सद्दाम हुसैन की सेना और उस लड़के की आपबीती

  • 18 सितंबर 2019
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Image caption तैमूर अब्दुल्ला अहमद अपने परिवार के सामूहिक क़त्ल से सदमे में हैं

चेतावनी:इस कहानी में सामूहिक क़ब्रों की कई वीभत्स तस्वीरें हैं.

"मुझे बहुत भयानक एहसास हो रहा था. मैंने अपनी आंखों के सामने अपनी मां की हत्या होते देखी थी. मेरे पास शक्ति नहीं थी. मैं उनकी रक्षा नहीं कर सका. मैं उनका बचाव नहीं कर सका. उसके बाद मैंने अपनी दो बहनों को मौत के घाट उतारे जाते हुए देखा."

"उन्होंने केवल मेरी मां और बहनों को नहीं मारा. उन्होंने तो मेरे सारे रिश्तेदारों को क़त्ल कर दिया था."

उनका जुर्म था कि वो सद्दाम हुसैन के इराक़ में रहने वाले कुर्द नागरिक थे.

ये बात तीस साल से भी ज़्यादा पुरानी है. लेकिन, तैमूर अब्दुल्ला अहमद को आज भी उसका एक एक लम्हा याद है. यह वाक़िया मई 1988 का है. तब केवल 12 बरस के तैमूर अब्दुल्ला, जज़्बाती तौर पर नहीं, लेकिन कम से कम शारीरिक रूप से उस हत्याकांड में ज़िंदा बच निकले थे.

तैमूर ने बीबीसी को बताया कि, "मेरा दिल मर गया था. मैंने उस क़ब्रिस्तान में अपनी मां और बहनों को पड़ा हुआ देखा था."

उस दिन तैमूर को भी गोली मारी गई थी. लेकिन, ये गोली उनकी बांह में लगी थी और वो अंधेरे का फ़ायदा उठाकर गड्ढे से रेंगते हुए निकल आए थे. ये एक चमत्कार ही था कि उनकी जान बच गई थी.

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Image caption सद्दाम हुसैन की दी गई मौत की सजा में मारे गए लोगों की सामूहिक क़ब्रें

आज तैमूर अब्दुल्ला को ज़ुल्म की उस दास्तान की एक-एक तस्वीर साफ़ तौर पर याद है. एक-एक हर्फ़ उनके ज़हन पर लिखा हुआ है. वो उन बेहद भयावाह यादों को साझा करते हुए ज़रा भी नहीं झिझकते हैं और पूरे विस्तार से ज़ुल्म की दास्तान बताते हैं.

तैमूर कहते हैं, "मैंने देखा था कि मेरी मां के सिर में गोली लगी थी और इसके असर से उनका दुपट्टा गिर गया था. इसके बाद मैंने देखा कि एक और गोली मेरी बहन के गालों को छेदती हुई उनके सिर से निकल गई थी."

"मेरी दूसरी बहन की बांह में गोली मारी गई थी और उससे पानी की तरह ख़ून निकल रहा था."

तैमूर को उस भायनक दिन की याद बार-बार सताती है. और जब भी वो सोने जाते हैं, ये याद उनके ज़हन में ताज़ा हो जाती है. जब तैमूर किसी बच्चे या जवान लड़की को देखते हैं, तो उनके मन में सवाल उठता है कि इसे परिवार के साथ क्या हुआ होगा?

तैमूर कहते हैं, "मैं एक आम इंसान की तरह नहीं रह सकता. मैं रोज़ उस बारे में सोचता हूं और बार-बार मरता हूं."

अब 43 बरस के हो चुके तैमूर ने बीबीसी को अपनी जान बचने की आश्चर्यजनक घटना और इंसाफ़ के लिए अपनी लंबी लड़ाई की कहानी सुनाई.

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Image caption तीन गड्ढों में एक ही परिवार के सौ से ज़्यादा सदस्यों के अवशेष हैं.

"पूरी दुनिया देखे हमारे साथ क्या हुआ"

जून महीने में इराक़ के अधिकारियों ने उस जगह की खुदाई शुरू की, जिसके बारे में तैमूर को लगता है कि वहीं उनके रिश्तेदार दफ़न हैं. लेकिन, अधिकारियों ने अहमद को ख़बर नहीं दी. अब इराक़ी अधिकारी, इन अवशेषों को दोबारा इराक़ के कुर्द इलाक़े में दफ़न करने का इरादा रखते हैं.

इस बात को सुनकर तैमूर का ग़ुस्सा भड़क उठा. वो कहते हैं कि लोगों के अवशेषों के इस तरह चुपके-चुपके निकाल कर दूसरी जगह दफ़नाने का कोई मतलब नहीं है.

