दिल टूट जाने पर मरहम का काम करता है खाना

  • 29 दिसंबर 2019
केस रोल का दरवाजा इमेज कॉपीरइट Katie Horwich

जब घर में किसी की मौत हो जाती है तो लगता है हमारी दुनिया उस शख़्स की सांसों के साथ ही थम गई है. तब ना कुछ खाने का होश रहता है ना ही पीने का. लेकिन क्या उस घड़ी में खाना हमारे दुख को कम कर सकता है?

कहा जाता है कि किसी की मौत से होने वाले दुख और तनाव को कम करने में अच्छा खाना सबसे कारगर साबित हो सकता है.

मध्य पश्चिमी अमरीका के मिनेसोटा राज्य में रहने वाली लिंडसे ओस्ट्रोम जब साढ़े पांच माह की गर्भवती थीं तभी उन्होंने एक प्रीमेच्योर बच्चे को जन्म दे दिया था. उन्होंने उसका नाम एफ़टन रखा लेकन जन्म के अगले दिन ही एफ़टन की मौत हो गई.

एफ़टन की मौत ने लिंडसे को शारीरिक और मानसिक तौर पर तोड़कर रख दिया. वो रात-दिन बस रोती रहतीं. दिनभर अपने घर में बंद रहतीं, न कुछ खातीं, न किसी से बात करतीं.

दुख की उस घड़ी को याद करते हुए वो बताती हैं, "अपने बेटे को खोने के बाद मेरे लिए मेरे जीवन का कोई अर्थ ही नहीं रह गया था."

दुख के समंदर से बाहर निकलने में खाने ने लिंडसे की मदद की. वो एक फ़ूड ब्लॉग चलाती हैं जिसका नाम 'पिंच ऑफ़ यम' है.

उन्होंने अपने ब्लॉग में बताया है कि कैसे उनकी ज़ुबान से खाने का स्वाद ही मिट गया था. उनके पेट में सिर्फ़ दुख के अलावा और किसी दूसरी चीज़ के लिए कोई जगह ही नहीं बची थी.

वो बताती हैं, "मैं ख़ूब तीखा, मसालेदार और रंग-बिरंगा खाना पसंद करने वाली शख़्स थी लेकिन उस घटना के बाद मुझे सिर्फ़ आलू का सादा सूप या सफ़ेद ब्रेड-बटर या कोई भी सादा सा खाना ही चाहिए था."

लिंडसे अपने उन दोस्तों और रिश्तेदारों की शुक्रगुज़ार हैं जिन्होंने उस वक़्त उनके घर में खाना पहुंचाया जब वो खाने की अपनी इच्छा ही छोड़ चुकी थीं. उनके दोस्त उनके घर में कूकर और ब्रेड लेकर आए जिससे वो खाने के लिए दोबारा तैयार हो सकें.

इमेज कॉपीरइट A Pinch of Yum
Image caption आलू का क्रीमी सूप

लिंडसे कहती हैं, "उस वक़्त मिला खाना उनके लिए किसी लाइफ़लाइन से कम नहीं था. मैंने तय किया कि एक वक़्त में एक बाउल सूप लेना है. इससे मुझे यह एहसास हुआ कि मेरे भीतर अभी भी ज़िंदगी है और उसे बचाए रखने के लिए खाना होगा."

लिंडसे को एहसास हुआ कि ढेर सारे प्यार से बनाई गई सामान्य डिश भी उनके लिए कितनी ख़ास हो गई थीं. उन्होंने अपने दोस्तों और परिजनों से उन डिशों की रेसिपी पूछी और फिर उन्हें अपने ब्लॉग में प्रकाशित किया.

उन्होंने एक टूटे दिल के लिए खाना नाम से पूरी सिरीज़ लिखी जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे अवसाद में गए किसी इंसान के लिए खाना बनाया जाए.

उन्होंने इन डिशों की तस्वीरें #feedingabrokenheart के साथ इंस्टाग्राम पर पोस्ट कीं जो कुछ ही वक़्त में ख़ूब वायरल होने लगीं. इन पोस्ट में लिंडसे ने लिखा ये सारा खाना खाकर वो अपने दुख से बाहर निकल गईं.

इमेज कॉपीरइट Instagram
Image caption हैशटेग #feedingabrokenheart के साथ पोस्ट की गई तस्वीरें

अमरीका की मेरीलैंड यूनिवर्सिटी में न्यूरोलॉजी की प्रोफ़ेसर लीसा शलमैन कहती हैं, "जब हमारे साथ कोई हादसा होता है तो दुख की उस स्थिति में सबसे पहले हम अवसाद में जाते हैं. हम उस दुख के वक़्त ख़ुद को तकलीफ़ देने की तरफ़ बढ़ने लगते हैं और यही वजह है कि हमारी भूख ख़त्म हो जाती है."

प्रोफ़ेसर शलमैन के पति बिल की जब मौत हुई तो उन्हें भी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. तब उन्होंने एक किताब लिखी जिसमें उन्होंने बताया कि दुख के वक़्त हमारा दिमाग़ कैसे काम करता है.

वो यह समझना चाहती थीं कि दुख की स्थिति में हमारे शरीर पर क्या-क्या असर पड़ता है और उस हालत में खाना कैसे हमारी मदद करता है.

