क्या लैब में बनेगा मानव शरीर?

 मंगलवार, 27 मार्च, 2012 को 10:09 IST तक के समाचार
जानकारी के लिए अंग का नाम खींच कर यहां डालें.
  • मस्तिष्क
  • पाचक-ग्रंथि
  • कान
  • हृदय
  • आंख
  • त्वचा
  • पैर
  • हाथ
  • तकनीक के जरिए इंसानी शरीर की बनावट की नकल करने हमेशा कोशिशें की गई हैं. अब इंसान और मशीन के बेमिसाल गठजोड़ के रुप में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और उच्च तकनीक से बने मशीनी अंग मानव अंगों की तरह काम कर रहे हैं.

    नेत्रहीनों को दृष्टि देने के मकसद से इस साल के अंत तक ब्रिटेन में पहली बार मशीनीकृत आंख को प्रतिरोपित किया जाएगा. ये चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी है और उन लोगों को दोबारा उनके अंग देने जैसा है जो अपने प्राकृतिक अंगों को खो चुके हैं.

    आने वाले हफ्तों में बीबीसी मशीनीकृत अंगों यानि 'बायोनिक्स' के क्षेत्र में मिल रही सफलताओं को आप तक पहुंचाएगी. आईए जानते हैं अब तक क्या हुआ है.

  • मस्तिष्क

    कुछ मदद संभव है

    Brain infographic
    1. 1. एक छोटा जेनरेटर लगातार बिजली के स्पंदन पैदा करता है.
    2. 2. एक केबल के ज़रिए स्पंदन मस्तिष्क तक पहुंचता है.
    3. 3. इलेक्ट्रोड्स के जरिए पहुंचता है स्पंदन

    शरीर का सबसे जटिल अंग है मस्तिष्क. अवसाद, भूलने की बीमारी और दिमागी दौरे होने पर असर पूरे शरीर पर होता है.

    लेकिन, बिजली से मस्तिष्क में स्पंदन पैदा कर मरीजो को फायदा पहुंचाया जा सकता है. इस तकनीक से पार्किंसन्स के हज़ारों लाइलाज मरीज़ों को फायदा हुआ है. 48,000 डॉलर में होने वाले ऑपरेशन से मस्तिष्क में रखे गए इलेक्ट्रोड्स के ज़रिए व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वाले मरीज चलने लगे.

    चूहों में मस्तिष्क के खराब हो चुके हिस्सों को माईक्रोचिप के ज़रिए बदलने पर भी शोध हो रहे हैं.

  • पाचक-ग्रंथि

    चिकित्सीय प्रयोगों में

    Pancreas infographic
    1. 1. सेंसर करते हैं रक्त में चीनी के स्तर की जांच
    2. 2. ये जानकारी पहुंचती है कंप्यूटर तक जो तय करता है इंसुलीन की मात्रा
    3. 3. रक्त में डाली जाती है इंसुलीन

    रक्त में चीनी का स्तर बढ़ने से मधुमेह की बीमारी हो जाती है. इससे पाचक-ग्रंथि में पैदा होने वाला हारमोन इंसुलीन प्रभावित होता है.

    कैंब्रिज विश्वविद्दालय में हुए प्रयोग दिखाते हैं कि कृत्रिम पाचक-ग्रंथि ने गर्भवती महिलाओं में मधुमेह पर नियंत्रण में मदद की.

    कृत्रिम पाचक-ग्रंथि सेंसर के ज़रिए रक्त में चीनी की मात्रा को लगातार नियंत्रित रखता है. ये जानकारी कंप्यूटर तक पहुंचती है और दवा के रुप में इंसुलीन की तय मात्रा को रक्त में पंप कर दिया जाता है.

  • कान

    बहुप्रचलित

    Skin graphic

    बायोनिक' कान यानि प्रतिरोपित मशीनी कान सबसे ज़्यादा प्रचलित हैं. दुनियाभर में कई हज़ार लोगों को इनके ज़रिए सुनने की क्षमता वापस मिली है.

