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गुरुवार, 22 नवंबर, 2001 को 13:54 GMT तक के समाचार
जॉर्ज फ़र्नांडीस: विवादों का पुलिंदा
जॉर्ज फ़र्नांडीस एक सैनिक अधिकारी के साथ
जॉर्ज फ़र्नांडीस एक सैनिक अधिकारी के साथ

दिल्ली के कृष्ण मेनन मार्ग पर रहने वाले जॉर्ज फ़र्नांडीस के बारे में लोग मज़ाक में कहते हैं कि वे वहां रहते हैं क्योंकि वे कृष्ण मेनन के मार्ग पर चलते हैं. कृष्ण मेनन नेहरू मंत्रिमंडल के सबसे विवादास्पद मंत्री थे.

अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत ट्रेड यूनियन नेता के रूप में करने वाले जॉर्ज फ़र्नांडीस की छवि एक जुझारू नेता की रही है.

एक समय भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कटु आलोचक रहे जार्ज फ़र्नांडीस ने जब बीजेपी से गठबंधन का फ़ैसला किया तो लोग हैरान रह गए.

हमेशा विवादों में रहने वाले जॉर्ज फ़र्नांडीस को तहलका मामले के सामने आने के बाद रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

लंबी पारी

कर्नाटक के मंगलौर शहर में 1930 में जन्मे जॉर्ज फ़र्नांडीस पहली बार 1967 में लोकसभा में आए. इस समय तक जॉर्ज के युवा मज़दूर नेता के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे.

लेकिन उन्हें पूरे देश ने 1970 के दशक में जाना जब उन्होंने रेल कर्मचारियों की ऐतिहासिक हड़ताल का नेतृत्व किया. वे धल इंडिया रेलवे मेन्स फ़ेडरेशन के अध्यक्ष थे और उनके आह्वान पर 1974 में रेलवे के 15 लाख कर्मचारी हड़ताल पर चले गए.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जून 1975 में इमरजेंसी की घोषणा कर दी तो जॉर्ज इंदिरा हटाओ लहर के एक नायक बनकर उभरे. ठीक एक वर्ष बाद उन्हें मशहूर बड़ौदा डाइनामाइट केस के अभियुक्त के रूप में गिरफ़्तार कर लिया गया.

मंत्री पद

इमरजेंसी हटने के बाद 1977 का लोकसभा चुनाव उन्होंने जेल से लड़ा और भारी बहुमत से जीते.

वे मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडल में संचार मंत्री के तौर पर शामिल हुए और कुछ महीनों बाद उन्हें उद्योग मंत्री बना दिया गया. उद्योग मंत्री के रूप में कोका कोला को भारत से हटाने में उनकी भूमिका बहुत चर्चित रही.

इसके बाद 1990 में वीपी सिंह के मंत्रिमंडल में संभवत उनके पुराने अनुभवों को देखते हुए उन्हें रेल मंत्री बनाया गया.

समता पार्टी

जनता पार्टी और उसके बाद जनता दल के कई टुकड़ों में बंट जाने और राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव से टकराव के बाद जॉर्ज फ़र्नांडीस ने 1994 में समता पार्टी का गठन किया.

समता पार्टी ने बिहार में लालू यादव को सत्ता से हटाने का आह्वान करते हुए 1995 में भारतीय जनता पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन किया.

1996 के लोकसभा चुनाव में इस नवगठित दल का प्रदर्शन अच्छा रहा. समता पार्टी, बीजेपी की सरकार बनाने की योजना को सफल बनाने में कारगर साबित हुई.

अंतहीन विवाद

ऐतिहासिक रेल हड़ताल के समय से तहलका मामले के सामने आने तक, जॉर्ज फ़र्नांडीस लगातार विवादों के केंद्र में रहे हैं.

जॉर्ज फ़र्नांडीस कहते हैं कि वे सत्ता में रहें या विपक्ष में, हमेशा बेझिझक सच्ची बात कहते हैं.

उन्होंने खुलकर कहा कि चीन, भारत का दुश्मन नंबर एक है. इस पर काफ़ी हंगामा हुआ और भारतीय कूटनीतिकों को चीन को यह समझाने में ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी कि यह सरकार की नहीं बल्कि जॉर्ज फ़र्नांडीस की निजी राय है.

नौसेना अध्यक्ष एडमिरल विष्णु भागवत की बर्ख़ास्तगी से एक नया हंगामा खड़ा हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया.

पाकिस्तान के साथ कारगिल संघर्ष जब चरम पर था तब रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडीस ने एक बयान देकर सबको चौंका दिया. उन्होंने कहा कि कारगिल के संघर्ष के लिए पाकिस्तान की सेना ज़िम्मेदार है और वहां की सरकार का इससे कुछ लेना-देना नहीं है.

कारगिल संघर्ष के दौरान ही उन्होंने परंपराओं को तोड़ते हुए सेना के शीर्ष अधिकारियों को भारतीय जनता पार्टी की एक बैठक में ताज़ा स्थिति की जानकारी देने के लिए भेजा. इस पर विपक्षी दलों ने काफ़ी शोर मचाया और सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ी.

इसी तरह वे तिब्बत के मामले पर बयान देकर चीन की सरकार को नाराज़ कर चुके हैं.

जॉर्ज फ़र्नांडीस के आलोचक कहते हैं वे जब सरकार में होते हैं तो भी एक कार्यकार्ता की तरह व्यवहार करते हैं जिससे सरकार के लिए परेशानियां खड़ी होती रहती हैं.

लेकिन इन सबके बावजूद, राजनीति पर नज़र रखने वाले कहते हैं कि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन में संयोजक के तौर पर जॉर्ज फ़र्नांडीस ने काफ़ी ज़िम्मेदारी के साथ काम किया है. कई मौक़ों पर वे वाजपेयी के दूत बनकर क्षेत्रीय नेताओं से मिले हैं.

कई रूप

सांसदों का परिचय देने वाली सरकारी पुस्तिका का कहना है कि जॉर्ज फ़र्नांडीस एक श्रमिक नेता, राजनीतिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं.

वे एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों से जुड़े है और परमाणु हथियारों के मुखर विरोधी रहे हैं.

जॉर्ज फ़र्नांडीस ने अंग्रेज़ी में तीन किताबें लिखी हैं- व्हाट एल्स सोशलिस्ट्स, रेल स्ट्राइक ऑफ 1974 और जार्ज स्पीक्स.

इसके अलावा वे हिंदी की एक मासिक पत्रिक प्रतिपक्ष के संपादक मंडल के अध्यक्ष रहे हैं. उन्होंने कुछ समय तक एक अंग्रेज़ी पत्रिका दि अदर साइड का संपादन भी किया है.
 
 
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