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बोलने की आज़ादी कहाँ तक?

भारतीय संविधान देश के सभी नागरिकों को बोलने की आज़ादी का अधिकार देता है. इसी अधिकार के तहत पिछले दिनों कश्मीर के मुद्दे पर दिल्ली में एक सेमिनार करवाया गया जिसका विषय था- आज़ादी: एक ही रास्ता.

इसमें कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी, माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले तेलुगू कवि वरवर राव, लेखिका अरुंधति रॉय जैसे लोगों ने हिस्सा लिया. लेकिन बातचीत के बीच में ही कुछ प्रदर्शनकारियों ने गिलानी के साथ धक्का-मुक्की की और बातचीत में रुकावट डाली. उनकी मांग थी कि कश्मीर की आज़ादी की मांग करने वालों को राजधानी दिल्ली में बोलने की इजाज़त क्यों दी गई?

क्या कश्मीरी अलगाववादियों को शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी बात कहने की इजाज़त दी जानी चाहिए?