं. इसे दुनिया का सबसे शुद्ध एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल का ख़िताब मिल चुका है.

एथेंस की नेशनल और कैपोडिस्ट्रियन यूनिवर्सिटी ने लंबी जांच-परख के बाद मारिया के फार्म के जैतून के तेल को बेहतरीन बताया है. इसकी तुलना 10 देशों से आए जैतून के तेल की 7 हज़ार किस्मों से की गई थी. अब कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी इस तेल की ख़ूबियों की पड़ताल कर रही है. संकेत ऐसे मिले हैं कि इससे कैंसर के इलाज में मदद मिलेगी.

आज मारिया और उनके साझीदार दुनिया भर में अपना ख़ास जैतून का तेल बेचते हैं. 2016 से 2019 के बीच इसे कई अवार्ड भी मिल चुके हैं.

एथेंस यूनिवर्सिटी के नतीजों से स्थानीय किसान हैरान थे. उन्होंने अब मारिया और उनके साथी को पूरी तरह अपना लिया है. स्थानीय स्तर पर केमिकल और कीटनाशक के इस्तेमाल न होने की वजह से मारिया और नेतिएन के तेल में ज़रा भी मिलावट नहीं होती.

मारिया का घर उनके खेतों के क़रीब ही है. वो यहां अपने बेटे, कुत्तों और बिल्ली के साथ रहती है. उनका शरणार्थी परिवार पांच किलोमीटर की दूरी पर ही रहता है.

संयुक्त राष्ट्र के सैनिकों की गाड़ियां और हेलीकॉप्टर दिन मे दो बार गश्त के लिए आते हैं. इसके अलावा इलाक़े में शोर मचाने वाला कोई नहीं होता.

मारिया के दोस्त यहां आते हैं तो कहते हैं कि तुम तो जन्नत में रह रही हो. मारिया के अलावा कुछ और किसानों ने भी बफ़र ज़ोन में खेती शुरू कर दी है. वो अक्सर मिल-बैठकर ख़ुशियां और ग़म साझा करते हैं. कोई संतरे दे जाता है तो मारिया उसे अपना ख़ास जैतून का तेल दे देती हैं. इसी बहाने मेल-जोल भी हो जाता है.

बफ़र ज़ोन से दस किलोमीटर दूर मारिया के चाचा ने एक शिक्षा केंद्र खोला है. यहां मारिया के साझीदार नेतिएन पढ़ाने भी आते हैं. वो युवाओं को बिज़नेस मैनेजमेंट से लेकर जलवायु परिवर्तिन से निपटने के तरीक़ों तक की जानकारी देते हैं.

मारिया के लिए बंटे हुए साइप्रस के बीच का ये हिस्सा बहुत जज़्बाती लगाव वाला है. वो चाहती हैं कि उनसे प्रेरणा लेकर दूसरे साइप्रस वासी भी अपने देश लौट आएं. वो यहां ऑर्गेनिक फ़ार्मिंग करें.

ख़ुद मारिया लोगों की मदद के लिए तैयार हैं. इसीलिए उन्होंने अपने फार्म को ऑर्गेनिक और मॉडल फार्म बनाया है. वो अब इससे और किसानों को जोड़ रही हैं ताकि ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा मिले. इसका दायरा बढ़े.

(बीबीसी ट्रैवल का ये लेख अंग्रेजी में छपी कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है, अंग्रेजी लेख को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.)

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