इटली में सरकारें इतनी जल्दी क्यों गिर जाती हैं: दुनिया जहान

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इटली के प्रधानमंत्री जिजेज्पी कौंटे

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जनवरी 2021, चमचमचाती काली कार में रोम की सड़कों पर घूमता हुआ एक व्यक्ति इटली के राष्ट्रपति के सरकारी आवास पर पहुंचता है और उन्हें अपना इस्तीफ़ा थमा देता है.

ये व्यक्ति कोई और नहीं, इटली के प्रधानमंत्री जिजेज्पी कौंटे थे.

इतिहास बताता है कि साल 1948 में इटली के गणराज्य बनने के बाद औसतन लगभग हर साल एक प्रधानमंत्री ने अपना इस्तीफ़ा दिया है.

तो इस हफ्ते दुनिया जहान में हम ये सवाल पूछ रहे हैं कि इटली में सरकारें इतनी जल्दी क्यों गिर जाती हैं.

इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमने कुछ विशेषज्ञों से बात की.

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मुसोलिनी की छाया

बेनेटो मुसोलिनी साल 1922 में इटली के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने तानाशाही से तब तक शासन चलाया, जब तक कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1943 में उन्हें गिरफ्तार नहीं कर लिया गया.

इटालियन पॉलिटिकल साइंस रिव्यू के एडिटर-इन-चीफ़ प्रोफेसर मार्टिन बुल कहते हैं, "मुझे लगता है कि इटली की संस्कृति और राजनीति पर इसका बड़ा गहरा असर पड़ा. मुसोलिनी ने बताया कि कमज़ोर राजनीतिक तंत्र में सत्ता पर क़ब्ज़ा कैसे किया जाता है. उन्होंने सभी राजनीतिक दलों पर पाबंदी लगाई और जो थोड़ा बहुत प्रतिनिधित्व दिया भी, वो दरअसल अपनी तानाशाही को छिपाने के लिए किया."

वो कहते हैं, "फासीवाद को हरा तो दिया गया, लेकिन इसके साथ ही मुसोलिनी के समर्थकों और विरोधियों के बीच सिविल वॉर शुरू हो गया. सिविल वॉर ख़त्म भी हो गया लेकिन मुसोलिनी के लिए सहानूभूति रखने वाले लोग ख़त्म नहीं हुए. हालांकि इटली के संविधान में फासीवाद के ख़िलाफ़ भावनाएं साफ़ नज़र आती हैं."

मुसोलिनी के बाद इटली ने राजनीतिक प्रणाली दोबारा इस तरह बनाने की कोशिश की, जिसमें किसी दूसरे मुसोलिनी के लिए अपने पैर जमाने की गुंजाइश ना हो. इस नए तंत्र में ये सुनिश्चित किया गया कि कोई एक राजनीतिक दल या कोई एक व्यक्ति बहुत अधिक ताकतवर ना बन जाए.

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प्रोफेसर मार्टिन बुल कहते हैं, "इसके लिए व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में अधिकारों और शक्तियों को बांटा गया. इससे सरकारी तंत्र में काम की गति धीमी पड़ गई, जहां जगह-जगह वीटो हैं, अवरोधक हैं और समझौता करने की मजबूरी है."

इटली में सरकार बनाने के लिए अलग-अलग पार्टियों को गठबंधन बनाना पड़ता है, लेकिन सहमति नहीं बनने पर गठबंधन टूटने में ज़रा भी देर नहीं लगती. क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स लगभग हमेशा सत्ता में रहे, लेकिन इसके लिए उन्हें मन मारकर गठबंधन बनाने पड़े.

प्रोफेसर मार्टिन बुल के मुताबिक, "सत्ता में आने के लिए और सत्ता में टिके रहने के लिए भ्रष्टाचार ज़रूरी हो गया. लगभग 50 साल से इटली में यही हो रहा है. हर नई सरकार के पीछे सीक्रेट करप्शन है, इटली के नेताओं का भ्रष्टाचार वर्षों तक छिपा रहा, लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार का हर सीक्रेट सबको पता चल गया."

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भ्रष्टाचार का बोलबाला

पीसा यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर अल्बर्टो वानुची वर्ष 1992 का एक मामला बताते हैं जब इटली की राजनीति में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बड़ा मोर्चा खोला गया था.

वो कहते हैं, "जब ये जांच-पड़ताल शुरू हुई, तब ये रिश्वत का बहुत छोटा मामला था. इस मामले में रिश्वत की बहुत कम रकम शामिल थी, जो एक छोटे कारोबारी ने एक नेता को दी थी."

उस समय इटली की गठबंधन सरकार में सोशलिस्ट पार्टी शामिल थी. सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य मारियो कियेज़ो ने भ्रष्टाचार के मामलों में जांच-पड़ताल के दौरान अपनी पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों के बारे में सनसनीखेज और चिंताजनक बातें बताईं. इससे इटली के पूरे राजनीतिक तंत्र में रिश्वत और भ्रष्टाचार का तानाबाना उजागर हो गया.

