पारले जी बिस्कुट लॉकडाउन में मज़दूरों का सहारा कैसे बना?

पारले जी बिस्कुट लॉकडाउन में मज़दूरों का सहारा कैसे बना?

जब शहरों में काम मिलना बंद हुआ और हज़ारों-लाखों मज़दूरों ने अपने घरों की तरफ़ सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र शुरू किया, तो यही बिस्कुट काम आए.

बच्चों के साथ-साथ बड़ों की भूख में भी इन्होंने ख़ूब सहायता की. मदद करने वालों ने भी पारले जी के पैकेट बांटना मुनासिब समझा.

दूसरे मध्यम वर्गीय परिवारों ने लॉकडाउन के दौर में अपने रसोई की अलमारी में पारले जी के बिस्कुट भरने से बेहतर कुछ और नहीं समझा.

पारले जी बिस्कुट बनाने वाली कंपनी पारले प्रोडक्टस ने सेल्स के सटीक आंकड़े तो साझा नहीं किए, लेकिन ये ज़रूर बताया कि बिक्री के मामले में मार्च, अप्रैल और मई के महीने बीते 80 साल में सबसे शानदार रहे हैं.

कंपनी में कैटेगरी हेड मयंक शाह ने ईटी के बताया कि उनकी कुल बाज़ार हिस्सेदारी में क़रीब 5 फीसदी का इज़ाफा हुआ है. लेकिन इस ग्रोथ का 80-90 फीसदी अंश पारलेजी की सेल्स से आया है.

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