खुशवंत सिंह
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

'तमन्नाएं कहां ख़त्म होती हैं!'

  • 20 मार्च 2014

अपनी बेबाकी के लिए मशहूर भारतीय पत्रकारिता के 'ग्रैंड ओल्ड मैन' खुशवंत सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे. वो 99 साल के थे. अंग्रेज़ी के जाने माने पत्रकार, लेखक और स्तंभकार ख़ुशवंत सिंह का गुरूवार को उनके दिल्ली स्थित निवास पर निधन हो गया.

खुशवंत सिंह के साल 1969 में 'द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया' के संपादक बनने के बाद भारतीय पत्रकारिता करवटें बदलने लगी. उन्होंने अपने खास अंदाज में भारत के हर रंग रूप को स्थान देना शुरू किया. असर ऐसा हुआ कि आठ साल में वीकली का सर्कुलेशन 5 हजार से साढ़े चार लाख तक पहुंच गया.

अनीश्वरवादी होने के बावजूद खुशवंत सिंह ने दुनिया के हर धर्म ग्रंथ का बेहद बारीकी से अध्ययन किया था.

वो लकीर के फकीर नहीं थे. मौलिकता का आलम ये था कि वे मनमोहन सिंह को भारत का सर्वकालिक महान प्रधानमंत्री बताते थे और नेहरु के बारे में कहते थे कि उनमें दूरदृष्टि और करिश्मा तो था मगर वे घोर रूस समर्थक और अमरीका विरोधी थे.

उनमें बहुत कुछ करने की तमन्ना बाकी थी. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए लाइनें कही थीं, "जिस्म तो बूढ़ा है, आंख अब भी बदमाश है, दिल अब भी जवां है."