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अनामिकाः मुझे पसंद है 'गुलाबी चूड़ियाँ'

हिंदी के प्रख्यात कवि बाबा नागार्जुन की कविता 'गुलाबी चूड़ियाँ' मेरी तमाम पसंदीदा कविताओं में से एक सबसे प्रिय कविता है.

ये कविता पिता का वात्सल्य रेखांकित करती है ख़ासकर एक ऐसे पिता का वात्सल्य जो परदेस में रहा है. छूटा हुआ परिवार बिहार में, पूर्वी उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर पिता रोज़गार की चिंता में या किसी राजनीतिक आंदोलन का महास्वप्न अपनी आँखों में ढारे हुए अपना परिवार पीछे छोड़ आते हैं.

"अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा

आहिस्ते से बोला: हाँ सा'ब

लाख कहता हूँ, नहीं मानती है मुनिया

टाँगे हुए है कई दिनों से

अपनी अमानत

यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने

मैं भी सोचता हूँ

क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ

किस जुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?

और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा

और मैंने एक नज़र उसे देखा

छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में" (गुलाबी चूड़ियाँ - नागार्जुन)