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शनिवार, 17 अगस्त, 2002 को 14:15 GMT तक के समाचार
क्या हरित क्रांति असफल रही?
हरित क्रांति से सामाजिक व्यवस्था पर असर पड़ा
हरित क्रांति से सामाजिक व्यवस्था पर असर पड़ा

भारत में साठ के दशक में हरित क्रांति का नारा गूँजा और तब इसका उद्देश्य भुखमरी से निजात पाना बताया गया था. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अँधाधुँध प्रयोग ने चाहे फसलों का उत्पादन बढ़ा दिया हो लेकिन ज़मीन की उत्पादकता को क़रीब-क़रीब ख़त्म कर दिया. अभिसार शर्मा ने पंजाब में हरित क्रांति की मौजूदा स्थिति का जायज़ा लिया.

साठ के दशक के उत्तरार्ध में पंजाब में हरित क्रांति ने चमत्कारी परिणाम दिखाए. ख़ासतौर से 1969 में जब गेहूँ का उत्पादन 1965 की तुलना में क़रीब 50 प्रतिशत और बढ़ा.

भारत सरकार के लिए ये निहायत ही अचरजभरे और चौंका देने वाले परिणाम थे.


गेहूँ और चावल के उत्पादन पर अधिक ज़ोर
कुछ ही वर्ष पूर्व दो असफल मॉनसून की वजह से भारत को अमरीका के कुल गेहूँ उत्पादन का पाँचवा हिस्सा मँगवाना पड़ा था.

हरित क्रांति को यथार्थ में बदलने के लिए जीन संशोधित बीज और रासायनिक उर्वरकों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की.

लेकिन सवाल यह था कि इस हरित क्रांति को उस समय बरक़रार रखने के लिए किन चीज़ों की ज़रूरत थी.

उत्पादन और वितरण

पंजाब सरकार में योजना आयोग के उपाध्यक्ष और राज्य में कृषि के पुनर्जीवन के लिए गठित समिति के सदस्य एस एस जॉल का कहना है, ''वह यह था कि जो भी उत्पादन हो उसकी ख़रीद की जाए.''


ग्रीन पर इतना ज़ोर हो गया कि यह ग्रीन के बजाए ग्रेन क्रांति में तब्दील हो गई

डॉक्टर कर्ण सिंह
''उसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य आ गया. फिर यह हुआ कि सरकार को उसकी ख़रीद करनी पड़ती थी. तो उसके लिए लेवी व्यवस्था शुरू की गई.''

''अनाज के भंडारण और वितरण के लिए भारतीय खाद्य निगम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली थी. इस तरह उत्पादन से वितरण तक की पूरी सीरिज़ बन गई. ''

डॉक्टर जॉल भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पंजाब ही नहीं देश के उन हिस्सों में जहाँ पानी की कमी थी हरित क्रांति असफल साबित हुई.

आदर्श मॉडल?

ऐसे देश में जहाँ मॉनसून हमेशा से ही आँख-मिचौली खेलता आया है, क्या हरित क्रांति एक आदर्श मॉडल साबित हो सकती थी?


भारत में मॉनसून की आँख-मिचौली
लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में एग्रो-इकोनॉमिक शोध सेंटर के निदेशक डॉक्टर कर्ण सिंह का मानना है कि ''नीति निर्धारकों द्वारा इसके दूरगामी परिणाम न देखने के वजह से यह कई मायनों में अधूरा रह गया.''

''ग्रीन पर इतना ज़ोर हो गया कि यह ग्रीन के बजाए ग्रेन क्रांति में तब्दील हो गई.''

''वह इसलिए क्योंकि सिर्फ़ ग्रेन के बाज़ार को समर्थन दिया गया. और किसी के लिए मार्केटिंग की व्यवस्था नहीं की गई.''

रसायनों का प्रयोग

पर्यवेक्षकों का मानना है कि उस वक़्त की कृषि नीति में रासायनिक उर्वरक ज़मीन के स्वाभाविक पौष्टिक तत्वों से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गए और उन्हें प्राथमिकता मिलने लगी.

डॉक्टर जॉल का कहना है ''हर साल ज़मीन गेहूँ और चावल लेते गए और उसमें आप रासायनिक उर्वरक डालते गए.''

''जो उत्पादन क्षमता थी उसे बरक़रार रखने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा रासायनिक उर्वरक डालते गए. साथ ही कीटनाशकों का प्रयोग करना पड़ा.''

''आज अगर उसमें उर्वरक न डालो तो कोई उत्पादन ही नहीं होगा.''

समाज पर असर

दरअसल 80 के दशक के मध्य में हरित क्रांति से जुड़ा उन्माद काफ़ी हद तक फ़ीका पड़ गया.

न सिर्फ़ मिट्टी की पौष्टिकता पर ही इसके दुष्प्रभाव दिखाई दिए बल्कि सामाजिक स्तर पर इसके परिणाम छोटे किसानों के लिए घातक साबित हुए.


आज अगर उसमें उर्वरक न डालो तो कोई उत्पादन ही नहीं होगा

डॉक्टर एस एस जॉल
चंडीगढ़ स्थित समाज शास्त्री प्रमोद कुमार का कहना है, ''समृद्धि बढ़ने के साथ दहेज की माँग बढ़ी. उसका सबसे ज़्यादा असर छोटे किसानों पर पड़ा क्योंकि उनके पास पैसे भी नहीं थे दहेज देने के लिए.''

''उसे कर्ज़ लेना पड़ा. इसलिए सामाजिक ज़रूरत बढ़ने के साथ उसे फसल के उत्पादन के लिए आवश्यक सामान को बेचना पड़ा. जैसे ट्रैक्टर बेच कर मारुति कार ली और दहेज में दे दी.''

इसमें कोई शक नहीं है भारत जैसे देश में साठ के दशक में हरित क्रांति का उद्देश्य भुखमरी से निजात पाना था.

इसका समर्थन करने वालों का कहना है कि खेती के पारंपरिक तरीक़े छोटे खेतों के लिए तो सार्थक हो सकते हैं लेकिन बड़ी ज़रूरतें इससे पूरी नहीं हो सकती थीं.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि हरित क्रांति की रुपरेखा तैयार करने से पहले नीति निर्धारकों ने इसकी दीर्घकालिक क्षमता पर विचार नहीं किया और कहीं न कहीं यह तात्कालिक ज़रूरतों को पूरा करने का माध्यम बन कर रह गई.
 
 
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