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बुधवार, 30 जनवरी, 2002 को 10:03 GMT तक के समाचार
खादी का जादू अब नए रंग में
खादी का जादू अब भी बरक़रार
खादी का जादू अब भी बरक़रार

दिल्ली से ज्योत्सना सिंह

जाने-माने भारतीय डिज़ाइनरों द्वारा तैयार खादी के कपड़ों की एक प्रदर्शनी बुधवार को दिल्ली में शुरू हुई.

प्रदर्शनी का उद्घाटन महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया.

दो हफ़्ते चलने वाली इस प्रदर्शनी का आयोजन भारत के अंतराष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक धरोहर कोष ने किया है.


पश्चिमी और भारतीय डिज़ाइन
खादी जो एक समय भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक हुआ करती थी, आज अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही है.

'खादी: परिधान स्वतंत्रता का' नाम से लगाई गई इस प्रदर्शनी में खादी को कुछ ऐसे ग्लैमर भरे अंदाज़ में पेश किया गया है जैसा पहले कभी नहीं देखा गया.

आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश और बिहार से लाए गए अलग-अलग तरह की खादी से तैयार किए गए कपड़ों से पश्चिमी और भारतीय दोनों तरह की पोशाकें तैयार की गई हैं.

इनमें मिनी स्कर्ट, कोट, जैकेट से लेकर साड़ियाँ, सलवार-कुर्ता, पायजामे वगैरह शामिल हैं.

खादी उद्योग

इस आयोजन का उद्देश्य खादी को आज के समय में प्रासंगिक और लोकप्रिय बनाना है.


खादी की गुणवत्ता बढ़ाने और उसको बाज़ार में बेचने के लिए शोध और प्रयोग की आवश्यकता है

मार्तंड सिंह, प्रदर्शनी के आयोजक
फ़ैशन की दुनिया की जानी-मानी हस्तियाँ- ड्रेस डिज़ाइनर रितु कुमार, संदीप खोसला, अबू जानी और राकेश ठकोरे जैसे लगभग नौ डिज़ाइनरों ने इसमें हिस्सा लिया है.

इन डिज़ाइनरों का मानना है कि आज-कल मशीनों द्वारा उत्पादन के ज़माने में हाथ से बनी हुई खादी विलास की वस्तु के तौर पर पेश की जा सकती है.

इस प्रदर्शनी के निदेशक मार्तंड सिंह कहते हैं ''खादी से जुड़े संस्थानों को खादी की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए और उसको बाज़ार में बेचने के लिए शोध और प्रयोग करने की आवश्यकता है."

आलोचना

लेकिन पुराने गांधीवादी विचारधारा के लोग इससे बेहद नाराज़ हैं क्योंकि उनके विचार से इससे महात्मा गांधी की सादगी और बहुजन हिताय जैसे आदर्शों को ठेस पहुंचती है.


विलास की ऐसी चीज़ों से गांधी के नाम को जोड़ना उचित नहीं है

राजीव वोरा, गांधी शांति प्रतिष्ठान
खादी को लोकप्रिय बनाने का ये तरीका भी उन्हें रास नहीं आ रहा है.

उनका कहना है कि खादी एक दर्शन, एक सोच है और इसे धनी लोगों के विलास की वस्तु बना देना ठीक नहीं है.

गांधी शांति प्रतिष्ठान के राजीव वोरा कहते हैं ''इससे तो सिर्फ़ शोषण का रास्ता खुलेगा. यदि खादी को आगे बढ़ाना है तो उसके लिए स्थानीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी और ऐसा माहौल तैयार किया जाए जिससे ज़्यादा से ज़्यादा लोग खादी को अपनाएं,''

''डिज़ाइनर कपड़े तो अमीरों की अलमारियों में सजावट का सामान बन कर रह जाएंगे और फ़ैशन ख़त्म होते ही उतार कर फेंक दिए जाएंगे तो इससे बाज़ार और रोजगार कहाँ से बढ़ेगा?''

''विलास की ऐसी चीज़ों से गांधी के नाम को जोड़ना उचित नहीं है."

आँकड़ों के अनुसार भारत में लगभग पचास लाख लोग सीधे या परोक्ष रूप से हथकरघा उद्योग से जुड़े हुए हैं.

इनमें से लगभग आठ लाख लोग पिछले कुछ वर्षों में अपनी ये छोटी-मोटी जीविका भी खो चुके हैं.
 
 
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