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बुधवार, 06 मार्च, 2002 को 18:13 GMT तक के समाचार
अरूंधती : क़लम की नायिका
छोटी उम्र से ही विवाद शुरू हो गए लेकिन परवाह नहीं
छोटी उम्र से ही विवाद शुरू हो गए लेकिन परवाह नहीं

भारत की अंगरेज़ी लेखिका अरूंधती रॉय 1997 में उस समय दुनिया में मशहूर हुईं जब उन्हें अपना पहला ही उपन्यास लिखने के लिए पेशगी के तौर पर पाँच लाख पाउंड यानि क़रीब तीन करोड़ रूपए की राशि मिली थी.

उनके पहले ही उपन्यास "द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स" को 1997 में बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

बुकर पुरस्कार ब्रिटेन की साहित्यिक दुनिया में काफ़ी प्रतिष्ठित माना जाता है और अरुंधती को ये पुरस्कार उनका उपन्यास प्रकाशित होने के छह महीने बाद ही मिल गया था.

उनका ये उपन्यास 21 देशों में प्रकाशित किया गया.

लेकिन अरुंधती रॉय पर शायद इस सफ़लता का कोई असर नहीं हुआ जिसका संकेत उन्होंने बुकर पुरस्कार स्वीकार करते समय ही दे दिया था.


रॉय बाँध के ख़िलाफ़ हैं
अरुंधती ने कहा था कि "ये सिर्फ़ पाँच जजों का फ़ैसला है. अगर इनकी जगह कोई अन्य पाँच जज होते तो शायद तस्वीर कुछ उल्टी भी हो सकती थी."

"मेरी ये पुस्तक दरअसल सबसे अच्छी नहीं बल्कि इसे ख़ुशक़िस्मत पुस्तक कहा जाएगा."

लेकिन अरूंधती रॉय के इस उपन्यास की सफ़लता निर्विवाद भी नहीं रही.

बुकर पुरस्कार वितरण समारोह के दिन ही एक टेलीविज़न पर चर्चा में साहित्यकार करमैन कॉलिल ने अरूंधती रॉय के उपन्यास को 'घृणा के योग्य' क़रार दिया था.

करमैन कॉलिल 1996 में बुकर पुरस्कारों का फ़ैसला करने वाली जूरी के अध्यक्ष रह चुके थे.

उन्होंने कहा था कि इसे पुरस्कार के लिए छाँटी गई पुस्तकों की सूची में भी शामिल नहीं किया जाना चाहिए था.

उधर भारत के केरल राज्य के मुख्यमंत्री ई के नयनार ने भी कहा था कि अरूंधती रॉय के उपन्यास को पश्चिमी देशों में किसी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि इसके साम्यवाद-विरोधी होने के लिए कामयाबी मिली.

इलैक्ट्रिक मून

1961 में पश्चिम बंगाल में जन्मी और केरल में बड़ी हुईं अरूंधती रॉय के लिए ऐसे विवाद कोई नई बातें नहीं हैं और उन्होंने कभी इनकी परवाह नहीं की.

16 साल की उम्र में ही अरूंधती ने घर छोड़ दिया और दिल्ली के लिए रवाना हो गईं. वहाँ उन्होंने वास्तुकला के एक कोर्स में दाख़िला लिया और वहीँ एक मित्र से विवाह भी कर लिया.

उसके बाद कुछ दिन गोवा में गुज़ारने के बाद अरूंधती ने एक बार फिर दिल्ली की तरफ़ रूख़ किया जहाँ इस बार उनकी मुलाक़ात फ़िल्म निर्देशक प्रदीप कृष्ण से हुई जो बाद में उनके दूसरे पति बने.

अरूंधती ने 1985 में फ़िल्म मैसी साहब में एक आदिवासी महिला भूमिका निभाई.

अरूंधती की क़लम से
  • द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स

  • द कॉस्ट ऑफ़ लिविंग

  • वॉर इज़ पीस

  • पॉवर पॉलिटिक्स
  • उसके बाद अरूंधती ने अनेक फ़िल्मों के लिए पटकथाएं भी लिखीं और भूमिकाएं भी निभाईं. इनमें 1992 में बनी उनके पति की फ़िल्म 'इलैक्ट्रिक मून' भी शामिल थी.

    उसके कुछ ही समय बाद अरूंधती ने शेखर कपूर की फ़िल्म बैंडिट क्वीन की आलोचना करते हुए एक लेख लिखा.

    अरूंधती ने कहा था कि बैंडिट क्वीन में फूलन देवी के नाम का ग़लत फ़ायदा उठाया गया. फूलन देवी की जून 2001 में दिल्ली में हत्या कर दी गई थी.

    उसी विवाद के दौरान अरूंधती ने अपना पहला उपन्यास लिखना शुरू किया जो सचमुच छोटी चीज़ का ईश्वर बनकर उभरा.

    बुकर पुरस्कार जीतने के बाद तो अरूंधती रातों रात स्टार बन गईं और उसके बाद तो उन्होंने राजनीतिक मुद्दों पर भी अपनी राय देना शुरू कर दी.

    अरूंधती ने राजनीति के साथ साथ आर्थिक उदारीकरण, धार्मिक कट्टरवाद और हाल ही में अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी युद्ध के ख़िलाफ़ ख़ूब बढ़चढ़कर लिखा है.

    ब्रिटेन के एक अख़बार गार्डियन को पिछले साल अक्तूबर में दिए एक इंटरव्यू में अरुंधती ने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान में जो भी बेक़सूर लोग मारे गए उन्हें न्यूयार्क और वाशिंगटन में मारे गए लोगों की संख्या में जोड़कर देखा जाना चाहिए.

    लेकिन नर्मदा बाँध पर दिए गए अपने विचारों की वजह से तो अरूंधती को एक दिन की जेल भी काटनी पड़ गई.

    इस मामले पर उनका पहला लेख "द ग्रेटर कॉमन गुड" एक साप्ताहिक पत्रिका आउटलुक में प्रकाशित हुआ.

    इस लेख में अरूंधति ने उन लोगों को छोटे छोटे हीरो बताया जो नर्मदा बाँध के निर्माण से बेघर हो सकते हैं.

    अरूंधती की दलील है कि 21 सदीं में देश और दुनिया में छोटी चीज़ों को भी जगह मिलनी चाहिए.
     
     
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