तैमूर का कहना है, "मैं चाहता हूं कि पूरी दुनिया ये देखे कि हम लोगों के साथ क्या हुआ था. मैं चाहता हूं कि कैमरे बेगुनाह बच्चों के शवों को क़रीब से दिखाएं, जो अपनी मां की गोद से चिपके हुए थे, जब उन्हें गोली मार दी गई थी.''

तैमूर को लगता है कि उस हत्याकांड को लेकर लोगों की जानकारी बहुत कम है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस बारे में कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं हुई है.

तैमूर अब्दुल्ला अहमद अब अमरीका में रहते हैं. लेकिन, जैसे ही दोस्तों ने उन्हें ख़बर दी कि उनके रिश्तेदारों की क़ब्रें खोदी जा रही हैं, वो फ़ौरन इराक़ पहुंचे. अब वो इन क़ब्रों की खुदाई के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं. क्योंकि उन्हें लगता है कि इन्हीं क़ब्रों में उनकी मां, बहनों और क़रीबी रिश्तेदारों के अवशेष दफ़न हैं.

पिछले एक दशक में इराक़ में कुर्द लोगों की कई सामूहिक क़ब्रों का पता चला है. इराक़ की सरकार का कहना है कि ऐसी क़रीब 70 सामूहिक क़ब्रें हैं. इन में से 17 की खुदाई की जा चुकी है..

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Image caption अहमद का कहना है कि इस बद्दू परिवार ने उन्हें बचाने के लिए अपनी जान जोख़िम में डाल दी थी.

सद्दाम के 'अल अनफ़ल' अभियान के शिकार

ईरान-इराक़ युद्ध के आख़िरी दिनों में सद्दाम हुसैन ने कुर्द लोगों के ख़िलाफ़ बेहद ख़ूनी सैन्य अभियान छेड़ दिया था, जिसका नाम था-अल अनफ़ल. ये कुर्द उत्तरी इराक़ में रहते थे.

इस सैन्य अभियान का मक़सद कुर्दों को सबक़ सिखाना था. क्योंकि उनका एक गुट ईरान के साथ मिला हुआ था. साथ ही सद्दाम हुसैन, कुर्दों की आज़ादी की मांग को भी कुचलना चाहते थे.

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच का कहना है कि इस जातीय हिंसा में एक लाख से ज़्यादा कुर्दों को मार दिया गया था. सद्दाम हुसैन की सेना ने कुर्दों के सफ़ाए के लिए रासायनिक हथियारों का भी इस्तेमाल किया था.

वहीं, कुर्दों का दावा है कि इस नरसंहार में एक लाख 82 हज़ार से ज़्यादा लोगों की हत्या की गई थी.

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Image caption इराक़ी चिकित्सा परीक्षक शव निकालने का काम कर रहे हैं.

खुद कुर्दों ने ही सद्दाम के सैनिकों को तैमूर के गांव तक पहुंचाया

तैमूर अब्दुल्ला अहमद को अप्रैल 1988 के वो दिन आज भी याद हैं, जब सद्दाम हुसैन के इस हिंसक अभियान की ख़बर पाकर उनका पूरा गांव सहमा हुआ था.

वो बताते हैं कि, "उत्तर इराक़ के गांवों को एक-एक कर के निशाना बनाया गया था."

जहां तक तैमूर को याद है, उनके गांव में उन्हीं के परिवार के लोग रहते थे. उनमें से ज़्यादातर लोग खेती करते थे. तैमूर के गांव का नाम था कुलाजो, जो एक पहाड़ी के नीचे बसा हुआ था. इस इलाक़े की आबादी बहुत कम थी. और अगर कोई इस इलाक़े का रहने वाला नहीं था, तो उसके लिए तैमूर का गांव खोजने में परेशानी होती.

लेकिन, तैमूर बताते हैं कि उस वक़्त बहुत से कुर्द, सद्दाम हुसैन से मिल गए थे. उनका कहना है, "इराक़ी सैनिकों को हमारे गांव तक पहुंचाने का काम उन कुर्दों ने किया था, जो सद्दाम हुसैन की हुकूमत से मिले हुए थे."

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Image caption तैमूर का कहना है कि उन्हें उस क़ब्र के खुलने की जानकारी नहीं दी गई थी जिसमें उनकी मां और बहनों के अवशेष हैं

'सैनिकों ने झूठ कहा था'

अप्रैल महीने के उस बदक़िस्मत दिन की यादें तैमूर के ज़हन में आज भी ताज़ा हैं, जब गांव के 110 बाशिंदों को घर-बार छोड़ कर जाने को कह दिया गया.

