ज़िंदगी के हर पल का हिसाब रखने से क्या होगा?

  • 28 दिसंबर 2019
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फरवरी 2010 में मॉरिस विलारोएल ने 10 साल का अपना प्रयोग शुरू किया था.

मैड्रिड पोलिटेक्निक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक का 40वां जन्मदिन था और ज़्यादातर लोगों की तरह उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी का जायजा लेना शुरू किया.

विलारोएल को लगा कि ज़िंदगी का मुकम्मल रिकॉर्ड रखना कारगर हो सकता है. इससे न सिर्फ़ उनको अतीत की याद रहेगी, बल्कि आगे की ज़िंदगी कैसे बितानी है यह तय करने में भी मदद मिलेगी.

उन्होंने अपनी हर गतिविधि का विस्तृत लॉग-बुक बनाना शुरू किया. हर दिन की एंट्री बीती रात से शुरू होती है जब वह अगले दिन की योजना बनाते हैं.

वह हर 15 मिनट या आधे घंटे का विवरण लिखते हैं कि वह कहां हैं और क्या कर रहे हैं. जैसे मेट्रो में सफर कर रहे हैं या यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं या मुझ जैसे किसी पत्रकार को इंटरव्यू दे रहे हैं.

बातचीत शुरू करने से पहले उन्होंने स्पष्ट किया- "अब मैं लिखूंगा कि मैं आपसे बात कर रहा हूं, इसमें कितना समय लगा और आपके कुछ सवाल क्या रहे."

बाद में जब वह किसी सुपरमार्केट की कतार में खड़े होंगे या डॉक्टर से मुलाकात का इंतज़ार कर रहे होंगे या जब भी समय मिले तब वह इन नोट्स की समीक्षा करेंगे.

नोटबुक भर जाने पर वह माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल में उसका कैटलॉग बनाएंगे और अगले नोटबुक में लिखना शुरू कर देंगे.

सुकरात ने कहा था- "कसौटी पर कसे बिना ज़िंदगी बेमोल है". बहुत कम लोग अपनी ज़िंदगी को विलारोएल की तरह कसौटी पर कसते हैं.

वह उस बढ़ते हुए समुदाय का हिस्सा हैं जो आत्म-ज्ञान की तलाश में अपनी ज़िंदगी के आंकड़े जुटाते हैं.

पिछले 9 साल 9 महीने में उन्होंने 307 नोटबुक भर दिए हैं. इससे उन्होंने क्या सीखा? क्या उनकी सीख से हम सबको भी कोई फायदा होगा?

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अतीत की समझ, बेहतर भविष्य

विलारोएल ने जब इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया था तो उनका पहला मकसद समय का प्रबंधन था.

वह जानना चाहते थे कि वह वक़्त कैसे बिताते हैं और उनकी गतिविधियों का सेहत और खुशी पर क्या असर पड़ता है.

वह कार चलाकर दफ़्तर जाते थे, लेकिन उन्होंने देखा कि जबसे उन्होंने लॉग-बुक बनाना शुरू किया वह छोटी-छोटी घटनाओं से परेशान हो जाते थे.

जैसे यदि कोई उनकी गाड़ी के सामने अचानक से आ जाए तो उनको तनाव हो जाता था जो दिन भर बना रहता था.

वह कहते हैं, "अब मैं मेट्रो पकड़ता हूं और पैदल काम पर जाता हूं. इससे मेरी पीठ भी सही रहती है."

ऐसे छोटे सुधार क्रांतिकारी भले न लगे, लेकिन ऐसे कई सुधारों से उनकी जीवन संतुष्टि बेहतर हुई है. "अच्छी चीज़ें धीरे-धीरे नकारात्मक चीज़ों को दूर कर देती हैं."

लॉग बुक ने उनको तजुर्बे से सीखने में मदद की है. वह कहते हैं, "आप छोटे-छोटे विवरणों को देख सकते हैं और उनको बेहतर कर सकते हैं."

दर्ज न हो तो ये सारे विचार भुला दिए जाते. स्प्रेड शीट में दर्ज डेटा से उनको पता चलता है कि किस परियोजना पर उन्होंने कितनी देर काम किया. इसी के मुताबिक वह प्राथमिकताओं को समायोजित कर सकते हैं.

विस्तृत नोट्स होने से छात्रों को पढ़ाने में भी पिछली क्लास की चीज़ों को याद रखने में मदद मिलती है.

लॉग बुक ने विलारोएल को भावनाओं पर नियंत्रण रखने में भी मदद की है. अब वह तनाव के क्षणों में कम प्रतिक्रिया देते हैं.

"मुझे लगता है कि यह पहले हो चुका है और मैंने कई बार ऐसा देखा है, इसलिए अब मैं ख़ुद को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकता हूं."

आत्म-प्रतिबिंबन की प्रक्रिया आपके सामने घटनाओं के बारे में किसी तीसरे व्यक्ति का नज़रिया पेश करती है.

विलारोएल के पास अतीत की धुंधली यादों की जगह अब ज़िंदगी का पूरा ब्योरा है.

