बुद्ध की छाया में अफ़ग़ान आशियाने

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अफ़ग़ानिस्तान का बामियान सूबा छठी सदी में बनाई गई बुद्ध की आदमक़द मूर्तियों के लिए मशहूर है.

14 साल पहले तालिबान ने इसे बमों से तबाह कर दिया था, मगर पूरी तरह नेस्तनाबूद नहीं कर पाए.

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जिन शिल्पकारों ने चट्टानें काटकर इन मूर्तियों को गढ़ा था, उन्होंने बामियान घाटी में कई गुफ़ाएं भी बनाईं थी.

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इनका इस्तेमाल बौद्ध भिक्षु सदियों तक ध्यान और एकांत में रहने के लिए करते रहे. इनमें से कुछ गुफ़ाओं में अब तक़रीबन 700 अफ़ग़ान परिवार रहते हैं, जिनके पास न तो ज़मीन है और न घर बनाने की हैसियत.

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रमज़ान और उनकी पत्नी जोहरा पिछले आठ साल से ऐसी ही एक गुफ़ा में रह रहे हैं.

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उनका बेटा और दो लड़कियां इसी गुफ़ा में पैदा हुए. दूसरे स्थानीय बच्चों की तरह वह भी स्कूल नहीं जाते.

कब्ज़ा

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रमज़ान का कहना है कि यहां पढ़ा-लिखा आदमी बनने की कोई उम्मीद नहीं है. आसपास कोई स्कूल नहीं है और सख़्त ग़रीबी और पिछड़ेपन के कारण लोग अपने बच्चों को काम पर लगा देते हैं.

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जब तालिबान ने 1990 के दशक में बामियान पर क़ब्ज़ा किया, तो इन गुफ़ाओं में रहने वाले ज़्यादातर लोग बेघर हो गए थे.

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तब यहां रहने वाली ज़्यादातर आबादी का संबंध शिया हज़ारा बिरादरी से था. इसीलिए उनके घरों को सुन्नी कट्टरपंथियों ने आग के हवाले कर दिया था. जब लोग लौटे तो उन्हें कहीं जाने का रास्ता नज़र नहीं आया.

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47 बरस की हलीमा की ज़िंदगी भी पूरी तरह बदल गई जब तालिबान ने उनके पति को मार डाला. वह एक कमरे वाली गुफ़ा में अपने बेटे, बहू और तीन पोते-पोतियों के साथ रहती हैं.

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गुफ़ा की दीवार पर उनके परिवार की तस्वीर लगी है और फ़र्श पर कालीन बिछा है. वह कहती हैं, "यहां जीवन कभी भी आसान नहीं था."

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कुछ साल पहले स्थानीय अधिकारियों ने वहां के निवासियों को प्लॉट देकर गुफ़ाओं से निकालकर दूसरी जगह बसाने की कोशिश की थी, पर ऐसा नहीं हो पाया.

विरासत

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बामियान के गवर्नर गुलाम अली वेहदत कहते हैं, "ये गुफ़ाएं हमारी विरासत हैं. इन्हें खाली किया जाना चाहिए. इनका संरक्षण होना चाहिए और सैलानियों के लिए इन्हें खोल दिया जाना चाहिए."

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अब अली वेहदत को अफ़ग़ान सरकार से मदद की दरकार है कि वे लोगों को बसाने करने के लिए कोई योजना बनाए.

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लेकिन बामियान में सिर्फ़ गुफ़ा में रहने वाले लोगों की ही अकेली समस्या नहीं है. जब तालिबान ने बुद्ध की विशाल मूर्ति को गोला बारूद से तबाह किया था तो इन चट्टानों में दरारें पड़ गई थीं.

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काबुल में यूनेस्को के लिए काम कर रही सारा नौशादी ने बीबीसी को बताया, "हम बामियान की बड़ी मूर्तियों पर काम कर रहे हैं. इसमें दो साल लगेंगे.'

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बामियान को 2015 के लिए दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक राजधानी चुना गया है. अफ़ग़ानिस्तान में कई लोगों को उम्मीद है कि बामियान को पहले की स्थिति में वापस लाया जा सकता है और देसी-विदेशी सैलानियों को बुलाया जा सकता है.

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बामियान में कई लोगों का मानना है कि सरकार को आखिर गुफ़ाओं में रहने वालों के लिए कोई दूसरी जगह की खोज करनी होगी.

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