तैमूर बताते हैं, "सैनिकों ने सबसे कहा कि हमने तुम्हारे लिए शरणार्थी कैम्प बनाए हैं. तुम वहां जाकर आराम से रह सकोगे. वहां पर पानी और बिजली समेत सभी सुविधाएं हैं."

कई लोगों को तो फ़ौज की गाड़ियों में लाद कर ले जाया गया. तैमूर का परिवार अपने ट्रैक्टर से उन लोगों के पीछे-पीछे चल दिया.

फिर पिता को अलग कर दिया गया...

आख़िरकार, इन सभी लोगों को उत्तरी इराक़ के टोपज़ावा नाम के सैनिक ठिकाने पर ले जाया गया. वहां पहुंचन के बाद सबसे पहले मर्दों को अलग किया गया. फिर उनके कपड़े उतारकर आंखों में पट्टी बांधी गई और कहीं अलग ले जाया गया. वो आख़िरी बार था जब तैमूर अब्दुल्ला अहमद ने अपने पिता को देखा था.

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Image caption एक सैन्य ठिकाने में अहमद के पिता सहित सभी लोगों को अलग कर दिया गया और फिर ले जाया गया

फिर महिलाओं को कहीं और ले गए...

इसके बाद, तैमूर, उनकी बहनों और दूसरे बच्चों को उनकी मां और मौसी के साथ क़रीब एक महीने तक बंधक बनाए रखा गया.

मई के एक बेहद गर्म दिन, सभी महिलाओं और बच्चों को पूरी तरह ढंके हुए फ़ौजी ट्रकों पर लादा गया और कई घंटों के सफ़र के बाद उन्हें किसी अनजान ठिकाने पर ले जाया गया.

उस सफ़र के बारे में तैमूर कहते हैं कि, "ट्रक के अंदर बहुत गर्मी लग रही थी. गर्मी और थकान की वजह से दो लड़कियां मर गई थीं. उन्होंने बीच रेगिस्तान में कहीं पर ट्रक रोका और हमें पीने के लिए पानी दिया. उस पानी में कुछ केमिकल मिला था. जिसने हमारे शरीर को सुन्न कर दिया. उन्होंने हमें दोबारा बांध कर ट्रक में ठूंस दिया."

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Image caption अहमद का कहना है कि टोपज़ावा सैन्य शिविर में स्थितियां भयानक थीं

तैमूर ने खोल लिए थे अपने हाथ

तैमूर ने किसी तरह से अपने हाथ खोल लिए थे और अपनी आंखों पर बंधी पट्टी हटा दी थी.

पांच मिनट बाद ट्रक अपनी मंज़िल पर पहुंच गए. जब उसके दरवाज़े खोले गए, तो तैमूर ने देखा कि वहां बुलडोज़र ने बड़े करीने से तीन गड्ढे खोद रखे थे.

तैमूर बताते हैं, ''मैंने देखा कि एके-47 राइफ़लें लिए हुए दो इराक़ी सैनिक उन गड्ढों की तरफ़ देख रहे थे.''

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Image caption तैमूर कहते हैं कि पहले खाड़ी युद्ध के अंत तक बद्दू परिवार ने उन्हें छुपा रखा था.

और फिर वो पल जब मारी गईं गोलियां...

ट्रक से सभी महिलाओं और बच्चों, यहां तक कि एक महीने के बच्चों को ट्रक से उतार कर गड्ढे में धकेल दिया गया.

तैमूर बताते हैं, "अचानक उन सैनिकों ने हमारे ऊपर गोलियों की बौछार कर दी. उन्होंने एक गर्भवती महिला को गोली मार दी, जिसकी डिलिवरी होने वाली थी. उसका पेट फट गया था."

तैमूर अहमद के बाएं हाथ में गोली लगी. उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें. वो बताते हैं कि, "मैंने मर जाने का बहाना किया. उस वक़्त गोलियां मेरे सिर, कंधे और पैरों के आस-पास से गुज़र रही थीं. ऐसा लग रहा था जैसे पूरी ज़मीन हिल रही हो. पूरी ज़मीन ख़ून से लाल हो गई थी."

तैमूर की पीठ में दो और गोलियां मारी गईं. इसके निशान आज भी उनके शरीर पर बने हुए हैं. तैमूर कहते हैं, "मैं अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा था."