"मैं पिछले 10 साल के रोजाना बल्कि हर घंटे के विवरणों को देख सकता हूं. लेकिन यदि मैं 30 से 40 साल के बीच की ज़िंदगी को देखूं तो मुझे पता है कि बहुत सी चीज़ें हुई थी, लेकिन मैं उनकी बारीक जानकारियों तक नहीं पहुंच सकता."

पिछले 10 साल के रिकॉर्ड इतने ज़्यादा हैं कि उनको यह समय लंबा लगने लगा है, जैसे उन्होंने बहुत लंबी ज़िंदगी जी ली हो. "मुझे लगता है कि ये 10 साल यानी 40 से 50 साल के बीच का समय बहुत धीमे गुजरा है."

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"अच्छी चीज़ों का आनंद लेना"

विलारोएल जैसा तजुर्बा ही कई दूसरे सेल्फ-ट्रैकर्स का भी है, जो जीवन के अनुभवों को दर्ज करने और उनका विश्लेषण करने के लिए कई रणनीतियों का इस्तेमाल करते हैं.

वे इसे "क्वांटिफाइड सेल्फ" (Quantified Self) मानते हैं और ख़ुद को बेहतर तरीके से जानने के लिए इस डेटा का इस्तेमाल करते हैं.

36 साल के जेम्स नॉरिस सामाजिक उद्यम "अपग्रेडेबल" के संस्थापक हैं. वह बाली, इंडोनेशिया में रहते हैं.

उन्होंने 16 साल की उम्र में अपने पहले चुंबन के साथ ही ज़िंदगी की घटनाओं के ब्योरे दर्ज करना शुरू कर दिया था.

तब से वह अपने जीवन की हर उस घटना के बारे में लिखते हैं जो "पहली" बार हुआ. जैसे- जब वह किसी नई जगह पर गए या कोई नई चीज़ खायी (सबसे हाल में उन्होंने चारकोल बर्गर खाया था) या कोई नया तजुर्बा किया (जैसे स्काईडाइविंग). उनके खाते में अब तक 1850 एंट्री हो चुकी है.

नॉरिस अपनी उत्पादकता, भविष्य के बारे में अपने अनुमानों और ग़लतियों को भी नियमित रूप से ट्रैक करते हैं. ये रिकॉर्ड कंप्यूटर में स्टोर किए जाते हैं जिनको आसानी से खोजा जा सकता है.

उनको जब भी पीछे की कोई बात याद करनी होती है वह बस उस साल के डेटा में चले जाते हैं, फिर वह उसे याद कर सकते हैं, महसूस कर सकते हैं.

विलारोएल की तरह वह भी सोचते हैं कि इससे उनको वक़्त बिताने के सबसे अच्छे तरीके को ढूंढ़ने में मदद मिलती है.

उनका कहना है कि पहली बार के इतने सारे अनुभवों को याद रखने में सक्षम होना उनके आत्मविश्वास के लिए भी अच्छा है.

जब उनको कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होता है तो पिछले अनुभव उनका साहस बढ़ाते हैं. भरोसे की कमी होने पर यह उनके मूड को भी ठीक कर सकता है.

वह कहते हैं, "यदि आप अच्छी बातों को याद करते हैं तो आप इसका अधिक आनंद ले सकते हैं और यह आपकी खुशी के लिए अच्छा है." यह लंबे समय तक जीने का अहसास कराता है.

हालांकि कुछ ही वैज्ञानिकों ने इस तरह की सेल्फ ट्रैकिंग का अध्ययन किया है, लेकिन इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि रोजाना के ब्योरे लिखने से फायदे हो सकते हैं.

हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की फ्रांसिस्का गिनो ने तकनीकी प्रशिक्षण ले रहे कॉल सेंटर के कर्मचारियों के समूह का अध्ययन किया.

उन्होंने पाया कि सिर्फ़ 10 मिनट के लिए दिन की गतिविधियों का ब्योरा लिखने से उनका प्रदर्शन 20 फीसदी सुधर गया.

हो सकता है कि हममें से कई लोग अपनी ज़िंदगी के बारे में इतने विस्तृत ब्योरे न लिख पाएं, फिर भी ज़्यादातर मनोवैज्ञानिक सहमत होंगे कि इस पर कुछ मिनट ख़र्च करने से बड़े फायदे हो सकते हैं, भले ही इसका सीधा मतलब उन दैनिक खुशियों को पहचानना हो जो ज़िंदगी को थोड़ा और मज़ेदार बना देते हैं.

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अपने लिए सर्च इंजन

लिखना पसंद न हो तो भी सेल्फ ट्रैकिंग की जा सकती है. मिसाल के लिए, आप पोर्टेबल "लाइफ़लॉगिंग" कैमरा खरीद सकते हैं जो दिन भर हर 30 सेकेंड पर आपकी तस्वीर खींच सकता है.