प्रोफेसर अल्बर्टो वानुची के मुताबिक, "तब ये बात आधिकारिक तौर पर नहीं कही जाती थी, लेकिन पता सबको था कि हर उद्यमी को पॉलिटिकल पार्टी को पैसा देना है जिसके बदले में उन्हें प्रोटेक्शन मिलता है."

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इटली में सरकारें इतनी जल्दी क्यों गिर जाती हैं? Duniya Jahan

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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मारियो कियेज़ो ने जब ये सब ज़ाहिर कर दिया, तब संसद में पूर्व प्रधानमंत्री बेटिनो क्राक्सी ने अपने साथियों को बड़े नाटकीय तरीके से संबोधित किया, जिसके बाद कहने-सुनने के लिए कुछ नहीं बचा.

प्रोफेसर अल्बर्टो वानुची बताते हैं, "बेटिनो क्राक्सी को सार्वजनिक रूप से ये कहना पड़ा कि इटली के पूरे पॉलिटिकल सिस्टम में फाइनेंसिंग की गड़बड़ी है और ये पूरी तरह से ग़ैर-क़ानूनी है. यदि हमने इन मामलों को आपराधिक मामला माना, तो इटली के पूरे पॉलिटिकल सिस्टम को ग़ैर-क़ानूनी मानना पड़ेगा."

जांच-पड़ताल में पता चला कि इटली की राजनीति में शामिल लगभग हर व्यक्ति भ्रष्टाचार में लिप्त है. इसके नतीजे भी सामने आए और कुछ ही वर्षों में चार पूर्व प्रधानमंत्री, संसद के सैकड़ों सदस्य और हज़ारों प्रशासनिक अधिकारी कटघरे में खड़े नज़र आए.

प्रोफेसर अल्बर्टो वानुची बताते हैं, "इसके बाद इटली की जो नामी राजनीतिक पार्टियां थीं, उनमें ज़बर्दस्त बदलाव आया. कुछ पॉलिटिकल पार्टियां तो गायब ही हो गईं. एक-दो वर्ष के भीतर हर बड़ी पार्टी ख़त्म हो गई और ढेर सारी नई पार्टियां बन गईं. इस दौर में एक नया नेता सामने आया जिसका राजनीति से कोई लेनादेना नहीं था और उसका नाम था सिल्वियो बर्लुस्कोनी."

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राजनीति का नया दौर

कैथोलिक यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस की एसोसिएट प्रोफेसर जूलियस आंद्रे कहती हैं, "मैं उस समय 14 साल की थी, लेकिन मुझे वो स्पीच याद है जिसमें उन्होंने चुनाव लड़ने का एलान किया था. तब उनकी बात ही अलग है, उनका संदेश बाकियों से अलग था, उनका अंदाज़ सबसे जुदा था. लोगों ने तब जो देखा-समझा, वो उनके लिए एकदम नया अनुभव था."

उन्हें याद है कि 26 जनवरी 1994 में उन्होंने जाने-माने मीडिया दिग्गज सिल्वियो बर्लुस्कोनी को टीवी पर देखा था जिन्होंने अपनी अलग पॉलिटिकल पार्टी बनाई थी.

सिल्वियो बर्लुस्कोनी उसी साल पहली बार प्रधानमंत्री बने और साल 2013 तक सत्ता में रहे. अपने कार्यकाल के दौरान सिल्वियो बर्लुस्कोनी ने इटली की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया.

जूलियस आंद्रे बताती हैं, "बर्लुस्कोनी ने राजनीतिक संगठन का एक नया मॉडल बनाया. इस मॉडल में पार्टी अपने करिश्माई नेता के व्यक्तिगत धन और संगठन के संसाधनों और पूरी तरह निर्भर थी. ये मॉडल पचास साल से जारी उस मॉडल के एकदम विपरीत था जो जनसमूह की बुनियाद पर आधारित था, जिस पर इससे पहले की पॉलिटिकल पार्टियां काम कर रही थीं. जनीति के इस दौर में निर्णय लेने का अधिकार मुट्ठीभर लोगों के पास था. बीते दो-तीन दशकों में हुआ ये कि पार्टी और राजनीति में बस उन्हीं का दबदबा रहा."

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दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार इतनी कड़ी पाबंदियां

बर्लुस्कोनी और उनकी पार्टी ने इटली में बने राजनीतिक निर्वात को बखूबी भरने का काम किया. कुछ अन्य पार्टियों ने भी उनका अनुसरण करने की कोशिश की. लेकिन इसके साथ ही इटली की राजनीति में अनिश्चितता बढ़ती गई. नब्बे के दशक से इटली की राजनीति एक नई करवट ले रही थी.

जूलियस आंद्रे के मुताबिक, "इटली की संसद ने राजनीति में आबादी के अनुपात के हिसाब से प्रतिनिधित्व को मंज़ूरी दी. इससे मामूली पार्टियों की भूमिका बढ़ती गई. इटली में फिलहाल ऐसी 30 पार्टियां हैं. इससे सरकार में अलग-अलग समूह बनने लगे जिनकी वजह से प्राथमिकताओं में होड़ लगने लगी. सरकार बनाने के लिए ऐसी पार्टियों में गठबंधन होने लगा जिनके विचारों की दिशा एकदम विपरीत थी."

