बिन मर्दों के गांव

 मंगलवार, 4 सितंबर, 2012 को 08:18 IST तक के समाचार

बिन मर्दों के गांव

  • गांव खाली पड़ा है और लोग कहते हैं कि जनाज़े को कंधा देने के लिए भी पुरुषों को ढूंढना आसान नहीं है. महिलाओं द्वारा ये काम करने की परंपरा नहीं है. (ये सभी तस्वीरें बीबीसी उज़्बेक के अकबर पोलात ने खींची हैं.)
  • घर-बार का काम, हाट-बाज़ार जाना, फसलें काटना सभी कुछ महिलाएं करती हैं.
  • सुबह से लेकर शाम तक महिलाएं खेतों में काम करती हैं.
  • फ़सल से जुड़े काम भी महिलाएं ही करती हैं.
  • खेतों में काम करती युवतियां अपना चेहरा छिपाती हुईं.
  • एक थका हुआ परिवार सड़क पर किसी वाहन का इंतज़ार कर रहा है.
  • गांवों की कुछ औरतें मर्दों के परंपरागत काम करने लगी हैं. कुछ तो कसाइयों की भी सहायता करती हैं.
  • ये औरतें अपने मेहमानख़ाने में बैठकर दुख सुख करती हैं.
  • कई औरतें बरामदे में बैठकर रूस में काम कर रहे अपने परिजनों के क़िस्से सुनती-सुनाती हैं.
  • लड़कियां सोवियत ज़माने के रसोईघर में खाना बनाने में व्यस्त हैं.
  • रसोईघर में कपास की सूखी टहनियों को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.
  • समरकंद के इस बेकर के चेहरे पर मुसीबतों के संकेत साफ़ पढ़े जा सकते हैं.

आर्थिक तंगी और बेरोज़गारी ने उज़्बेकिस्तान के बुख़ारा प्रांत से लाखों पुरुषों को घर छोड़ने पर मजबूर किया और वे रूस में नौकरियों की तलाश में चले गए. पीछे बची औरतों के कंधों पर पड़ी परिवार को पालने की ज़िम्मेदारी. ये सभी तस्वीरें बीबीसी उज़्बेक के अकबर पोलात ने खींची हैं.

Videos and Photos

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.