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Image caption तैमूर अब्दुल्ला अहमद उस नरसंहार में बचने वाले सिर्फ़ एक शख़्स हैं

और वो किसी तरह बच निकले

तैमूर मानते हैं कि उनकी मां और बहनों को बगल के गड्ढे में धकेल कर गोली मारी गई थी. वो बताते हैं, "मैं उस समय 12 साल का था. मेरी सबसे बड़ी बहन की उम्र दस साल रही होगी. जबकि दो छोटी बहनें आठ और छह साल की रही होंगी."

जब गोलीबारी रुकी तो अंधेरा छा चुका था. इराक़ी सैनिकों के जाने के बाद तैमूर गड्ढे से बाहर आए. उन्होंने कभी पैदल चलकर और कभी रेंगते हुए और कभी दौड़ कर रेगिस्तान को पार किया और एक तंबू तक पहुंचे जो इराक़ी बद्दू क़बीले के सदस्यों का था.

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Image caption अधिकारी अवशेषों को कुर्द क्षेत्र में स्थानांतरित करना चाहते हैं

बद्दुओं ने बचाई जान

तैमूर कहते हैं, "चूंकि उस हालत में मुझे अस्पताल ले जाना ख़तरे से ख़ाली नहीं था, तो वो मुझे अपने गांव के हकीम के पास ले गए. उसकी दवाओं से मेरे गोलियों वाले ज़ख़्म ठीक हो गए."

इराक़ के उन बद्दुओं को पता था कि किसी कुर्द लड़के को पनाह देना कितना ख़तरनाक जोख़िम है. लेकिन, उन्होंने ख़तरे को समझते हुए भी तैमूर की जान बचाई और उनका ख्याल रखा.

तैमूर बताते हैं, "मुझे पता था कि मेरे एक रिश्तेदार इराक़ी सेना में थे, मैंने उनसे संपर्क किया और क़रीब तीन साल बाद कुर्द इलाक़े में रहने चला गया."

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Image caption सद्दाम ने अनफ़ल अभियान में कुर्दों को मारने के लिए रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया

संघर्ष की दास्तान

लेकिन, जब तैमूर 1991 में कुर्द इलाक़े में पहुंचे तो उनके इराक़ी सैनिकों की गोलियों से बचने की ख़बर फैल गई. वो बताते हैं, "जब मेरी कहानी मशहूर हो गई तो इराक़ी अधिकारी और उनके कुर्द साथी मुझे तलाशने लगे."

तब 15 बरस के तैमूर को इन लोगों से बचने के लिए लुका-छिपी का खेल खेलना पड़ा. कभी-कभी उन्हें अपने रिश्तेदार का घर छोड़कर गांव के जले हुए खंडहरों के बीच छुपना पड़ता था. तैमूर कहते हैं कि, "मैं पूरी तरह से ख़ाली कुर्द गांवों में रह रहा था. मेरे पास खाने के लिए कुछ नहीं होता था. कई बार तो मुझे पत्ते चबाकर पेट भरना पड़ता था."

लेकिन, जल्द ही उनके हालात बेहतरी की तरफ़ बढ़े और शरण पाने की उनकी अर्ज़ी मंज़ूर हो गई.

तैमूर बताते हैं कि, "1996 में मैं अमरीका पहुंच गया और वहां मैंने गाड़ियों के कल-पुर्ज़े का कारोबार शुरू किया. वही काम मैं आज भी कर रहा हूं."

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Image caption अहमद का कहना है कि इस बद्दू परिवार ने उन्हें बचाने के लिए अपनी जान जोख़िम में डाल दी थी.

क़ब्रों की तलाश

2009 में तैमूर अब्दुल्ला इराक़ लौटे. वो इस पक्के इरादे के साथ अपने देश वापस आए थे कि उन्हें अपनी मां और बहनों की क़ब्र तलाशनी है. वो बग़दाद के दक्षिण में स्थित समावा इलाक़े में गए. वहां पर तैमूर को बद्दू क़बीले का वो परिवार मिला, जिसने उन्हें पनाह दी थी.

तैमूर बताते हैं कि, "मैंने उनसे कहा कि मुझे उस जगह ले चलो, जहां मैं तुम लोगों को मिला था. वो मुझे उस ठिकाने पर लगे गए. फिर मैंने अपनी याद से वो रास्ता ढूंढ निकाला, जहां से सामूहिक क़ब्रगाह तक पहुंचा जा सकता था."

विशाल रेगिस्तान में दिशा और रास्तों का पता लगाना आसान काम नहीं था.

तैमूर उस दिन को याद करते हैं, जब वो उस जगह पहुंचे थे, जहां पर सामूहिक क़ब्रें थीं, "जब मैंने क़ब्र देखी, तो मैं कांपने लगा और रोने लगा. मुझे महसूस हुआ कि मुझे बचाने के पीछे अल्लाह का कोई इरादा था. अल्लाह ने मुझे बहुत बड़ा काम दिया था. और वो काम है उन बेगुनाह लोगों के बारे में बात करना, जो अब अपनी कहानी ख़ुद नहीं बयां कर सकते."