ऐसे में तकरार बढ़ने लगी और उन्हें साथ लेकर चलना मुश्किल होने लगा. किसी पार्टी के नेता को लगता कि उनके हितों की अनदेखी हो रही है या उन्हें तवज्जो नहीं दी जा रही है, तो वे कभी भी अपना समर्थन वापस लेने लगे.

शायद यहां हम इस सवाल के जबाव के सबसे नज़दीक पहुंच रहे हैं कि इटली में सरकारें इतनी जल्दी-जल्दी क्यों गिर जाती हैं.

जूलियस आंद्रे कहती हैं, "इटली में सरकारें लगातार इस वजह से गिरती रही हैं कि गठबंधन में बहुत सारी पार्टियां शामिल होती हैं. सरकारें वोट ऑफ कॉन्फिडेंस में कमी होने की वजह से नहीं गिरतीं. बल्कि इस वजह से गिरती हैं कि किसी मुद्दे पर उनके बीच एक राय नहीं बन पाती. असहमतियां हद से ज्यादा बढ़ जाती हैं. गठबंधन में दिक्कतें बढ़ती जाती हैं और आखिर में प्रधानमंत्री अपना इस्तीफ़ा देने पर विवश हो जाते हैं."

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अब आगे क्या

अब मिलिए हमारी चौथी और आख़िरी विशेषज्ञ से जिनका नाम है अन्नाबुल. वो बताती हैं, " मैं मूल रूप से इटली की ही रहने वाली हूं और पेशे से प्रोफेसर हूं. यूरोपीय संघ से मिला पैसा और उस पैसे पर हुआ विवाद इस बार सरकार गिरने की वजह बना, जिसे लेकर गठबंधन की एक पार्टी में मतभेद हो गए. हालांकि इसके पीछे असली वजह निजी हित थे."

यूरोपीय संघ से फंडिंग का ऑफर इटली को ऐसे समय मिला था, जब कोरोना महामारी की वजह से उसकी आर्थिक हालत ख़राब हो चुकी थी. दूसरी बात ये भी थी कि इटली कई वर्षों से ख़स्ताहाल अर्थव्यवस्था से जूझ रहा था. देश के युवा बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं.

सरकार गिरने के एक महीने बाद इटली के राष्ट्रपति ने आर्थिक प्रबंधन में माहिर माने जाने वाले मारियो ड्रागी के हाथ में देश की कमान सौंपी.

अन्नाबुल कहती हैं, "मारियो ड्रागी, सुपर मारियो हो सकते हैं, लेकिन इटली के मौजूदा हाल में उनसे कुछ ज्यादा ही उम्मीदें की जा रही हैं. वो कोई जादूगर नहीं है. मारियो ड्रागी की सरकार बाकी पार्टियों के लिए एक मौका है कि वो एकजुट होकर एक सुर में बात करें. इटली को राजनीति के लिहाज से एकजुटता की ज़रूरत है."

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पुल टूटने के कारणों की जाँच शुरू कर दी गई है.

मारियो ड्रागी के पास यूरोपियन सेंट्रल बैंक को संभालने का अनुभव है, हालांकि इटली की पार्टी पॉलिटिक्स में कभी उनका दख़ल नहीं रहा.

अन्नाबुल कहती हैं, "मैं इस बात से इंकार नहीं करूंगी कि इटली की राजनीतिक प्रणाली क्षणभंगुर है जो कभी भी बिखर सकती है. लेकिन मैं साथ ही ये भी कहूंगी कि इटली की राजनीति में बहुत लचक है जिसकी वजह से इमरजेंसी में ऐसे नेता भी एकजुट हो जाते हैं जिनमें छत्तीस का आंकड़ा है. तो हो सकता है कि इस बार भी देश हित में सब एकजुट हो जाएं."

इसमें संदेह नहीं कि इटली के मौजूदा हालात की जड़ें उसके इतिहास में निहित है जहां तानाशाह मुसोलिनी अब भी लोगों के ज़हन में हैं, जहां संविधान में ये सुनिश्चित किया गया है कि कोई एक व्यक्ति, कोई एक पार्टी ज़रूरत से ज़्यादा ताकतवर ना हो जाए, जहां इस बात का ख़्याल रखा गया है कि आबादी के अनुपात के हिसाब से समुचित प्रतिनिधित्व मिले.

लेकिन इन्हीं उपायों में ये कमज़ोरी भी छिपी हुई है कि गठबंधन सरकार में छोटी-छोटी कई पार्टियां शामिल होती हैं जो किसी चेन में अलग-अलग कड़ियों की तरह होती हैं. एक कड़ी के अलग होते ही पूरे चेन बिखर जाती है.

इतिहास इस बात का गवाह है कि इटली में किसी समस्या का समाधान एक व्यक्ति पर केंद्रित नहीं हो सकता. इटली की मौजूदा समस्या का समाधान राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन में निहित है. लेकिन क्या इटली इस बड़े बदलाव के लिए तैयार है....ये एक अलग सवाल है.

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