स्वेज़ नहर जब छह दिन की जंग के कारण आठ साल के लिए बंद हो गई

स्वेज़ नहर

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साल 1967 से 1975 के बीच 14 व्यापारिक जहाज स्वेज़ नहर में फंसे रहे थे

दुनिया भर में होने वाले कारोबार के दसवें हिस्से से भी ज़्यादा हर साल स्वेज़ नहर से होकर गुजरता है. लेकिन इस हफ़्ते सालों से चले आ रहे इस सिलसिले में ठहराव आ गया. समंदर के इस रास्ते पर लगा ट्रैफिक जाम सचमुच बहुत ऐतिहासिक है.

स्वेज़ नहर के बीच में फंसे 400 मीटर लंबे और 60 मीटर चौड़े 'एवरग्रीन' जहाज को रास्ते से हटाने की कोशिशें शनिवार तक जारी थीं. 'एवरग्रीन' को स्वेज़ नहर के रास्ते से हटाने की मुहिम में लगे अधिकारियों का कहना है कि इस ऑपरेशन में कई दिन या फिर शायद हफ़्तों लग सकते हैं.

और ये सबकुछ छोटी बात नहीं है. स्वेज़ नहर से हर दिन 9.5 अरब डॉलर का सामान गुजरता है. 'एवरग्रीन' की घटना का जो भी असर पड़े लेकिन ये पहली बार नहीं है कि स्वेज़ नहर का रास्ता कारोबार के लिए बंद हुआ है.

ये जून, 1967 की बात है. मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की इसराइल से लड़ाई चल रही थी और दोनों धड़ों की गोलाबारी के बीच 15 व्यापारिक जहाज स्वेज़ नहर के रास्ते में फंस गए. इतिहास की किताबों में उस जंग का जिक्र 'सिक्स डे वॉर' के नाम से होता है. और जैसा कि इतिहास गवाह है, वो जंग केवल छह दिनों तक चली थी.

लेकिन स्वेज़ नहर का रास्ता बंद कर दिया गया था. नहर में फंसे 15 जहाजों में एक डूब गया और बाक़ी 14 जहाज आने वाले आठ सालों के लिए एक तरह से वहीं कैद होकर रह गए. लेकिन सवाल उठता है कि स्वेज नहर इतने लंबे समय के लिए क्यों बंद रहा? और इस संघर्ष की शुरुआत कैसे हुई थी?

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अरब-इसराइल युद्ध

राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर के नेतृत्व में मिस्र ने मई, 1967 से इसराइल की सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ाने की शुरुआत कर दी थी. उनका कहना था कि अगर इसराइल के साथ किसी किस्म की जंग हुई तो उनका मक़सद अपने पड़ोसी देश को नेस्तनाबूद कर देने का है.

सीरिया ने भी इसराइल को तबाही की ऐसी ही धमकियां देनी शुरू कर दी थी. हफ़्तों तक तनाव बने रहने के बाद पांच जून, 1967 को आख़िर लड़ाई शुरू हो गई. उसी दिन इसराइल ने सबको चौंकाते हुए मिस्र पर बमबारी कर दी और उसकी वायु सैनिक क्षमता का 90 फीसदी बर्बाद कर दिया.

सीरिया के एयरफोर्स का भी इसराइल ने यही हश्र किया. जब ये बमबारी हो रही थी तो उस वक़्त बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, फ्रांस, पोलैंड, स्वीडन, वेस्ट जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका के 15 व्यापारिक जहाज उस वक़्त स्वेज़ नहर से होकर गुजर रहे थे.

पीटर फ्लैक उस समय ब्रितानी जहाज 'एगापेनोर' पर तैनात थे. उन्होंने साल 2010 में बीबीसी रेडियो फोर को बताया था, "जैसे ही हमारा जहाज स्वेज़ नहर के दक्षिणी सिरे पर पहुंचा, हमारे कैप्टन ने बताया कि इसराइल और अरब देशों के बीच जंग शुरू हो चुकी है."

"जैसे ही हम आगे बढ़े, हमने लड़ाकू विमानों को रेगिस्तान से उड़ते देखा. मुझे अच्छी तरह से याद है. इसराइली विमान काफी नीची उड़ान भर रहे थे, वे मिस्र के सैनिक हवाई अड्डे पर बमबारी कर रहे थे और उनका निशाना अचूक था."

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तस्वीर के ऊपरी सिरे के आख़िरी कोने में 'एवरग्रीन' जहाज को देखा जा सकता है, इसकी वजह से ट्रैफिक रुक गया है

स्वेज़ नहर का रास्ता

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ड्रामा क्वीन

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मलेशिया से रबर और प्लास्टिक के खिनौले ब्रिटेन ले जा रहा 'एगापेनोर' स्वेज़ नहर में फंसे उन 15 जहाजों में से एक था.

चीन से अखरोट और पाम ऑयल लेकर जा रहा 'मेलम्पुस' जहाज पर उस वक़्त तैनात रहे जॉन ह्यूग्स ने बीबीसी रेडियो फोर को बताया था, "सिनाई के रेगिस्तान से दो इसराइल लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी. वे हमारे जहाज के ऊपर से गुजरे. आवाज़ इतनी तेज़ थी कि हमें लगा, कान के परदे फट जाएंगे."

