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पढ़ाई-लिखाई से बदल जाती हैं लड़कियां?

  • 20 जून 2016

सौ साल पहले मुसलमान औरतें अपनी ज़बान, यानि उर्दू में, कई मुद्दों पर लिख रही थीं.

हाल ही में एक नाटक 'हम ख़वातीन' में इन लेखों को प्रस्तुत किया गया.

इन्हीं में से एक, ‘स्कूल की लड़कियाँ’, लड़कियों के स्कूल जाने के मसले पर आधारित था.

प्रस्तुति - श्वेता त्रिपाठी

मुश्किल शब्दों का अनुवाद

मुख़ालिफ़ीन - विरोधियों

ख़िलाफ़े मामूल - दस्तूर के ख़िलाफ़

उयूब - बुराइयाँ

वबा - आफ़त

आर - शर्मिंदगी

अज़ीज़ा - प्रिय

क़ौल - वक्तव्य

अम्दन - जान-बूझकर

शाहिद - गवाह

लक़ब - उपाधि

तज़किरा - वर्णन

तास्सुब - पक्षपात