'फ़िल्म इंडस्ट्री में कुछ लोग तारीफ़ नहीं कर पाते'

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मधुर भंडारकर की गिनती उन निर्देशकों में होती है, जिन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान ऐसी फ़िल्मों से बनाई है, जिनमें हीरोइनों का दमदार रोल होता है.

हाल में ही मधुर भंडारकर ने बीबीसी से कई मुद्दों पर दिल खोलकर बात की. पढ़िए उनसे विशेष बातचीत और देखिए वीडियो इंटरव्यू भी.

आपकी फ़िल्मों का महिलाओं से गहरा नाता रहा है

फ़िल्मों में महिलाओं के चित्रण बात करूँ, तो उसमें काफ़ी ज़्यादा परिवर्तन हुआ है, ख़ासकर पिछले 10-15 सालों की ही बात करें, तो कई तरह के बदलाव आए हैं.

मैंने तो महिला प्रधान फ़िल्मों पर ही अपना करियर बना लिया जैसे चांदनी बार, फ़ैशन, हीरोइन. यह बड़ी उपलब्धि है कि इस तरह का सिनेमा भारत में जागृत हो रहा है.

प्रियंका चोपड़ा, विद्या बालन, दीपिका पादुकोण, सोनम कपूर जैसी नई पीढ़ी की अभिनेत्रियां अलग तरह की भूमिकाएं चाहती हैं. अब हीरोइन ग्रे शेड के रोल भी करती हैं, पॉज़िटव रोल भी करती हैं.

निर्माता भी ऐसी फिल्मों का समर्थन कर रहे हैं. महिला केंद्रित फ़िल्में बनने से मुझे बेहद खुशी होती है.

फिल्मकार होने की क्या चुनौतियाँ होती हैं?

हर फ़िल्म अपने आप में एक चुनौती है. एक फ़िल्मकार के तौर पर मेरी कोशिश होती है कि मैं अलग विषय पर फिल्म बनाऊं.

दूसरी बात यह है कि दर्शक उसे पसंद करें. कई बार लोग मुझसे कहते हैं कि मधुर तुम्हारी फिल्म न तो पूरी तरह से कलात्मक होती है और न पूरी तरह से कॉमर्शियल होती है.

मैंने वास्तविकता और कल्पनाशीलता को जोड़कर मनोरंजन के स्तर पर कहानी कहने की कोशिश की है. मुझे खुशी इस बात की है कि मैं ऐसा करने में सक्षम हूं.

मधुर वीडियो-पार्ट 2

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पेज थ्री, कॉरपोरेट, फ़ैशन...यह इत्तेफ़ाक है कि आप असल ज़िंदगी से जुड़े मसले उठाते हैं या यह सोची-समझी कोशिश होती है?

समाज में कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनके बारे में लोगों ने केवल सुना है, लेकिन मेरे लिए चुनौती यह होती है कि मैं उन चीज़ों को खंगालूं और फिर दर्शकों के सामने लाने की कोशिश करूं चाहे वह राजनीति हो, फ़ैशन हो या कुछ और.

लेकिन ऐसा नहीं होता कि समाज में किसी घटना की चर्चा ज़्यादा हो रही है, तो मैं बस उसी मुद्दे पर फ़िल्म बनाने में लग जाऊँ. बतौर फ़िल्मकार मुझे वह घटना या मुद्दा प्रेरित करना चाहिए कि मैं उसे पर्दे पर उतारूँ.

कई बार लोग कहते हैं कि मधुर कटाक्ष करता है, लेकिन मैंने लोगों को सच्चाई दिखाने की ही कोशिश की है. मैंने अगर फ़िल्म उद्योग पर फिल्म बनाई, तो उसमें भी मैंने बेबाकी से चीज़ें पेश कीं.

मैं नहीं चाहता था कि लोग कहें कि जैसे यह निर्देशक किसी दूसरे क्षेत्र के बारे में बेबाकी से चीज़ें दिखाता है, अपनी इंडस्ट्री के बारे में वैसा नहीं कर पाया. लेकिन अपनी बात बेबाकी से रखने के लिए मुझे आलोचना भी झेलनी पड़ती है.

दूसरे फ़िल्मकारों का काम कितना पसंद?

मैं दूसरे फ़िल्मकारों की फ़िल्में देखता हूँ और अच्छी लगी तो तारीफ़ करने में हिचकिचाता नहीं.

जैसे मैंने 'भाग मिल्खा' के बाद राकेश ओमप्रकाश मेहरा को और 'स्पेशल 26' के बाद नीरज पांडे को फ़ोन किया.

मुझे 'फ़ुकरे' भी अच्छी लगी और मैंने निर्माता को फ़ोन किया. हालांकि इंडस्ट्री में ऐसे लोग हैं, जो बोल देते हैं कि उन्होंने फ़लां फ़िल्म देखी ही नहीं क्योंकि फिर उन्हें किसी और की तारीफ़ करनी पड़ेगी. मैं ऐसा नहीं हूँ.

विदेशों में भारतीय फ़िल्मों की लोकप्रियता

विदेशों में भी लोग भारत की फ़िल्में पसंद करने लगे हैं. उन्हें हमारी फ़िल्मों में रंग-बिरंगे लिबास, गाने...सब अच्छे लगते हैं. विदेशों में हमारे फ़िल्मकारों को बुलाया जाता है.

वैसे अगर कोई हीरो-हीरोइन बीच सड़क पर गाना गाए, तो विदेश में लोग यही समझेंगे कि शायद पागल हैं, लेकिन अब वे लोग भी समझने लगे हैं कि यह भी मनोरंजन का हिस्सा है और वे इसका आनंद लेते हैं.

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