भाई-भाई में जंग, लेकिन बाप-बेटे हैं संग

  • 20 जनवरी 2012
Image caption पंजाब में मौजूदा चुनावों में परिवारवाद पूरी तरह से हावी नज़र आ रहा है.

पंजाब में 30 जनवरी को होने वाले विधानसभा चुनावों में रिश्तों के समीकरण जमकर देखे जा सकते हैं जहां कहीं एक भाई दूसरे भाई के ख़िलाफ़ चुनावी दंगल में ताल ठोक रहा है तो कहीं पुत्र अपने पिता के साथ कंधे से कंधा मिला रहा है.

राज्य में मुख्य मुक़ाबला तीन पार्टियों शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन, कांग्रेस और पीपुल्स पार्टी ऑफ़ पंजाब के बीच है. यहां रोचक तथ्य ये है कि तीनों ही पार्टियों की बागडोर पिता-पुत्रों के हाथों में हैं जो अपनी-अपनी पार्टियों के मुख्य उम्मीदवार भी हैं.

मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखबीर बादल अकाली दल से तथा पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके बेटे रनिंदर सिंह कांग्रेस के टिकट पर अपने भाग्य की आज़माइश कर रहे हैं.

पिता-पुत्र की तीसरी जोड़ी पंजाब पीपुल्स पार्टी में गुरदास बादल और उनके बेटे मनप्रीत बादल की है जो ख़ुद दो-दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं.

बढ़ता परिवारवाद

पंजाब में इस बार के विधानसभा चुनावों में परिवारवाद पूरी तरह से हावी नज़र आ रहा है और इसी परिवारवाद को बढ़ावा देने के कारण अकाली दल और कांग्रेस में भाई-भाई में फूट पड़ गई है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह दावा करते हैं कि उनके बेटे रनिंदर सिंह को टिकट दिलवाने में उनका या उनकी पत्नी परनीत कौर का कोई हाथ नहीं है. परनीत कौर केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री भी हैं.

लेकिन ख़ुद को टिकट का प्रबल दावेदार समझने वाले अमरिंदर के भाई मलविंदर सिंह इस पर यकीन नहीं करते. यही वजह है कि उन्होंने रनिंदर के ख़िलाफ़ जंग छेड़ते हुए अकाली दल का दामन थाम लिया है.

बढ़ती तक़रार

इसी तरह अकाली कांग्रेस से निलंबित वित्त मंत्री मनप्रीत बादल को हमेशा यही महसूस हुआ कि पार्टी में उनके ताया और मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल को ज़्यादा महत्व देते हैं.

नतीज़ा ये हुआ कि मनप्रीत की आज अपनी अलग पार्टी है और वे अकाली दल को चुनौती दे रहे हैं. उनके 82 वर्षीय पिता गुरदास सिंह बादल और 84 वर्षीय ताया प्रकाश सिंह बादल लाम्बी चुनाव क्षेत्र में आमने-सामने हैं और एक दूसरे को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. मनप्रीत को अकाली दल से निष्कासित किया गया था.

लेकिन इलाक़े के लोग दोनों भाइयों के प्यार के किस्सों का आज भी बखान करते नहीं थकते. इससे पहले के चुनावों में गुरदास बादल अपने बड़े भाई प्रकाश सिंह बादल के चुनाव प्रचार में मुख्य भूमिका निभाते थे.

बादल के दामाद आदेश प्रताप सिंह कैरों और सुखबीर बादल की सांसद पत्नी हरसिमरत कौर के भाई बिक्रमजीत सिंह मजीठिया को भी अकाली दल से टिकट मिला है.

ऐतिहासिक कारण

पंजाब की राजनीति पर नज़र रखने वाले चंडीगढ़ स्थित विकास और संचार संस्थान के निदेशक प्रमोद कुमार का कहना है कि कांग्रेस में परिवारवाद काफी पुराना है लेकिन अकाली दल में परिवारवाद के ऐतिहासिक कारण हैं.

प्रमोद कुमार ने बीबीसी को बताया, ''अकाली दल में परिवारवाद को बढ़ाने की परंपरा पहले नहीं थी. वर्ष 1992 में अकाली दल ने चुनावों का बहिष्कार किया जिसकी वजह से पार्टी में नए लोग कम शामिल हुए. लेकिन पुराने नेताओं की अगली पीढ़ी धीरे-धीरे राजनीति में आ गई. इसलिए आज आप इस पार्टी में भी परिवारवाद देख रहे हैं.''

लेकिन ऐसा नहीं है कि पंजाब के चुनावी दंगल में केवल बादल और अमरिंदर के परिवार ही शामिल है.

पूर्व मुख्यमंत्री रजिंदर कौर भट्टल के दामाद विक्रम बाजवा को कांग्रेस से टिकट मिला है. वहीं पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते गुरकीरत सिंह कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.

महिला उम्मीदवार

महिला उम्मीदवारों की बात करें तो ये कहना ग़लत नहीं होगा कि इनमें से ज़्यादातर किसी न किसी प्रभावशाली नेता की रिश्तेदार हैं.

पूर्व क्रिकेटर और बीजेपी सांसद नवजोत सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर अमृतसर से चुनाव लड़ रही हैं. कांग्रेस सांसद प्रताप सिंह बाजवा की पत्नी चरनजीत कौर कादियां से उम्मीदवार हैं.

पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष शमशेर सिंह दूलों की पत्नी हरबंस कौर बसी पठाना से चुनाव लड़ रही हैं. जालंधर (पूर्व) से उम्मीदवार सुमन कांग्रेस सांसद मोहिंदर सिंह केपी की पत्नी हैं.

वहीं कांग्रेस की मुक्तसर से उम्मीदवार करन कौर पूर्व मुख्मंत्री हरचरन सिंह बराड़ की बहू हैं. अकाली नेता गुरचरन सिंह तोहड़ा की बेटी कुलदीप कौर को अकाली दल ने टिकट दिया है.

तमाम पार्टियां नए और युवा लोगों को राजनीति में शामिल होने की बात अक़्सर करती हैं. लेकिन अगर वो सच में ऐसा चाहते हैं तो उन्हें परिवार से बाहर भी देखना होगा.

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