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शनिवार, 14 सितंबर, 2002 को 22:35 GMT तक के समाचार
डोडो को 'पुनर्जीवित' करने के प्रयास
वैज्ञानिकों द्वारा दोबारा बनाया गया डोडो का मॉडल
वैज्ञानिकों द्वारा दोबारा बनाया गया डोडो का मॉडल

डोडो एक ऐसा प्राणी था जो तीन शताब्दी पहले मॉरीशस में काफ़ी संख्या में पाया जाता था. लेकिन उस समय मॉरीशस के टापू पर मानव जीवन नहीं था.

वहाँ हॉलैंड के लोगों के आने के बाद और मानवों की संख्या बढ़ने से डोडो का शिकार किया जाने लगा.

यह प्राणी इतना असहाय और अपनी रक्षा करने में असमर्थ था कि धीरे-धीरे इनका अस्तित्व समाप्त हो गया.

मॉरीशस के राष्ट्रीय चिन्ह में इसे जगह मिली है. मॉरीशस में डोडो के प्रतीक चिन्हों को प्लास्टिक, लक्कड़, सोने और कई कीमती पत्थरों में बनाकर बेचा जाता है.

अब वैज्ञानिकों ने कहा है कि डीएनए से डोडो को दोबारा 'बनाया' जा सकता है.

डोडो कैसे लुप्त हुआ


डोडो कभी मॉरीशस में पूरी आज़ादी से घूमते थे
डच 17वीं शताब्दी की शुरुआत में मॉरीशस पहुँचे जहाँ पहले मानव नहीं थे. वे डोडो को वोल्गवोगेल कहते थे, यानि एक वीभत्स पक्षी.

इसका कारण यह था कि इसके माँस को कितना भी पका लिया जाए, वह नरम और स्वादिष्ट नहीं बनता था.

लेकिन फिर भी डच लोगों ने इसका शिकार नहीं छोड़ा और 1681 तक डोडो इस टापू से लुप्त हो गया.

इस बात पर विभिन्न राय है कि डोडो मुर्गे जैसा था या किसी अन्य पक्षी जैसा. कई लोगों का मानना था कि यह एक फूला हुआ कबूतर था.

यह माना जाता है कि मनुष्यों के आने से पहले डोडो को मारने वाला कोई नहीं था इसलिए उसके पास पहले से भी अपनी रक्षा के लिए जो क्षमता थी उसने वह भी खो दी.

मनुष्यों के साथ-साथ समुद्री जहाज़ों पर डच लोगों के साथ मॉरीशस आए चूहे भी डोडो के लिए घातक सिद्ध हुए.

चूहे डोडो के अंडे खा जाते थे, उनके चूज़ो को भी नहीं छोड़ते थे.

विक्टोरियन ज़माने के वैज्ञानिकों ने इस पक्षी के बारे में बहुत कुछ लिखा और लेविस केरॉल ने बच्चों की पुस्तक 'एलिस इन वंडरलैड' में इसे इतिहास में सबसे नाटकीय पक्षी के तौर पर पेश किया.

वैज्ञानिकों ने डोडो की हड्डियों को जोड़ कर से इसे आकार देने की कोशिश की और इसे मॉरीशस इंस्टीट्यूट में देखा जा सकता है.

वैज्ञानिकों ने तो घोषणा कर दी है कि डीएनए से डोडो को दोबारा बनाया जा सकता है.

क्योंकि मॉरीशस में रहने वाले अधिकतर हिंदू हैं इसलिए उन्हें डोडो के पुनर्जीवित होने का विचार भाता है.
 
 
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डोडो की त्रासदी
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