    ध्वनियों के ज़रिए कानों में कंपन पैदा किया जाता है जिन्हें बायोनिक कान में मौजूद रोंए के ज़रिए पकड़ा जाता है. इस स्पंदन को इलेक्ट्रॉनिक संकेतों में बदला जाता है जिन्हें मस्तिष्क तक भेजा जाता है. लेकिन अगर ये रोंए खराब हो जाएं तो श्रृवण क्षमता खत्म हो सकती है.

    प्रतिरोपित मशीनी कान इलेक्ट्रॉनिक संकेतों को सीधे मस्तिष्क तक भेजते हैं. सिर के बाहर मौजूद एक माइक्रोफोन ध्वनि संकेतों को इलेक्ट्रॉनिक संकेतों में बदलता है और इलेक्ट्रोड के जरिए ये संकेत सीधे स्नायुतंत्र तक पहुंचकर सुनने की क्षमता को बढ़ा सकते हैं.

    प्रत्येक प्रतिरोपण की कीमत 26,000 डॉलर है. इसके अलावा सर्जरी और ऑपरेशन के बाद होने वाला खर्च अलग है. हाल ही में हुए ऑपरेशनों में एक ही प्रतिरोपण के ज़रिए दोनों कानों में सुनने की क्षमता संभव हो पाई है.

  • हृदय

    950 से ज़्यादा मरीज़ों में प्रतिरोपित

    हृदय-प्रतिरोपण के इंतज़ार में बैठे मरीज़ों की सूची लंबी है. कई मरीज़ सही अंग मिलने से पहले ही मर जाते हैं. प्लास्टिक के हृदय कुछ समय तक काम करते हैं लेकिन अबतक मिली सफलता तीन साल से ज़्यादा नहीं.

    इंसानी हृदय को दो भागों में बने कृत्रिम हृदय से बदल दिया जाता है. इसके एक हिस्से से रक्त अंदर जाता है और दूसरे हिस्से से बाहर आता है. एक नली के जरिए हवा को कृत्रिम हृदय में पंप किया जाता है. इससे रक्त उसी तरह शरीर में प्रतिचालित होता है जिस तरह प्राकृतिक हृदय से.

    ब्रिटेन के मैथ्यू ग्रीन पहले ऐसे मरीज़ हैं जो 2011 के अंत में कैंब्रिज के एक अस्पताल में हुए ऑपरेशन के बाद पूरी तरह कृत्रिम हृदय लेकर घर लौटे. इस ऑपरेशन की कीमत लगभग 160,000 डॉलर रही. वीडियो के ज़रिए अस्पताल के मुख्य कार्डियोथोरैकिक सर्जन स्टीवन सुई बता रहे हैं कैसे प्रतिरोपित होता है कृत्रिम हृदय.

  • आंख

    बायोनिक आंख दृष्टि वापस लाने में मदद करती है

    इस साल के अंत तक ब्रिटेन में कृत्रिम आंख को प्रतिरोपित करने वाला पहला ऑपरेशन किया जाएगा. प्रकाश किरणों के आधार पर काम करने वाली एक चिप उन मरीज़ों को दृष्टि देगी जो देख नहीं सकते. ये तकनीक नेत्रहीनों के लिए बने कैमरे लगे चश्मों से अलग है.

    इस चिप को आंख के अंदर मौजूद रेटिना के पीछे फिट किया जाता है. चिप के ज़रिए प्रकाश किरणों को विद्युत किरणों में बदलकर मस्तिष्क तक पहुंचाया जाता है. विद्युत ऊर्जा मरीज़ के स्नायुतंत्र में तरंगे पैदा करती हैं और उसकी आंख के भीतर लगी एक छोटी सी चिप को सक्रिय बनाती है. इस चिप के ज़रिए व्यक्ति के मस्तिष्क में 1500 पिक्सल की एक तस्वीर उभरती है और वो देखपाता है. इस ऑपरेशन की कीमत लगभग 1,00,000 डॉलर है. जिसमें ऑपरेश के बाद होने वाला खर्च शामिल नहीं है.

    जर्मनी में हुए चिकित्सीय प्रयोगों में इस तकनीक से उन मरीज़ों को दृष्टि वापस मिली जिनके रेटिना पूरी तरह खराब हो चुके थे. ये चिप प्रतिरोपित होने के बाद उन्हें चीज़ों को कुछ हद तक देखने में सफलता मिली.

