वो लोग जो पैसों के लिए काम नहीं करते

  • 15 सितंबर 2016
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दुनिया में लोग बहुत तरह के काम करते हैं. ज़्यादातर लोग अपने लिए काम करते हैं, कमाई करते हैं. बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो दूसरों के लिए जी-जान लगाकर काम करते हैं. कभी आपने सोचा है कि आख़िर इन लोगों को परोपकार की प्रेरणा कहां से मिलती है? दूसरों के लिए काम करने के लोगों को जज़्बे को क्या और बेहतर तरीक़े से इस्तेमाल किया जा सकता है?

अमरीका के रॉबर्ट ली इन्हीं सवालों का सामना कर रहे हैं. वो एक एनजीओ चलाते हैं, जो रेस्टोरेंट में बचा हुआ खाना ले जाकर भूखे लोगों को खिलाते हैं. रॉबर्ट के साथ जो लोग जुड़े हैं वो हर काम छोड़कर सवाब के काम में जुटे रहते हैं. उनका काम अमरीकी महाद्वीप के बारह देशों में फैला हुआ है.

कुछ सालों पहले तक रॉबर्ट ली एक कंपनी के मुलाज़िम थे. अपने लिए, पैसे कमाने के लिए काम करते थे. मगर अब वो अपनी एनजीओ चलाते हैं. अक्सर जब उनकी कंपनी के दफ़्तर में फ़ोन बजता है तो वो किसी रेस्टोरेंट से ही होता है कि आकर बचा हुआ खाना ले जाएं. उनकी टीम का हर सदस्य इस काम को अंज़ाम देना चाहता है.

अब इस उत्साह, इस ऊर्जा का का सही इस्तेमाल करना रॉबर्ट की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है. इसलिए रॉबर्ट अपनी टीम को सलाह देते हैं कि हर फ़ोन कॉल को सुनकर बाहर भागने के बजाए वो कई जगह से एक साथ खाना जमा करने का प्लान बनाकर निकलें.

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एनजीओ चलाने वाली तारा हॉफमैन कहती हैं कि ऐसे लोग पैसे के लिए काम नहीं करते. उनके हौसला बना रहे इसके लिए ज़रूरी है कि उनके लिए ख़ास मक़सद तलाशे जाएं. ऐसा काम दिया जाए कि वो उसी हौसले से लगातार काम कर सकें. क्योंकि यहां कोई मुक़ाबला मुनाफ़ा बढ़ाने या कोई टारगेट हासिल करने का होता नहीं.

ज़्यादातर एनजीओ से जुड़े लोग युवा होते हैं. कई बार वो पढ़ाई पूरी करके परोपकार के काम में जुट जाते हैं. दो या तीन साल ऐसे फील्ड वर्क में लगाते हैं. इसलिए एक एनजीओ के मैनेजर के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन लोगों को लगातार प्रेरणा देते रहना है.

अब इनमें से किसी के लिए किसी ज़रूरतमंद की मदद करना अच्छी बात है तो किसी के लिए किसी अल्पसंख्यक समुदाय की बेहतरी के लिए काम करना. तो टीम मैनेजर को चाहिए कि वो इन युवाओं की दिलचस्पी की वजह का पता लगाए और उस हिसाब से उनसे काम ले.

काम करते वक़्त एनजीओ के कर्मचारियों को अच्छा माहौल मिले ये तय करना भी टीम मैनेजर की ज़िम्मेदारी है. क्योंकि अक्सर एनजीओ से जुड़े लोग काफ़ी पढ़े लिखे होते हैं. तो उन्हें बेहतर माहौल नहीं मिलेगा तो उनका हौसला कमज़ोर हो सकता है.

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ऐसे लोगों से बातचीत करके, ज़िम्मेदारियां बदलकर काम में उनकी दिलचस्पी बनाए रखी जा सकती है. हो सकता है कि कुछ लोगों को सिर्फ़ फ़ोन पर बात करने की ज़िम्मेदारी मिली हो. ऐसे लोगों को कहा जा सकता है कि वो ऐसे लोगों से बात करें जो उनके मिशन में मददगार हो सकते हैं.

ऐसे लोगों को तलाशकर अपने साथ जोड़ने का काम उनके लिए दिलचस्पी और चुनौती भरा हो सकता है. इससे सिर्फ़ फ़ोन पर बात करने के ऊबाऊ काम से उनका मन भी नहीं भरेगा और ज़्यादा लोगों को जोड़ने की चुनौती उनका हौसला बनाए रखेगी.

दूसरों की भलाई का काम करने वाले लोग भी उसी तरह काम करना चाहते हैं जैसे किसी आम कंपनी के कर्मचारी. ज़रूरत उनके हौसले और दिलचस्पी को बनाए रखने की है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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