समय हमेशा आगे ही क्यों जाता है, पीछे नहीं?

  • 17 नवंबर 2019
समय इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption समय हमेशा आगे ही क्यों जाता है, पीछे नहीं?

जैसे बड़ा, चौड़ा या लंबा होता है उसी तरह समय एक आयाम है. हम इन तीनों चीज़ो में किसी भी दिशा में आगे बढ़ सकते हैं जबकि समय में किसी एक ही दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है. वह है आगे, लगातार आगे. ऐसा क्यों?

हम समय में पीछे क्यों नहीं जा सकते हैं?

लंबे समय तक ​वैज्ञानिक इसकी व्याख्या ठोस तरीक़े से नहीं कर सके.

एक जटिलता यह थी कि फिज़िक्स का सिद्धांत अच्छी तरह काम करता है चाहे आप समय में आगे जाएं या पीछे जाएं.

आख़िरकार एक अप्रत्याशित जगह से जवाब आया, वह था भाप इंजन.

औद्योगिक क्रांति की शुरुआत में, इंजीनियरों ने यह समझने का प्रयास किया कि भाप इंजन को अधिक प्रभावी कैसे बनाया जाए.

इंजन के चारों ओर गर्मी और ऊर्जा कैसे संचालित होती है, यह जानने के लिए उन्होंने विज्ञान की एक पूरी तरह से नई शाखा विकसित की जिसे वे थर्मोडाइनैमिक्स कहते हैं.

ताप बल

यह पता चला है कि थर्मोडाइनैमिक्स भाप इंजन के कामकाज के बारे में बहुत अधिक व्याख्या कर सकता है.

विशेष रूप से, थर्मोडाइनैमिक्स का दूसरा सिद्धांत यह समझने में मदद करता है कि चीज़े उस क्रम में क्यों होती हैं जिसमें वे होती हैं.

यह इंगित करता है कि एक पृथक प्रणाली या तो बंद रहती है या अधिक अराजक स्थिति में विकसित होती है, लेकिन कभी भी अधिक व्यवस्थित नहीं होती है.

उदाहरण के तौर पर एक कप फर्श पर गिर जाता है और इसमें रखा सामान फैल जाता है.

हम सब जानते हैं कि यह एक बदलने वाली प्रक्रिया नहीं है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption टूटे हुए कप को जोड़ा जा सकता है.

चीज़ो को अव्यवस्थित करने का एक तरीक़ा है लेकिन उन्हें अच्छे तरीक़े से ठीक नहीं किया जा सकता है और थर्मोडाइनैमिक्स के दूसरे सिद्धांत से हमें पता चलता है कि ऐसा क्यों होता है.

इसे देखने का एक और तरीक़ा अव्यवस्था के संदर्भ में है. एक साफ कप है, लेकिन जब यह टूटता है तो गंदा होता है.

​इसके लिए फिज़िक्स में शब्द है...

एन्ट्रॉपी

एक जगह पर जितनी अधिक एन्ट्रॉपी (उस ऊर्जा का परिमाण जो यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित नहीं हो सकती है) होती है, वहां उतना ही गंदा, धुंधला और बेकार होता है.

यह थर्मोडाइनैमिक्स के दूसरे सिद्धांत की तरह प्रतीत होता है.

तस्वीर में नज़र आ रहा 'एस' एन्ट्रॉपी को दर्शाता है और 'डी' बदलाव का एक गणितीय तरीक़ा दिखाता है. तो ऐसे में 'डीएस' का अर्थ केवल एन्ट्रॉपी में बदलाव है.

अब, यदि आप इस समीकरण को बाएं से दाएं की ओर देखते हैं तो यह क्या कहता है. ऐसा लगता है कि एक सिस्टम की एन्ट्रॉपी हमेशा बढ़ानी पड़ती है.

जब एक कप टूट जाता है या दूध को कॉफी के साथ मिलाया जाता है, तब थर्मोडाइनैमिक्स के दूसरे सिद्धांत के मुताबिक़ यह ठीक है क्योंकि उन चीज़ो की एन्ट्रॉपी बढ़ जाती है.

लेकिन अगर आप यह चाहते हैं कि कप को फिर से ठीक ​किया जाए या दूध और कॉफी अलग हो जाएं, तो आप जो अपेक्षा करते हैं उससे एन्ट्रॉपी गिर जाएगी. यह उस सिद्धांत का उल्लंघन होगा.

थर्मोडाइनैमिक्स का दूसरा सिद्धांत बताता है कि ब्रह्मांड में चीज़ें किस क्रम में हो सकती हैं. यह हमें एस प्रवाह का एक स्पष्ट संकेत देता है जिसे हम समय कहते हैं. जो आगे बढ़ता है.

इमेज कॉपीरइट FCSCAFEINE
Image caption हम समय में वापस क्यों नहीं जा सकते, औद्योगिक क्रांति तक यह एक रहस्य था

समय केवल इसलिए आगे नहीं बढ़ता है क्योंकि इससे एन्ट्रॉपी कम हो जाएगी और दूसरे सिद्धांत का उल्लंघन होगा.

समय की अथक चाल हमें कहाँ ले जाती है?

ब्रह्मांड की एन्ट्रॉपी, अव्यवस्था, लगातार बढ़ती जा रही है. लगातार.

इसका मतलब यह है कि अधिकतम एन्ट्रॉपी की स्थिति में किसी भी समय भविष्य में, हमारा पूरा ब्रह्मांड कुल मिलाकर अव्यवस्था की स्थिति में होगा.

वैज्ञानिक इसे "हीट डेथ" या "थर्मल डेथ" कहते हैं.

नाम के बावजूद, गर्मी से मौत जहन्नुम नहीं होगा जिसमें सब कुछ जलकर राख हो जाता है.

यह और बुरा होगा.

इस अनुमान के मुता​बिक क्या होगा. सभी थर्मल असमानता गायब हो जाएगी. सभी जगह एक जैसा ही तापमान हो जाएगा और वहां कोई जीवन नहीं होगा.

सभी तारे खत्म हो जाएंगे, लगभग सभी पदार्थ विघटित हो जाएंगे, केवल कणों और विकिरण का एक मिश्रण होगा.

समय के साथ, ब्रह्मांड के विस्तार के कारण भी ऊर्जा गायब हो जाएगी जो अंत में जमा हुआ मृत और खाली हो जाएगा.

यही वजह है कि इसे "बिग फ्रीज़": द ग्रेट फ्रीज़ के रूप में जाना जाता है.

इसी से हमारा ब्रह्मांड खत्म हो जाएगा.

लेकिन चिंता न करें : उस मायूस क्षण तक पहुंचने में अरबों और अरबों और अरबों साल लगेंगे और तब तक, कोई भी इंसान यह गवाही देने के लिए नहीं बचेगा कि समय और एंट्रॉपी ने हमारे ब्रह्मांड को किस तरह से नष्ट कर दिया है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे

संबंधित समाचार