    वीडियो के ज़रिए ऑक्सफोर्ड नेत्र अस्पताल के प्रोफेसर रॉबर्ट मैक्लॉरेन बता रहे हैं कि प्रतिरोपित की जा वाली बायोनिक आंख किस तरह काम करती है.

  • त्वचा

    प्रयोग जारी हैं.

    Skin graphic

    वैज्ञानिकों के लिए प्राकृतिक और मशीनी प्रणाली से मिली त्वचा बनाना सबसे बड़ी चुनौती रही है. ऐसी त्वचा जो दबाव तापमान और दर्द को महसूस कर सके.

    बर्कले विश्वविद्दालय के प्रोफेसर अली जावे ई-त्वचा बनाने की कोशिश में हैं जिसमें मौजूद तत्व और गुण प्राकृतिक त्वचा की तरह होंगे. प्लास्टिक, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक उपतकण की मदद से वो एक ऐसा जाल तैयार कर चुके हैं जो त्वचा की तरह लचीला है.

    ये सेंसर कंप्यूटर तक जानकारी पहुंचाते हैं जिससे रोबोट छूने का एहसाल पा सकते हैं. लक्ष्य है बायोनिक अंगों पर ई-त्वचा मढ़कर उन्हें असल बनाना. हालांकि मस्तिष्क से त्वचा का सीधा संपर्क स्थापित करने में वर्षों लगेंगे.

  • पैर

    प्राकृतिक हाथ की नकल करता है

    हल्के उपकरणों और तकनीकी सुधारों के चलते बायोनिक पैर अब प्राकृतिक पैर की तरह हिलडुल सकते हैं.

    इनमें सबसे बेहतर है पिछले साल ब्रिटेन में लॉंच हुआ 'जीनियम'.

    सात सेंसर, गति को मापने वाले एक्सेलरोमीटर और एक रिमोट कंट्रोल के ज़रिए ये कृत्रिम पैर काम करता है. एक कंप्यूटर के ज़रिए कृत्रिम पैर में मौजूद वॉल्व पैर की गतिविधियों को नियंत्रित करता है. अलग-अलग गतिविधियों जैसे पीछे मुड़ने, सीढ़ियां चढ़ने और चलने की गति को लेकर ये पैर अलग-अलग तरह से काम कर सकता है.

    मरीज़ की ज़रुरत के मुताबिक टाँग लगाने का खर्च लगभग 50,000 पाउंड (35 लाख रुपए) है. इसमें टाँग फ़िट करना, उसकी वारंटी और सर्विस का खर्चा शामिल है.

    ऑटोबॉक के वैज्ञानिक जियोफ्रे हार्डिंग बता रहे हैं कि ये पैर कैसे काम करता है.

  • हाथ

    युद्ध में होने वाली दुर्घटनाओं से मिला बढ़ावा

    घायल सैनिकों ने कृत्रिम अंग बनाने की दिशा में हो रहे प्रयासों को बढ़ावा दिया. अमरीका के एक विश्वविद्दालय ने सेना की मदद से सबसे उन्नत बायोनिक हाथ बनाने में कामयाबी हासिल की है. ये हाथ प्राकृतिक हाथ की तरह दक्ष है और इसकी उंगलियां स्वतंत्र रुप से काम कर सकती हैं.

    कृत्रिम हाथ इंसान के हाथ में मौजूद मांसपेशियों से संकेत ग्रहण करता है. कृत्रिम हाथ में मौजूद सेंसर मांसपेशियों की हरकत को पकड़ते हैं और उसके आधार पर ये हाथ काम करता है.

    इस वीडियो में हॉपकिंस विश्वविद्दालय के माइकल मैक्लॉलिन बता रहे हैं कि मोड्यूलर प्रोस्थेटिक लिंब यानि कृत्रिम हाथ कैसे काम करता है.

    अगला क़दम है मस्तिष्क में ऐसे प्रोग्राम फिट करना जो हाथ को सीधे नियंत्रित कर सके. फिलहाल मिली सफलता के तहत मस्तिष्क कोशिकाओं से दिए संकेतों के ज़रिए एक मरीज़ ने कृत्रिम हाथ से अपने साथी के हाथ पर थपथपाने में सफलता पाई है.

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