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हिंदी साहित्य: बदलाव और विरोध का आईना

2015 हिंदी साहित्य के लिए साहित्यिक रचनाओं से ज़्यादा भाषा और साहित्यकारों के तेवर के लिए चर्चा में रहा.

एक लंबे अर्से के बाद हिंदी में ये एहसास दिखा कि विरोध करना, विरोध करने की आज़ादी होना रचनात्मकता की ज़रूरी शर्त है.

इस आज़ादी पर सवाल खड़ा होते देख आमतौर पर निष्क्रिय और अपनी ही राजनीति में उलझे साहित्यकार मुखर हो जाते हैं.

इसके अलावा अब एक बार फिर हिंदी अकादमिक गलियारों से निकल कर आम पाठकों का लहजा अपना रही है.