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बुधवार, 17 जुलाई, 2002 को 04:39 GMT तक के समाचार
उत्तरी आयरलैंड की समस्या


उत्तरी आयरलैंड

उत्तरी आयरलैंड की समस्या की जड़ें इतिहास के गर्भ में छिपी हैं. मौजूदा समस्या का अस्तित्व 1920-21 में आया जब कई शताब्दियों तक ब्रिटेन के शासन में रहने के बाद आयरलैंड का बंटवारा किया गया.

यह बंटवारा इस तरह किया गया कि ब्रिटेन के साथ रहने वाले आयरलैंड में यानी उत्तरी आयरलैंड में इसाइयों के प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोगों का बहुमत रहे. अलग देश बने आयरलैंड गणराज्य में कैथोलिक समुदाय का बहुमत रहा.

मौजूदा समस्या यह है कि उत्तरी आयरलैंड में रहने वाले अल्पसंख्यक कैथोलिक समुदाय के लोग उत्तरी आयरलैंड को आयरलैंड गणराज्य में मिलाना चाहते हैं. इन लोगों को राष्ट्रवादी कहा जाता है. जबकि बहुसंख्यक प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग उत्तरी आयरलैंड का ब्रिटेन में विलय चाहते हैं. इन्हें विलयवादी कहा जाता है.

समस्या की शुरुआत

कई शताब्दियों तक ब्रिटेन के शासन में रहने के बाद आयरलैंड में 1916 में विद्रोह हुआ. इसके बाद 1920-21 में आयरलैंड का बंटवारा किया गया. आयरलैंड की 32 में 26 काउंटी को स्वतंत्रता मिली और इस तरह आयरलैंड गणराज्य बना. बाकी छह काउंटी अब भी बतौर उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन का हिस्सा हैं.

वैसे यूनाइटेड किंगडम संसद ने 1920 में बेलफ़ास्ट में स्टॉरमांट में बनाई गई संसद और सरकार को ज़्यादातर मामलों में अधिकार दे दिए.

1921 से 1972 तक उत्तरी आयरलैंड से वेस्टमिनस्टर संसद में सदस्य चुने जाते रहे. लेकिन स्टॉरमांट स्थित सरकार स्वशासी सरकार के रुप में काम करती रही.

1921 में बंटवारा कुछ इस तरह किया गया कि ब्रिटेन के साथ रहने वाले आयरलैंड यानी उत्तरी आयरलैंड में प्रोटेस्टेंट लोगों का बहुमत रहे. बाकी समूचे द्वीप पर कैथोलिक समुदाय बहुसंख्यक है.

इस तरह उत्तरी आयरलैंड में अधिकार विलयवादी पार्टी के हाथों में रहे. यह पार्टी उन लोगों की है जो ब्रिटेन से विलय का समर्थन करते हैं. दूसरी तरफ़ हैं राष्ट्रवादी समुदाय जिसकी तादाद क़रीब एक तिहाई है. यह समुदाय आइरिश एकता की वक़ालत करता है और चाहता है कि समूचे आयरलैंड को एक अलग देश का दर्जा मिले.

इस तरह उत्तरी आयरलैंड को दो अलग-अलग विचारधाराओं में बांटा जा सकता है. एक है यूनियनसिस्ट यानी विलयवादी और दूसरी नेशनेलिस्ट यानी राष्ट्रवादी. यह विभाजन ऐतिहासिक और धार्मिक है. प्रोटेस्टेंट इसाई ( विलयवादी) और कैथोलिक ( राष्ट्रवादी).

लेकिन आयरलैंड समस्या की शुरुआत क़रीब 800 साल पहले हुई थी. तब ब्रिटेन ने अपने पड़ोसी द्वीप को कब्ज़े में लेने का फ़ैसला किया था. पिछले 800 साल में ब्रिटेन को आयरलैंड से हटाने की और आयरलैंड को ब्रिटिश बनाने की यानी दोनों तरह की कोशिशें हुईं.

हिंसा का दौर

1969 में उत्तरी आयरलैंड में नागरिक अधिकारों के लिए अभियान शुरु हुआ. यह आरोप लगाए गए कि वहां अल्पसंख्यक कैथोलिक समुदाय दोयम दर्जे की ज़िंदगी जीने पर मजबूर है. लेकिन जल्दी ही इस अभियान को दबा दिया गया. इसके बाद शुरुआत हुई राजनीतिक हिंसा की और इस तरह प्रोविजनल आईआरए ( आइरिश रिपब्लिकन आर्मी) का अस्तित्व सामने आया.

आईआरए इससे कई साल पहले से मौजूद थी. लेकिन 1970 में यह दो भागों में बांटी गई. अधिकृत आईआरए और प्रोविजनल आईआरए. अब प्रोवजिनल आईआरए को ही आईआरए कहा जाता है. आईआरए ने ब्रिटेन की मौजूदगी के ख़िलाफ़ हिंसक अभियान शुरु किया. यह अभियान 1994 में आईआरए के युद्वविराम के एलान तक चला.

उत्तरी आयरलैंड में 1970 से शुरु हुए हिंसा के दौर के बाद उत्तरी आयरलैंड संसद स्थगित कर दी गई और ब्रिटेन सरकार ने उत्तर आयरलैंड सरकार के सारे काम और अधिकार अपने हाथ में ले लिए. इसके बाद से ही उत्तरी आयरलैंड का सारा कामकाज उत्तरी आयरलैंड मामलों का एक मंत्री करता है जो ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य है. (सिर्फ़ 1974 में कुछ दिनों के लिए सत्ता के बंटवारे के लिए एक अधिकारी नियुक्त किया गया था.)

ब्रिटेन सरकार का यह नियंत्रण 1998 तक चला जब उत्तरी आयरलैंड के भविष्य के लिए एक समझौता किया गया. इस समझौते को गुड फ़्राइडे या बेलफ़ास्ट समझौते का नाम दिया गया.

गुड फ़्राइडे समझौता

बातचीत के आरंभिक दौर के बाद 10 अप्रैल 1998 शुक्रवार को एक राजनीतिक समझौते पर आयरलैंड और ब्रिटेन की सरकारों ने दस्तख़त किए. इसे गुड फ़्राइडे या बेलफ़ास्ट समझौते का नाम दिया गया. इस समझौते में संवैधानिक बदलाव और नए संस्थानों की स्थापना पर सहमति हुई.

इस समझौते के तीन प्रमुख हिस्से हैं. पहले हिस्से में उत्तरी आयरलैंड की आंतरिक संरचना पर ज़ोर दिया गया. दूसरे हिस्से में उत्तरी आयरलैंड के रिपब्लिक ऑफ़ आयरलैंड से रिश्तों और तीसरे में उत्तरी आयरलैंड के ब्रिटेन से रिश्तों पर प्रकाश डाला गया हैं. इसमें संवैधानिक मुद्दों, अधिकारों, हथियारों पर रोक, सुरक्षा, नीतियों और क़ैदियों के बारे में विस्तार से बताया गया हैं.
 
 
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