जब नेहरू के पास फ़ोन आया कि हिन्दू और सिखों को मारा जा रहा है

जब नेहरू के पास फ़ोन आया कि हिन्दू और सिखों को मारा जा रहा है

सालों तक चले संघर्ष के बाद 1947 में मिली आज़ादी की मिठास फ़िज़ा में घुल ही रही थी कि बंटवारे से जुड़ी हिंसा ने प्यार के बोल नफ़रत के नारों में बदल दिए.

दोस्ती के लिए बढ़ने वालों हाथों को खून की लाली भा गई और मां, बहन और बेटियों जैसे रिश्ते महज जिस्म बनकर रह गए. और उस दौर से गुज़रने वालों के लिए वो साल आज़ादी का नहीं बल्कि बंटवारे का साल बन गया.

14 अगस्त के दिन जब भारत और पाकिस्तान के नेता देश का भविष्य तय करते हुए काग़ज़ों पर अपने लिख रहे थे, लाखों लोग अपनी ज़िंदगियां कुछ पोटलियों में बांधे, अपनी गलियों, अपने बाज़ार, अपने आंगन और अपने उस घर को यादों में समेटे चले जा रहे थे.

बंटवारे के दर्द पर बनी यह डॉक्यूमेंट्री भारत के विभाजन और आज़ादी की 60वीं सालगिरह के मौके पर साल 2007 में बीबीसी हिन्दी रेडियो पर प्रसारित हुई थी.

प्रस्तुति: मुकेश शर्मावीडियो एडिटिंग: दीपक जसरोटियाऑडियो मिक्सिंग: स्वाति चौहान

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