इसराइल की बमबारी में एक जहाज डूब गया और वो एक अमेरिकी जहाज था. इस बीच स्वेज़ नहर में मौजूद जहाजो को उसकी ग्रेट बिटर झील में पनाह लेनी पड़ी.

अमेरिका के कैंपबेल यूनिवर्सिटी में सामुद्रिक इतिहास के प्रोफ़ेसर सैल मर्कोग्लियानो बताते हैं, "स्वेज़ नहर में उस वक्त फंसे जहाज खुद टारगेट के तौर पर नहीं देखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने ग्रेट बिटर झील में पनाह ली थी."

युद्ध के दूसरे दिन मिस्र ने स्वेज़ नहर के आख़िरी सिरे पर जहाज डुबो दिए. वहां विस्फोटक लगाए गए ताकि रास्ता ब्लॉक हो जाए और इसराइल आने-जाने के लिए स्वेज़ नहर का इस्तेमाल नहीं कर सके. तीनों अरब देशों की हार के साथ ये जंग दस जून को ख़त्म हो गई. लेकिन मिस्र ने स्वेज़ नहर का रास्ता बंद रखा और वहां फंसे 14 जहाज बाहर नहीं निकल सके.

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छह दिनों तक चली इस लड़ाई में इसराइल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया को करारी शिकस्त दी

ग्रेट बिटर लेक एसोसिएशन

संघर्ष के चरम के समय और तनाव ख़त्म होने के बाद ग्रेट बिटर झील में फंसे जहाजों में ज़िंदगी उबाऊ होने लगी. साल 2010 में बीबीसी रेडियो फोर पर प्रसारित हुए प्रोग्राम 'द येलो फ्लीट' के प्रेज़ेटर पीटर स्नो ने बताया कि कूटनीतिक बातचीत के बाद जहाज पर फंसे चालक दल के सदस्यों को उनके घर भेज दिया गया लेकिन उनमें से कई लोगों को तीन महीनों तक वहीं रहना पड़ा.

प्रोफ़ेसर सैल मर्कोग्लियानो बताते हैं, "स्वेज़ नहर में फंसे जहाज जिन देशों के थे, उनका मिस्र और इसराइल से कोई समझौता नहीं हो सका. ये उम्मीद की गई थी कि कोई रास्ता निकल जाएगा लेकिन ऐसा हो नहीं पाया."

और जब स्वेज़ नहर की नाकाबंदी अनिश्चितकाल के लिए खिंचने लगी तो जहाजरानी कंपनियों ने जहाज पर लदे अपने सामान को और मशीनरी की देखभाल के लिए वहां अपने स्टाफ़ तैनात रखने लगे और समय-समय पर उनका तबादला भी किया जाने लगा.

मर्कोग्लियानो ने बताया कि यहां फंसे या फिर तैनात किए गए जहाजरानी कंपनियों के कर्मचारियों ने 'ग्रेट बिटर लेक एसोसिएशन' का गठन किया ताकि उनका काम चलता रहे और वे मानसिक रूप से स्वस्थ बने रहे.

'ग्रेट बिटर लेक एसोसिएशन' ने ओलंपिक की तर्ज पर एक खेल प्रतिस्पर्धा का भी आयोजन किया जिसमें डाइविंग, शूटिंग, स्प्रिंटिंग, वाटर पोलो, तीरंदाज़ी जैसे 14 खेलों में अलग-अलग देशों के बीच टूर्नामेंट आयोजित किए. यहां तक कि उन्होंने गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज़ मेडल भी बांटे.

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मिस्र ने स्वेज़ नहर के आखिरी छोर पर विस्फोटक लगाकर रास्ता बंद कर दिया था

एसोसिएशन ने टेबल टेनिस से लेकर फुटबॉल तक में भी हाथ आजमाया. अपना पोस्ट ऑफ़िस खोला, डाक टिकट भी जारी किए जो बाद में दुनिया भर के संग्रहकर्ताओं को दिया गया.

मर्कोग्लियानो बताते हैं, "लेकिन बाद के सालों में जब ये लगा कि ब्लॉकेड खत्म नहीं हो पाएगा तो कई कंपनियों ने अपने जहाज को नकारा करार दे दिया और बीमा कंपनी के सामने दावे किए."

इन जहाजों पर सिनाई के रेगिस्तान से उड़ने वाली धूल की एक पीली परत जमा हो गई और यूं ही छोड़ दिए जाने के बाद इन्हें 'येलो फ्लीट' कहा जाने लगा.

स्वेज़ नहर की नाकाबंदी का क्या नतीजा हुआ?

सामुद्रिक इतिहास के जानकार लिंकन पेन ने 'द सी एंड द सिविलाइज़ेशनः अ मैरिटाइम हिस्ट्री ऑफ़ द वर्ल्ड' नाम से किताब लिखी है.

