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मंगलवार, 01 अक्तूबर, 2002 को 20:58 GMT तक के समाचार
जड़ी-बूटियों का वैज्ञानिक परीक्षण
परंपरागत औषधि भारत में बहुत विश्वसनीय और लोकप्रिय हैं
परंपरागत औषधि भारत में बहुत विश्वसनीय और लोकप्रिय हैं

भारत में जड़ी बूटियों का असर तो देखा परखा हुआ लेकिन अब पश्चिमी देशों में भी इनका असर दिखने लगा है.

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने ये साबित करने के लिए एक परियोजना शुरु की है कि आयुर्वेदिक जड़ी बूटियाँ अनेक बीमारियों में बहुत असरदार हैं.

भारत के ग्रामीण इलाक़ो में क़रीब 70 प्रतिशत लोग और चिकित्सक भी जड़ी बूटियाँ ही इस्तेमाल करते और कराते हैं.

परिषद के एक सदस्य प्रोफेसर रणजीत राय चौधरी कहते हैं कि आयुर्वेदिक जड़ी बूटियाँ अनेक बीमारियों में पश्चिमी तकनीक से बनाई गई दवाइयों से कहीं ज़्यादा कारगर हैं.

चिकित्सकीय प्रयोग बताते हैं कि अस्थमा, डायबटीज़ और यौन रोगों में ज़ड़ी बूटियाँ बहुत कारगर साबित होती हैं.

अनुसंधान परिषद ऐसी तमाम बीमारियों और इलाजों पर एक अध्ययन कर रही जिसमें आयुर्वेद और सिद्धी के ज़रिए सदियों से रोगों का इलाज होता रहा है.


आयुर्वेद से इलाज लोकप्रिय
प्रोफेसर राय चौधरी कहते हैं कि अस्थमा, हेपेटाइटिस और गठिया जैसे रोगों के असरदार इलाज के लिए भी भारत में जड़ी बूटियाँ मौजूद हैं.

"यहाँ तक कि सिरदर्द, बुख़ार, सर्दी ज़ुकाम के इलाज के लिए भी जड़ी बूटियाँ मौजूद हैं."

इन जड़ी बूटियों को व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल किए जाने के लिए कुछ पश्चिमी देशों में पहले ही कुछ कंपनियाँ रुचि दिखा रही हैं.

कुछ कंपनियों की योजनाओं के अनुसार उनके लाभ के एक निश्चित हिस्सा किसी क्षेत्र में जड़ी बूटियों पर ख़र्च किया जाता है.

हालाँकि चिकित्सक ये भी मानते हैं कि कुछ मामलों में ये साबित करना मुश्किल है कि जड़ी बूटियाँ किस तरह से और कितने असरदार तरीके से काम करती हैं.

कुछ मानक

जड़ी बूटियों को व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल किए जाने से पहले उनका एक मानक स्तर बनाना होगा.

प्रोफ़ेसर राय चौधरी कहते हैं, "बहुत सी ऐसी जड़ी बूटियाँ हैं जो असरदार हैं और मैं जिन्हें खाने की सिफ़ारिश करूँगा लेकिन उसके एक मानक स्तर तो तय करना ही होगा."

प्रोफ़ेसर चौधरी तो यहाँ तक कहते हैं कि अगर जड़ी बूटियों को भारतीय चिकित्सा पद्यति से निकाल दिया जाए तो पूरी चिकित्सा व्यवस्था ही ठप हो जाएगी.

हालाँकि वे यह भी मानते हैं कि पश्चिमी तरीके से बनाई दवाओं की तरफ़ लोगों का ज़्यादा झुकाव हो रहा है क्योंकि वे तेज़ी से असर करती हैं.

भारत के दूरदराज़ के बहुत से इलाक़ों में कोई डॉक्टर या चिकित्सा सुविधा मुहैया नहीं है. ऐसे में लोग जड़ी बूटियों से ही काम चलाते हैं और चूँकि वे असरदार हैं इसलिए लोकप्रिय भी.

लेकिन एक अफ़सोस की बात ये है कि जड़ी बूटियों के जानकार की मौत के साथ ही उसका ज्ञान भी उसी के साथ चला जाता क्योंकि उसके ज्ञान को आगे बढ़ाने का कोई इंतज़ाम नहीं है.

प्रोफ़ेसर राय चौधरी उम्मीद जताते हैं कि चिकित्सा अनुसंधान परिषद कुछ जड़ी बूटियों की पहचान करके उन्हें व्यावसायिक स्तर पर लाने के लिए काम करेगी और जड़ी बूटियाँ पश्चिमी दुनिया में भी अपनी जगह बना सकेंगी.

ग़ौरतलब है कि कुछ पश्चिमी देश पहले से ही भारत की कुछ देसी औषधियों और जड़ी बूटियों का पेटेंट कराने के लिए प्रयासरत हैं और कुछ कराए भी गए हैं.
 
 
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