पाकिस्तान: इमरान सरकार बनाम पत्रकार बिरादरीः मोहम्मद हनीफ़ का ब्लॉग

  • 25 जुलाई 2019
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अच्छा तो यह होता कि तुम लोग सर ग़फ़ूर (पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ़ ग़फ़ूर) की बात मान लेते जो उन्होंने बहुत ही विनम्र लहजे में कही थी कि पत्रकार सिर्फ़ छह महीने सकारात्मक रिपोर्टिंग करें, फिर देखें पाकिस्तान कहाँ से कहाँ पहुँचता है.

तुम में से अक्सर मान गए, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो पत्रकारिता की स्वतंत्रता का रोना रोते रहे.

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हामिद मीर के पुराने प्रोग्रामों से क्लिप निकाल कर मातम करते हैं कि नए पाकिस्तान के संस्थापक और वाशिंगटन डीसी (इशारा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की तरफ़ है) के विजेता ने तो ख़ुद कहा था, ''हामिद मैं पत्रकारिता की आज़ादी के ख़िलाफ़ कैसे हो सकता हूँ क्योंकि पीटीआई (इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़) तो बनी ही मीडिया की वजह से थी और जब दस बारह साल तक जनता मेरी बात नहीं सुनती थी तो सिर्फ़ पत्रकार सुनते थे.''

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Image caption मेजर जनरल आसिफ़ ग़फ़ूर

तो पत्रकारों तुम लोगों को अगर ये घमंड है कि पीटीआई तुम लोगों ने बनवाई तो सुनो, सबके सब सुनो, दक्षिणपंथ वाले पत्रकारों और लेफ्ट वाले पत्रकारों, अपने दाएं हाथ को बाएं हाथ से काट कर विदेशी हाथ ढूंढते पत्रकारों, लिफ़ाफ़ा वाले पत्रकारों, ब्रीफकेस वाले पत्रकारों, अपनी तनख्वाहों में चालीस प्रतिशत कटौती कराने वाले पत्रकारों, चालीस प्रतिशत कटी हुई तनख्वाह के इन्तिज़ार में बैठे हुए पत्रकारों, नई मोटर साइकिल की इच्छा रखने वाले पत्रकारों, अपना निजी हवाईजहाज़ रखने वाले पत्रकारों, बेरोज़गार पत्रकारों, बिना तनख्वाह के काम करने वाले पत्रकारों, जजों के वीडियो पर वीडियो बनाने वालों, बड़े पीरों के घरों में पूरा बकरा खाने वालों, प्रेस क्लबों में बैठ कर सरकारी चेक लेने वालों, पत्रकारिता के नाम पर प्लॉट मांगने वालों, व्हाट्सप्प से टिकर चलाने वालों, आधी रात को मालिक के हुक्म पर हेड लाइन बनाने वालों, अंग्रेज़ी वालों, सिंधी वालों, उर्दू वालों, करांची के समंदर के किनारे पर मरने वाले कछुओं की कहानियां कहने वाले पत्रकारों, ग्वादर (बंदरगाह) में पानी के टैंकर की क़ीमत का हिसाब रखने वाले पत्रकारों, पाकिस्तान से चीन जाने वाली दुल्हनों के दुख सुनाते पत्रकारों, मंज़ूर पश्तीन के साथ फ़ोटो बनवाने वाले पत्रकारों, राष्ट्र की ख़ुफ़िया जानकारियों को पहले पन्ने पर छाप कर विदेशी एनजीओ से हीरो टाइप एवार्ड लेने वाले पत्रकारों, पत्रकारिता को मिशन समझने वाले पत्रकारों, पत्रकारिता को धंधा है पर गंदा है समझ कर करने वाले पत्रकारों, यूट्यूब पर अपना चैनल बना कर सेठों से मुक़ाबला करने के सपने देखने वाले पत्रकारों, ट्वीटर पर सुबह शाम क्षेत्रवाद फैलाते पत्रकारों, पत्रकारों ने कोड़े खाये थे की रट लगाने वाले पत्रकारों, मुनीर नियाज़ी की कविताओं से पाकिस्तान का भविष्य बताने वाले पत्रकारों, उपन्यास गॉड फ़ादर को ऐतिहासिक दस्तावेज़ समझने वाले पत्रकारों, छोटे, बड़े और विश्लेषकों की नर्सरी में पल रहे पत्रकारों, अश्लीलता की कमाई खाकर अश्लीलता के विरुद्ध जिहाद का नारा देने वाले पत्रकारों, सर बाजवा (पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा) के लिए एक्सटेंशन की मांग करते पत्रकारों, एक हदीस (इस्लाम के आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद की कही बातें) से शुरू कर के ग़ालिब (उर्दू के शायर मिर्ज़ा ग़ालिब) के शेर पर कॉलम ख़त्म करने वाले पत्रकारों, ओये सब एडिटरों, अख़बार का पेज बनाने वालों, टिकर टाइप करने वालों, टेलीविज़न की डीएसएनजी वैन पर जनरेटर चलाने वालों, क़मीज़ के अंदर से हाथ डाल कर माइक लगाने वालों और इन सब के मालिकों, सब सुनलो.

Image caption मोहम्मद हनीफ़

तुम सही कहते हो

हमारा (बल्कि अब अमरीका का भी) लीडर सही कहता है कि पीटीआई मीडिया ने बनाई थी. अब हम आपको एक नई पीटीआई क्यों बनाने देंगे और अगर सच बोलने का इतना ही शौक़ है तो दिल पर हाथ रख कर बताओ कि क्या वास्तव में इस देश को एक और पीटीआई की ज़रूरत है.

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