रफ़ीका, एक चरमपंथी की विधवा
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'बंदूक उन्हें मुझसे ज़्यादा प्यारी थी'

भारत-प्रशासित कश्मीर में दशकों से बंदूक का साया हर ज़िंदगी पर मंडराता रहा है.

एक तरफ़ सुरक्षाबलों की वहां लोकतंत्र बनाए रखने की कोशिश तो दूसरी तरफ़ भारत-विरोधी चरमपंथियों का विद्रोह, और इन सबके बीच वो हज़ारों ज़िंदगियां जो दोनों तरफ़ से क़ुर्बान हो गईं.

पीछे रह गईं तो उनकी विधवाएं और यतीम बच्चे.

बीबीसी संवाददाता शालू यादव वादी में उन दो विधवाओं से मिलीं जो कश्मीर की लड़ाई के दो छोर दिखाती हैं– रफ़ीका जिनके पति चरमपंथी थे और गुलशन जिनके पति सैनिक थे. उनके पतियों के जज़्बे ने उनकी ज़िंदगी पर क्या असर डाला?

सुनिए ये ख़ास रिपोर्ट