तैमूर ने राजनेताओं से इस बात की मदद मांगी कि उसके परिजनों के अवशेष को सावधानी से रेगिस्तान से निकाला जा सके. लेकिन, उन्हें कोई मदद नहीं मिली.

तैमूर के मुताबिक़, "तब मैंने इराक़ी अधिकारियों से संपर्क किया और उन्हें कहा कि जब भी वो क़ब्रें खोदी जाएं, तो मुझे इत्तिला दी जाए. मेरे पास तो मेरी मां और बहनों की तस्वीरें भी नहीं हैं. मैं खुदाई के वक़्त उस क़ब्रिस्तान में रहना चाहता था, ताकि मैं ये जान सकूं कि कौन से अवशेष मेरी मां और बहनों के हैं. और मैं उन के अवशेषों के साथ तस्वीरें लेना चाहता था."

लेकिन इराक़ी अधिकारियों ने तैमूर का इंतज़ार नहीं किया. उन्होंने पहले ही क़ब्रों की खुदाई का काम शुरू कर दिया.

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Image caption अधिकारियों का कहना है कि निजी सामान अक्सर उन लोगों की पहचान करने में मदद करते हैं जो मारे गए थे

एक असंभव सा काम

जिस जगह के बारे में तैमूर को आशंका है कि वहीं उनके परिजनों के अवशेष होंगे, वहां से अब तक 170 शवों के अवशेष निकाले जा चुके हैं. इराक़ी अधिकारियों का कहना है कि इन मारे गए लोगों के रिश्तेदारों से संपर्क करने की ज़िम्मेदारी कुर्द अधिकारियों की है.

वहीं, कुर्दिस्तान के क्षेत्रीय प्रशासन के अधिकारी, फौद उस्मान ताहा कहते हैं कि, "हमारे लिए हर मारे गए शख़्स के रिश्तेदार से संपर्क करना मुश्किल है. तैमूर अमरीका में रहते हैं. हम उन लोगों पर ध्यान दे रहे हैं, जो यहीं, इराक़ में रहते हैं. हमें पहले अवशेषों की पड़ताल करनी होती है. उसके बाद हम रिश्तेदारों को ख़बर देते हैं. हमारी कोशिश होती है कि हम किसी तरीक़े से अवशेषों की शिनाख़्त कर सकें. मससलन कपड़ों या पहचान पत्र से. जिनसे ये पता चल सके कि मारे गए लोग कहां के रहने वाले थे."

फ़ौद उस्मान का कहना है कि क़ब्रों से निकले अवशेषों के डीएनए सैंपल भी लिए जाएंगे और शव को एक अलग कोड दिया जाएगा, ताकि आगे उनकी शिनाख़्त हो सके.

फ़ौद कहते हैं कि, "मारे गए लोगों के परिजनों का पता लगाने के बाद हम उन्हें शवों को उनके पुश्तैनी गांवों में ले जाने देंगे ताकि वो अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के बाद उन्हें दोबारा दफ़न कर सकें. हम सभी पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाना चाहते हैं. लेकिन, मेरे मंत्रालय का ये काम नहीं है कि हम युद्ध अपराधियों का पता लगाएं. हम सबूत जुटाकर, युद्ध अपराध के दोषियों को सज़ा देने वाली विशेष अदालतों को सौंप देते हैं."

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Image caption अली हसन अल-माजिद रासायनिक अली के रूप में जाने जाते हैं. उन्हें नरसंहार और मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों के लिए अनफ़ल अभियान में भागीदारी के लिए मौत की सजा हुई थी

इंसाफ़

अमरीका से आने के बाद तैमूर अब रेगिस्तान में रह रहे हैं. ताकि वो अधिकारियों को उन गड्ढों को खोदने से रोक सकें, जिनमें उनके मुताबिक़ उनकी मां और बहनों के शव हैं.

वो इराक़ी अधिकारियों और नेताओं की उन बातों से परेशान हो चुके हैं, जब वो एक क़ब्र को खोद कर ये दावा करने लगते हैं कि उन्होंने एक और सामूहिक क़ब्र का पता लगा लिया है.

तैमूर कहते हैं, "मैं यहीं पर रहूंगा और इन क़ब्रों की हिफ़ाज़त करूंगा. कुर्दों के नरंसहार को दुनिया को मानना होगा. हमें इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों से इंसाफ़ करना ही होगा."

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