इस तरह के उपकरण कई बार डिमेंशिया से पीड़ित लोगों को दिए जाते हैं लेकिन कुछ सामान्य लोगों ने भी इसे अपनी ज़िंदगी पर नज़र रखने के लिए अपनाया है.

ऐसे कई यूज़र्स का दावा है कि तस्वीरें याद रखने में सहायक होती हैं. कुछ तस्वीरें "प्राउस्टियन मोमेंट" (अतीत की कोई याद आने वाला पल) को जगा देती हैं.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ हर्टफ़ोर्डशायर की मनोवैज्ञानिक अली मायर कहती हैं, "ढेर सारे विवरण सामने आ जाते हैं. वे सब मिलकर याददाश्त को समृद्ध कर देते हैं."

ऐसा लगता है कि तस्वीरें मनोवैज्ञानिक ट्रिगर का काम करती हैं जो घटनाओं के पूरे विवरणों को साथ ले आती हैं.

मायर इनको पक्का सबूत नहीं मानतीं. हालांकि कुछ शोध इन कहानियों का समर्थन करते हैं फिर भी इन्हें याददाश्त बढ़ाने वाला बताने से पहले वैज्ञानिक सबूतों की ज़रूरत होगी.

उम्मीद है कि एक दिन तस्वीरों को प्रॉसेस करने वाले सॉफ्टवेयर इतने विकसित होंगे कि वे स्वचालित रूप से सारी तस्वीरों को सूचीबद्ध कर देंगे और आप क्या खा रहे हैं, किससे मिल रहे हैं या क्या कर रहे हैं, इस आधार पर उनको देखा जा सकेगा.

ज़िंदगी की संपूर्ण तस्वीर बनाने के लिए और आप किसी समय क्या कर रहे थे यह जानने के लिए तस्वीरों को अन्य डेटा से जोड़ा जा सकता है- जैसे कि आपका फिटबिट.

डबलिन यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर वैज्ञानिक कैथल गुरिन लाइफलॉगिंग के विशेषज्ञ हैं. वह इनको सर्च इंजन मानते हैं जो "किसी व्यक्ति की ज़िंदगी के अनुभवों में गहरे गोते लगाता है."

तस्वीरों में से स्वचालित रूप से किसी घटना की तस्वीर खोजकर आप उसकी याद ताजा कर सकते हैं जो स्वाभाविक रूप से आपके दिमाग में नहीं आती, जैसे आपने किसी शख्स को आख़िरी बार कब देखा या आपने कोई चीज़ कब हासिल की.

गुरिन को लगता है कि इस तरह की टेक्नोलॉजी तब और महत्वपूर्ण हो जाएगी यदि पोर्टेबल कैमरे वाला "स्मार्ट" चश्मा बाजार में आ जाए. (गूगल ने ऐसी कोशिश की थी, लेकिन अभी तक क़ामयाबी नहीं मिली है.)

ज़िंदगी को जीभर कर जीना

विलारोएल फिलहाल नोटबुक लिखना जारी रखेंगे. उनका कहना है कि एक बार उनके पास लाइफ़लॉगिंग कैमरा था जिसका उन्होंने कुछ साल तक इस्तेमाल किया था, लेकिन सभी तस्वीरों का ट्रैक रखना उनको उबाऊ लगा.

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अपने तजुर्बों को दर्ज करने के उनके पसंदीदा साधन कागज़, कलम और एक्सेल शीट ही हैं.

वह नोट लिखने में रोजाना कम से कम एक घंटा ख़र्च करते हैं. परिष्कृत समय प्रबंधन से उन्होंने जो दक्षता हासिल की है उससे वह इस समय की भरपाई कर लेते हैं.

विलारोएल मानते हैं कि इसकी कुछ खामियां भी हैं. जैसे- वह यह देखकर निराश हो जाते हैं कि उन्होंने कितना वक़्त बिना कुछ किए बर्बाद कर दिया. लेकिन बीते हुए समय के बारे में वह जज बनने की कोशिश नहीं करते.

वह यह भी नहीं मानते कि अतीत की दर्दनाक घटनाएं उनको परेशान करती हैं. "मैंने पाया है कि यदि कुछ बुरा हुआ है जिसके लिए मैं ख़ुद को दोषी ठहराता हूं तो नोटबुक देखने से मुझे पूरा संदर्भ समझने में मदद मिलती है."

"यह मुझे अहसास कराता है कि मैं जितना बेहतर कर सकता था वह मैंने किया."

उनके परिवार को भी ज़्यादा शिकायतें नहीं हैं, हालांकि वह मजाक में कहते हैं कि इससे उनको बर्थडे गिफ्ट के बारे में याद रहता है.

विलारोएल का 10 साल का प्रयोग फरवरी 2020 में ख़त्म होने वाला था, लेकिन उन्होंने इसे आगे भी जारी रखने का फ़ैसला किया है.

"मैंने पूरी ज़िंदगी के लिए यह आदत अपना ली है. मैं जानता हूं कि इसमें दुहराव है, लेकिन यह ज़िंदगी को जीभर कर जीने का तरीका है."

(मूल कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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