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सोमवार, 11 फरवरी, 2002 को 02:30 GMT तक के समाचार
क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण
2001 में रूसी क्रायोजेनिक इंजन वाले जीएसएलवी का परीक्षण
2001 में रूसी क्रायोजेनिक इंजन वाले जीएसएलवी का परीक्षण

भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक और महत्वपूर्ण कामयाबी हासिल की है. अधिकारियों के अनुसार भारत ने शनिवार को स्वनिर्मित क्रायोजेनिक इंजन का सफलतापूर्वक परीक्षण किया.

ये इंजन पृथ्वी से 36 हज़ार किलोमीटर ऊपर भूस्थिर कक्षा में उपग्रह छोड़ने के काम में आता है.

भारत अब तक ऐसे उपग्रहों को छोड़ने के लिए रूसी क्रायोजेनिक इंजनों का प्रयोग करता रहा है.

इन उपग्रहों को भूस्थिर कक्षा में भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान यानी जीएसएलवी की सहायता से पहुँचाया जाता है.

क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल जीएसएलवी के तीसरे चरण में होता है.


जीएसएलवी प्रक्षेपण
अभी तक दुनिया में सिर्फ़ पाँच ऐसे देश हैं जिन्होंने इस इंजन का निर्माण किया है. ये अमरीका, रूस, चीन, जापान और फ़्रांस.

इस तरह क्रायोजेनिक इंजन के परीक्षण के बाद भारत अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अब इन पाँच महत्वपूर्ण देशों के साथ खड़ा हो गया है.

भारतीय अंतरिक्ष आयोग के सदस्य प्रोफ़ेसर यू आर राव ने कहा कि शनिवार का परीक्षण तमिलनाडु में महेंद्रगिरि पहाड़ियों में भारतीय अंतरिक्ष शोध संगठन यानी इसरो के प्रक्षेपण केंद्र पर किया गया.

इससे पहले फ़रवरी 2000 में ये परीक्षण सफल नहीं हुआ था.

यू आर राव के अनुसार भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में ये परीक्षण मील का एक पत्थर है.

हालांकि समाचार एजेंसी पीटीआई ने इसरो के सूत्रों के हवाले से कहा है कि शनिवार का परीक्षण छोटी अवधि का था और ये 10 सेकंड तक चला.

इन सूत्रों के अनुसार इस इंजिन का लंबी अवधि के लिए परीक्षण किया जाना अभी बाक़ी है.

लेकिन प्रोफ़ेसर यू आर राव ने बीबीसी हिंदी सेवा को दिए एक इंटरव्यू में इन ख़बरों को ग़लत बताया. उन्होंने कहा कि शनिवार का परीक्षण लंबी अवधि का था.

उपग्रह कार्यक्रम

प्रोफ़ेसर राव का कहना है कि क्रायोजेनिक इंजन के सफल परीक्षण के बाद अब भारत को अंतरिक्ष बाज़ार में पैर जमाने में कामयाबी मिल जाएगी.

उन्होंने कहा कि इस इंजन के आने वाले दिनों में कुछ परीक्षण और किए जाएँगे.

इसरो की योजना है कि क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल कर सन् 2003 तक भारत का अपना जीएसएलवी छोड़ा जाए.

इसरो को उम्मीद है कि सन् 2004 या फिर 2005 तक और अधिक शक्तिशाली क्रायोजेनिक इंजन बनाया जा सकेगा.

इस शक्तिशाली इंजन की मदद से सन् 2007 में जीएसएलवी के प्रकार को अंतरिक्ष में भेजने की योजना है.

जीएसएलवी का पहला व्यवसायिक प्रक्षेपण 2002-2003 में होना है. इसके बाद सन् 2006-07 में हर वर्ष दो प्रक्षेपण किए जाएँगे.
 
 
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