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कौन डकार रहा है बैंकों के पैसे, जानिए पूरी कहानी

  • 26 मई 2018

भारत में बैंक इन दिनों अपने लेन-देन के लिए नहीं बल्कि किसी और वजह से चर्चा में हैं. और वो वजह है बेड लोन यानी ऐसे कर्ज़ जिनकी वसूली या तो नहीं हो पा रही है या वसूले जाने की संभावना नहीं के बराबर है. वित्तीय ज़बान में इन्हें एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स कहा जाता है.

बैंकों के कर्ज़ के एनपीए में बदलने की रफ्तार इस कदर तेज़ हो गई है कि इस पर लगाम लगाना सरकार के लिए मुश्किल नज़र आने लगा है. सितंबर 2008 में जहां ये रकम 53,917 करोड़ रुपये थे वहीं, अगले सात साल में 2015 आते-आते ये छह गुना बढ़कर साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये हो गई.

हाल ही में सरकार ने संसद में जानकारी दी कि बैंकिंग सिस्टम में एनपीए तकरीबन साढ़े आठ लाख करोड़ पहुँच गए हैं. 21 सरकारी बैंकों की ये रकम इतनी है जिससे देश के लाखों किसानों के कर्ज़ माफ़ हो सकते हैं, या आबादी के एक बड़े हिस्से को पीने का साफ़ पानी मुहैया कराया जा सकता है.

बैंकों के बेड लोन में सबसे बड़ा हिस्सा है इंडस्ट्रीज़ का. विजय माल्या ने बैंकों से करीब 10 हज़ार करोड़ रुपये का लोन लिया और चुकाने के बारी आई तो चुपके से विदेश फुर्र हो गए. इनके अलावा स्टील कंपनियों को दिए कर्ज़ लगातार डूबते नज़र आ रहे हैं. सर्विस सेक्टर और एग्रीकल्चर सेक्टर ने भी बैंकों की नाक में दम किया है.

क्या होता है एनपीए

एनपीए समझने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि बैंक काम कैसे करते हैं. इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. मसलन बैंक में अगर 100 रुपये जमा है तो उसमें से 4 रुपये (CRR) रिज़र्व बैंक के पास रखा जाता है, साढ़े 19 रुपये (अभी एसएलआर 19.5 प्रतिशत है) बॉन्ड्स या गोल्ड के रूप में रखना होता है. बाकी बचे हुए साढ़े 76 रुपयों को बैंक कर्ज़ के रूप में दे सकता है. इनसे मिले ब्याज से वो अपने ग्राहकों को उनके जमा पर ब्याज का भुगतान करता है और बचा हुआ हिस्सा बैंक का मुनाफ़ा होता है.

रिज़र्व बैंक के अनुसार बैंकों को अगर किसी परिसंपत्ति (एसेट्स) यानी कर्ज़ से ब्याज आय मिलनी बंद हो जाती है तो उसे एनपीए माना जाता है.

बैंक ने जो धनराशि उधार दी है, उसके मूलधन या ब्याज की किश्त अगर 90 दिनों तक वापस नहीं मिलती तो बैंकों को उस लोन को एनपीए में डालना होगा.

रिज़र्व बैंक के नियम

कोई लोन खाता निकट भविष्य में एनपीए बन सकता है, इसकी पहचान के लिए रिज़र्व बैंक ने नियम बनाए हैं. इसके तहत बैंकों को उनके लोन खातों को स्पेशल मेंशन अकाउंट (एसएमए) के तौर पर चिन्हित करना होता है. अगर किसी लोन खाते में मूलधन या ब्याज की किश्त का भुगतान निर्धारित तिथि से 30 दिनों के भीतर नहीं होता है तो उसे एसएमए-0 कहा जाता है. अगर भुगतान 31 से 60 दिनों तक न हो तो इसे एसएमए-1 कहा जाता है. अगर मूलधन या ब्याज का भुगतान 61 से अधिक दिनों तक न हो तो उसे एसएमए-टू कहा जाता है.

किसी लोन खाते को एनपीए घोषित करने के बाद बैंक को उस एनपीए खाते का तीन श्रेणियों - 'सब स्टैंडर्ड एसेट्स', 'डाउटफुल एसेट्स' और 'लॉस एसेट्स' के रूप में बाँटना पड़ता है. जब कोई लोन खाता एक साल या इससे कम अवधि तक एनपीए की श्रेणी में रहता है तो उसे 'सब स्टैंडर्ड असेट्स' कहा जाता है. एक साल तक 'सब स्टैंडर्ड असेट्स' की श्रेणी में रहता है तो उसे 'डाउटफुल असेट्स' कहा जाता है. जब बैंक यह मान लेता है कि कर्ज़ अब वसूल नहीं हो सकता तो उसे 'लॉस असेट्स' की श्रेणी में डाल दिया जाता है.

तो एनपीए होने का मतलब ये तो नहीं है कि अब ये लोन डूब चुका है और इसकी वसूली नहीं होगी. लेकिन क्योंकि फिलहाल ये बैंकिंग सिस्टम में नहीं होता, इसलिए बैंकों की इस रकम की व्यवस्था करनी होती है, जिसे प्रोविज़निंग कहा जाता है.

समाधान

सरकार ने एनपीए से निपटने के लिए बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट में बदलाव किया है. बैंकिंग रेगुलेशन अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस 2017 के तहत आरबीआई को ज्यादा ताक़तवर बनाया गया है.

अध्यादेश के जरिए बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट में दो धाराएं जोड़ी गई हैं. आरबीआई अब बैंकों से बकाया वाले मामलों में दिवालिया घोषित करने के कदम उठाने को कहेगा. आरबीआई डूबे हुए कर्जों से निपटने के लिए कमिटियों का गठन भी करेगा जो बैंकों को सलाह देंगी.

स्क्रिप्ट- दिनेश उप्रेती

प्रोड्यूसर - सुमिरन प्रीत कौर

एडिट- निमित वत्स , एनिमेशन - पुनीत

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