उम्र के इस पड़ाव पर नहीं मिला आसरा

 रविवार, 22 दिसंबर, 2013 को 16:22 IST तक के समाचार
  • कभी इनकी हड्डियों में भी दम था और ये अपने परिवार के मज़बूत स्तम्भ हुआ करते थे.

    खुद मुश्किलें सहकर ये घर के बाशिंदों के लिए दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम किया करते थे.

    मगर आज इनकी आँखों में न वह रोशनी है, न हड्डियों में वो ताक़त. आज ये उम्र के आगे मजबूर हैं.

    इनके अपनों ने तो इनकी अनदेखी की ही, और जब इनकी निगाहें सरकार की तरफ मदद के लिए उठीं, तो इन्हें वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी.

    यह दास्तान है भारत के उन बुज़ुर्गों की जो अपनी ज़िंदगी के आख़िरी पड़ाव में बेसहारा हो चुके है.

  • इन बुज़ुर्गों के लिए काम कर रही संस्था पेंशन परिषद पिछले दो साल से इन्हें पेंशन दिलाने के लिए संघर्ष कर रही है.

    परिषद के आह्वान पर देश के विभिन्न प्रांतों से आए बुज़ुर्गों ने दिल्ली में कई बार अपने हक़ की मांग करते हुए प्रदर्शन भी किया.

    इसी कड़ी में सर्द हवाओं का मुक़ाबला करते हुए 27 नवंबर से दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन बुज़ुर्गों ने लगातार 25 दिनों तक धरना दिया, लेकिन सरकार ने इनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया.

    पेंशन परिषद ने इस धरने को स्थगित करने का फ़ैसला लिया. मगर साथ ही कहा कि इन मांगों के लिए संघर्ष जारी रहेगा.

  • सत्तर साल की भँवरी देवी राजस्थान के अजमेर ज़िले से धरने में शामिल होने आई थीं. वह अपनी कहानी कुछ इस तरह बयाँ करती हैं..

    मेरे पास आमदनी का कोई साधन नहीं है. आज मेरा देवर है, जो मुझे खाना खिला देता है. मेरे भाई भी हैं जो कभी-कभी कपड़ा- लत्ता दे देते हैं.

    मगर ज़िंदगी की दूसरी ज़रूरतें भी होती हैं. वह कहती हैं- बूढी हूँ, तबीयत ख़राब रहती है. दवाई के लिए पैसे देने वाला कोई नहीं है.

    मुझे दिल्ली आए दो हफ़्ते हो गए मगर सरकार ने हमारी सुध नहीं ली.

    बड़ी उम्मीद से आए थे कि बूढ़े लोगों को देखकर किसी का दिल तो पसीज जाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ.

    प्रधानमंत्री तो हम लोगों से मिले तक नहीं. मेरा कोई नहीं है और बुढ़ापे में मुझसे कोई काम भी नहीं हो सकता.

    मैं अपनी गुज़र-बसर कैसे करूं. कौन मुझे पैसे देगा?

  • बिहार के अररिया ज़िले से आई 70 साल की मैना देवी की कहानी उनकी ज़ुबानी:

    मेरा बेटा भी है, बहू भी है और पोता-पोती भी. मुझे पेंशन नहीं मिलती.

    मेरे पति नहीं हैं. वो मछली मारा करते थे. मेरा गुज़ारा बस जैसे- तैसे ही होता है, कभी बेटे के यहाँ खाना खा लिया, तो कभी बेटी के यहाँ.

    बेटा तो तब से बदल गया, जब से बहू आ गई. बहू कहती है कि आप अपना कमाइए और खुद अपने खाने का इंतज़ाम कीजिए.

    मेरी बूढ़ी हड्डियों में अब ताक़त नहीं रही. आँखों से नज़र भी कम आता है. मैं कोई काम नहीं कर सकती.

  • ग़ाज़ियाबाद के 62 साल के नरेश शाह की कहानी भी कमोबेश वैसी ही है..

    इस उम्र में भी कबाड़ी का काम कर रहा हूं. ठेले खींचने की उम्र नहीं है, लेकिन तब भी परिवार चलाने के लिए काम करना पड़ता है.

    दिन भर में सौ रुपए के क़रीब कमाता हूं. उसी से परिवार का खर्च चलता है.

    बड़े बेटे की शादी हो गई है, बहू भी है, उसकी चार बेटियां हैं. उसमें सामर्थ्य ही नहीं है कि मदद करे.

    ऐसे में बाल बच्चों से क्या कहें, कलयुग है. जब तक काम नहीं करेंगे, कोई देखना वाला नहीं है.

    अगर सरकार हम लोगों को पेंशन देती तो एक सहारा ज़रूर हो जाता.

  • महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले से धरने में शामिल हुईं साठ साल की ठकु बाई की कहानी सुनिए उनकी ज़ुबानी:

    मेरा मर्द गुज़र गया है. दो बेटे हैं और मैं, घर में तीन लोग हैं.

    हमारे पास कोई काम नहीं है, मेहनत मज़दूरी का काम करके किसी तरह से गुज़र-बसर करती थी.

    हमारा घर जालना ज़िले में था. काम नहीं था, तो औरंगाबाद आए. 20 साल से औरंगाबाद में कूड़ा कचरा बीनने का काम कर रहे हैं.

    सरकार से पेंशन की उम्मीद में हम यहां आए थे, लेकिन अब तक कुछ मिला नहीं है.

    सभी तस्वीरें और आलेख बीबीसी संवाददाता सलमान रावी की हैं.

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