प्रोफ़ेसर शलमैन बताती हैं, "जब हम अपने किसी बेहद क़रीबी व्यक्ति को खो देते हैं तो हमें अचानक से झटका लगता है. उस वक़्त हमारा दिमाग़ किसी सुरक्षाकर्मी की तरह काम करने लगता है. वह हमारी सबसे दर्दभरी यादों को ब्लॉक करने लगता है और तब हम भावनात्मक रूप से कमज़ोर होने लगते हैं.''

इमेज कॉपीरइट Katie Horwich

प्रोफ़ेसर शलमैन कहती हैं कि इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए हमें अपनी यादों पर दोबारा ध्यान देना होता है. ऐसे में खाना बहुत अहम किरदार निभा सकता है.

वो बताती हैं, "दुख की स्थिति से बाहर निकलने के लिए खाना सचमुच बहुत लाभकारी साबित होता है. मैं अपनी बात करूं तो मैं वो खाना खाने लगी जो मेरे पति को पसंद था, इससे मुझे बहुत आराम मिला."

कुछ साल पहले जब एमी के पिता की मौत हुई तब खाना ही उनके लिए वो ज़रिया बना जिससे वो अपने पिता के क़रीब महसूस कर सकती थीं. उनके पिता एक यहूदी-रोमन प्रवासी थे जो आर्किटेक्ट के तौर पर काम करते थे. इसके साथ ही वो खाने का छोटा सा बिज़नेस भी चलाते थे.

वहां पर एक खाना था जो एमी को अपने पिता की याद बहुत ज़्यादा दिलाता था वह है कच्चा प्याज़

एमी कहती हैं, "वो कच्चे प्याज़ को अक्सर खाने में ऊपर से डाल देते थे."

हालांकि एमी को कच्चे प्याज़ का स्वाद पसंद नहीं था लेकिन फिर भी उन्होंने यह खाना शुरू किया.

वो कहती हैं, "मैं अपने पिता के लिए वो खाती हूं."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

किसी मृत व्यक्ति के साथ ख़ुद को जोड़ने के लिए खाना कोई नया विचार नहीं है. उदाहरण के लिए प्राचीन रोम में, जब किसी की मृत्यु हो जाती थी तो एक प्रथा के तहत खाना और वाइन को मृत शख़्स के मुंह में डाला जाता था.

वहीं हिंदुओं के बीच भी किसी व्यक्ति की मौत के 12वें दिन भोज करवाया जाता है.

इसी तरह से बौद्ध बहुल देश जापान में परिवार सुया नामक एक परंपरा का पालन करते हैं. इस परंपरा में मृत व्यक्ति को बीच में रखकर फोटो खिंचवाई जाती है. इसके साथ ही बीच में एक कटोरी चावल और उस कटोरी पर सीधी खड़ी एक जोड़ी चॉपस्टिक होती है.

मेक्सिको में किसी के मरने के नौ दिन बाद तक समुदाय के लोग खट्टे-मीठे स्वाद वाला मोल सॉस खाते हैं. इस परंपरा को नोवेनारियो कहते हैं.

टेक्सास की बेलर यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर ऑफड रीलिजन कैन्डी कैन कहते हैं कि चीन जैसे देशों में मृतकों को देखने के लिए खाना लेकर जाने की परंपरा में वक़्त के साथ कुछ बदलाव आने लगे हैं.

वो कहती हैं, "पुराने दिनों में मृतक के पास संतरे, जापानी फल (रामफल), अनानास और पोर्क लेकर जाते थे. लेकिन अब वक़्त बदला है और लोग फ्ऱेंच फ्ऱाइज़, शेक और बिग मैक जैसे अमरीकी खाने की चीज़ें भी लेकर जाने लगे हैं."

"कभी कभी तो ये खाना खा लिया जाता है, और कभी-कभी कब्रिस्तान के कर्मचारी साफ़-सफ़ाई करते वक़्त इसे फेंक देते हैं."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

पश्चिमी दुनिया में इस तरह की परंपरा आमतौर पर देखी नहीं जाती लेकिन अमरीका के दक्षिणी हिस्से में कैसरोल रखने की परंपरा अब लोग मानने लगे हैं.

प्रोफ़ेसर कैन कहती हैं, "कई जगहों पर किसी के मरने के बाद उसकी याद में कैसरोल फ़ंक्शन यानी लोगों के लिए भोज का आयोजन किया जाता है. इस दौरान मृतक से जुड़ी यादें ताज़ा की जाती हैं और लोग साथ मिलकर खाना खाते हैं. न्यू ऑर्लियन्स में इस भोज में जंम्बालया या आलू होता है जबकि टेक्सस में शीट केक होता है."

"माना जाता है कि परिवार के एक सदस्य की मौत के बाद भी आप स्थानीय समुदाय में घुल-मिलकर रहें."

माना जाता है कि व्यक्ति की मौत के बाद भी वो व्यक्ति हमारी यादों में जीवित रहता है और उसके पसंसदीदा खाने की यादें भी हमारे ज़ेहन में रहती हैं.

प्रोफेसर कैन कहती हैं कि अधिकतर जगहों पर शोक मनाने को असामान्य माना जाता है और इस कारण लोगों की कोशिश होती है कि परिवार को आगे बढ़ने दें. इस प्रक्रिया में मृत व्यक्ति के साथ खाने के माध्यम से जुड़े रिश्ते को व्यक्ति को बनाने का मौक़ा नहीं मिलता जो कि दुख से उबरने का सबसे बेहतर रास्ता हो सकता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार