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मेट्रो से बदल रही सफ़र की परिभाषा

बीबीसी हिन्दी के ख़ास कार्यक्रम बदलता भारत की दूसरी कड़ी में हम आपको बता रहे हैं कि कैसे मेट्रो ट्रेन ने बदल दी है सफ़र की परिभाषा. इस मक़सद से हमने अपना ध्यान केंद्रित किया है दिल्ली मेट्रो पर.

भारत की राजधानी दिल्ली में नौ लाख लोग रोज़ाना मेट्रो ट्रेन से सफ़र करते हैं. शहर के अंदर चलने वाली इस भूमिगत सेवा - दिल्ली मेट्रो - को बनाने की शुरुआत हुई थी सात साल पहले दिसंबर 2002 में. तब से सभी ने देखा कैसे एक-एक कर मेट्रो के नए रास्ते बने है और शहर व शहर के आसपास इस ट्रेन ने अपना दायरा बढ़ाया है. लेकिन लाखों लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके यातायात के इस साधन ने कब उनकी ज़िंदगी बदलनी शुरू कर दी, ये पता ही नहीं चला. हमारी कोशिश है आपको उसी बदलाव से रूबरु कराने की.

तेज़ दौड़-भाग से राहत

शहरी ज़िन्दगी में आई तेज़ी के साथ लोगों के लिए समय और कीमती हो गया है. शहरों में रोज़मर्रा की दिनचर्या के लिए 24 घंटे जैसे कम पड़ने लगे हैं. ऐसे में मेट्रो ने कामकाजी लोगों का दर्द कुछ कम किया है. दौड़भाग वाली ज़िंदगी के साथ क़दम मिलाया है मेट्रो ने और अब शहर में सफ़र कम से कम समय में हो पा रहा है. मेट्रो तेज़ चलती है, ट्रैफ़िक से बचाती है, वातानुकूलित है और काम पर चलने वालों के हर मिनट की कीमत समझती है.

अमीर-गरीब दरार नहीं

भारत विविधताओं का देश है और मेट्रो एक कॉसमोपॉलिटिन शहर की तरह उन विविधताओं को अपने में समेटती है. मेट्रो में जहां लैपटॉप पर काम करते प्रोफ़ेशन्ल चलते हैं, फ़ोन पर ज़ोर से बात करते व्यवसायी दिखाई देते हैं, वहीं घाघरा पहने ग्रामीण महिलाएँ. परिवार, छात्र, अकेली महिलाएँ, बुज़ुर्ग सभी इस सफ़र से खु़श हैं. यहां तक कि विकलांग भी अन्य सार्वजनिक वाहनों की तुलना में मेट्रो में सफ़र करना पसंद करने लगे हैं.

दिल्लीवासी हुए अनुशासित

मेट्रो की सबसे बड़ी देन शायद अनुशासन है. सार्वजनिक जगहों पर थूकना, सड़क कहीं से भी पार करना, ट्रैफ़िक नियमों की अनदेखी करना, जहाँ भारत में आम है, वहीं मेट्रो की दुनिया में एक अलग ही तस्वीर उभर रही है. मेट्रो ट्रेन पर खाना-पीना मना है तो लोग खाते-पीते नहीं हैं. मेट्रो में हज़ारों लोग सफ़र करते हैं तो ट्रेन में चढ़ने-उतरने के लिए लाइन लगाने की प्रथा शुरु हुई है. यहां तक कि ट्रेन में ऊंचे स्वर में संगीत ना सुनने के निवेदन के साथ बार-बार घोषणा की जाती है और लोग इसे भी मान रहे हैं.

मेट्रो रेल का ये आधुनिक रूप राजधानी दिल्ली में स्पष्ट नज़र आता है चाहे कोलकाता में मेट्रो रेल पहले से चल रही है. मुंबई की लोकल ट्रेन भी शहर को तो जोड़ती है लेकिन सफ़र को शायद उतना सुहाना नहीं बना पाई है. अब इस बेहद सफल परीक्षण को कई अन्य शहरों में लाने की योजनाएं हैं. सचमुच दिल्ली मेट्रो ने शहर में सफ़र की नई परिभाषा दी है.