उन्होंने बीबीसी मुंडो को बताया, "स्वेज़ नहर की शुरुआत 1869 में हुई थी लेकिन 1960 के दशक तक इस रास्ते से होने वाला कारोबार काफी बढ़ गया था. ये एक अहम सामुद्रिक मार्ग था क्योंकि इस रास्ते से होकर गुजरने वाले जहाजों को अफ्रीका से होकर नहीं जाना पड़ता था."

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साल 1975 में स्वेज़ नहर को यातायात के लिए फिर से खोला गया

लिंकन पेन बताते हैं, "इसलिए 1967 में जब ये रास्ता बंद हो गया तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ा और ये लंबे समय तक रहा. सबसे ज्यादा प्रभाव मिस्र पर ही पड़ा क्योंकि इसके कुल सकल घरेलू उत्पाद का चार फीसदी स्वेज़ नहर से गुजरने वाले जहाजों से ली जाने वाली फीस से आती थी."

"अरब देशों तके लिए मुश्किल बढ़ गई क्योंकि उनके यहां से जाने वाला तेल इसी रास्ते से होकर जाता था. नतीजा ये हुआ कि यूरोप को रूस ज़्यादा तेल बेचने लगा. दुनिया के कारोबार की गाड़ी को अमेरिका और यूरोप आगे बढ़ाते थे. तब चीन आर्थिक महाशक्ति नहीं था. यूरोप जो जहाज भेजता था, वो छोटे होते थे, उन्हें अफ्रीका के दक्षिणी किनारे से होकर गुजरना पड़ता था. इसे ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ गया."

लिंकन पेन कहते हैं, "चूंकि अफ्रीका का रास्ता लंबा था, इसलिए बाद में ये तय हुआ कि दो छोटे जहाज भेजने के बजाय एक बड़ा जहाज भेजा जाए और उसके बाद जहाजों का आकार बड़ा होने लगा. साल 1975 में जब स्वेज़ नहर का रास्ता दोबारा खुला तो ऐसे जहाज भी थे जो उस रास्ते से गुजर नहीं सकते थे. इसलिए इसके बाद से ही मिस्र नहर के रास्ते को चौड़ा करने के काम में लगा रहा."

स्वेज़ नहर कैसे खुली?

लिंकन पेन कहते हैं, "स्वेज़ नहर का रास्ता बंद करके मिस्र पश्चिमी देशों को संदेश देना चाहता था. उसका ये मानना था कि पश्चिमी देश इसराइल समर्थक हैं. मिस्र को लगा कि तेल की सप्लाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बाधा डालकर वो यूरोप और अमेरिका को इस बात के लिए मजबूर कर देगा कि मध्य पूर्व पर वे अपना स्टैंड बदलेंगे."

लेकिन मिस्र की ये सोच कारगर नहीं हो पाई और स्वेज़ नहर की नाकाबंदी लंबी खिंचने लगी. इसकी एक वजह तो ये भी थी कि कोई कमज़ोर नहीं दिखना चाहता था.

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स्वेज़ नहर में फंसा एवरग्रीन जहाज

हालांकि स्वेज़ नहर की नाकाबंदी ख़त्म होने का रास्ता एक और जंग से खुला. साल 1973 में योम किप्पुर की लड़ाई हुई. इसमें मिस्र और सीरिया ने इसराइल पर हमला कर दिया. ये हमला यहूदी कैलंडर की सबसे पवित्र मानी जानी वाली तारीख के दिन किया गया था.

लिंकन पेन बताते हैं, "योम किप्पुर की लड़ाई ने सभी पक्षों को बातचीत के टेबल पर लाकर बिठा दिया और लड़ाई का समझौता ये हुआ कि स्वेज़ नहर का रास्ता खोल दिया जाए. सब को ये बात समझ में आ गई कि स्वेज़ नहर को बंद कर देने से किसी को कुछ हासिल नहीं हुआ है. नासिर के उत्तराधिकारी अनवर अल सादात के नेतृत्व में मिस्र ने अपना पुराना फ़ैसला पलट दिया."

डूबोए गए जहाज और विस्फोटक को हटाने में साल भर का समय लगा और आख़िरकार पांच जून, 1975 को स्वेज़ नहर को यातायात के लिए एक बार फिर से खोल दिया गया. ये वही दिन था, जिस दिन अरब इसराइल युद्ध शुरू हुआ था.

वहां फंसे 14 जहाजों में से केवल दो ही ऐसे थे, जो दोबारा समंदर में तैर सकने के काबिल थे. ये दोनों जहाज जर्मनी के थे. बाक़ी जहाजों को वहां खींच कर निकाला गया या फिर वहीं पर उन्हें नष्ट कर दिया गया.

मर्कोग्लियानो बताते हैं, "इस तरह की बाधाएं ये बताती हैं कि स्वेज़ का रास्ता कितना अहम है और सामुद्रिक रास्ते से होने वाला कारोबार कितना जोखिम भरा है. एक जहाज या एक लड़ाई दुनिया के कारोबार में कभी भी अड़चन पैदा कर सकते हैं.

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