आँग सान सू ची: आज़ादी की आशा

आँस सान सू ची
Image caption वर्ष 1988 में देश लौटने के बाद उन्होंने अधिकतर नज़रबंदी में ही गुज़ारा है

बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता आँग सान सू ची वर्षों से देश में लोकतंत्र की स्थापना की लड़ाई लड़ रही है. उन्हें बर्मा में लौह महिला की संज्ञा दी जाती है.

लेकिन जब पूरी दुनिया नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित, नेशनल लीग फ़ार डेमोक्रेसी एनएलडी की महासचिव, 64वर्षीय आँग सान सू ची की रिहाई की प्रतीक्षा कर रही थी. एक बार फिर उनकी नज़रबंदी की अवधि बढ़ा दी गई है.

बर्मा के लोगों के लिए यह निराशा की ख़बर लेकर आया है क्योंकि देश के सैन्य शासन से मुक्ति की सू ची ही आख़िरी आशा हैं.

लेकिन सू ची इससे घबराने वाली नहीं हैं क्योंकि उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा है. वर्ष 1991 में जब वे नज़रबंद थीं तब उन्हें बर्मा में शांति लाने के प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया.

हालाँकि वो ख़ुद पुरस्कार नहीं ले सकीं थी. लेकिन नोबेल शांति पुरस्कार समिति के अध्यक्ष ने पुरस्कार देते समय उन्हें "शक्तिहीनों की शक्ति होने का अतिविशिष्ट उदाहरण कहा था.''

विदेश से बर्मा लौटने के लगभग 20 वर्षों में अधिकतर समय वे रंगून में नज़रबंद रही हैं.

पहली बार छह साल तक नज़रबंद रहने के बाद 10 जुलाई, 1995 को उन्हें रिहा किया गया था.

प्रभावी व्यक्तित्व

Image caption सेना द्वरा रोके जाने पर सितंबर 2000 में उन्होने छह महीने सड़क पर काटे थे

अक्सर कहा जाता है कि नज़रबंदी के प्रारंभिक दिनों ने उन्हें और मज़बूत बना दिया और उन्होंने अपना बाक़ी जीवन बर्मा के आम आदमी के प्रतिनिधि के रूप में बिताने का निश्चय किया.

लेकिन आँग सान सू ची कोई साधारण व्यक्तित्व नहीं है. वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र के दूत रज़ाली इस्माइल ने भी कहा था कि अभी तक मिले लोगों में सू ची सबसे प्रभावशाली लोगों में से हैं और केवल बर्मा ही नहीं वरन एशिया को उनके नेतृत्व से फ़ायदा होगा.

विदेश प्रवास

बर्मा में आँग सान सूची के प्रति आकर्षण का एक मुख्य कारण यह भी है कि वे देश के स्वतंत्रता संग्राम के नायक जनरल आँग सान की पुत्री हैं. स्वतंत्रता से केवल छह महीने पहले, जुलाई 1947 में जनरल आँग सान की हत्या कर दी गई थी.

आँग सान सू ची उस समय केवल दो साल की थीं.1960 में किशोर आँग सान सू ची अपनी माँ के साथ भारत चली गईं. उनकी माँ को दिल्ली मेंबर्मा का राजदूत नियुक्त किया गया था.

उस दौरान सू ची के कई भारतीय मित्र बनेजिनमें इंदिरा गाँधी के पुत्र राजीव और संजय भी शामिल थे.

चार साल बाद वे इंग्लैंड की ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय गईं जहाँ उन्होंने दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की. वहीं उनकी मुलाक़ात उनके भावी पति माइकल ऐरिस से हुई.

जापान और भूटान में रहने और काम करने के बाद उन्होंने ऐरिस माइकल से विवाह कर घर बसा लिया और दो बच्चों ऐलेक्सैंडर और किम को जन्म दिया लेकिन बर्मा उनके दिल से कभी दूर नहीं हुआ.

विरोध

Image caption पुरी दुनिया में आँग सान सू ची के चाहने वाले हैं.

वर्ष 1988 तक वे रंगून नहीं लौटीं. फिर बीमार माँ की देखभाल के लिए वे ऐसे समय वापस आईं जब देश में राजनीतिक उथलपुथल का माहौल था.

हज़ारों छात्र, कर्मचारी और भिक्षु सड़कों पर प्रदर्शनकर लोकतांत्रिक सुधारों की माँग कर रहे थे.

आँग सान सू ची फिर तब के तानाशाह जनरल नेविन के खिलाफ़ विद्रोह का नेतृत्व करने उतर गईं.मार्टिन लूथर किंग और महात्मा गांधी से प्रेरणा ले उन्होंने देश भर का दौरा किया, रैलियाँ निकालीं. लेकिन तमाम प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचल कर सेना ने 18 सितबंर, 1988 को सत्ता संभाल ली.मई, 1990 में सैन्य सरकार ने चुनाव करवाए. आँग सान सू ची की एनएलडी ने आसानी से चुनाव जीत लिए बावजूद इसके कि वे नज़रबंद थीं और उन्हे चुनाव नहीं लड़ने दिया गया था. लेकिन सेना ने सत्ता देने से इनकार कर दिया.मार्च,1999 में आँग सान सू ची को एक बड़ा निजी आघात उनके पति मृत्यु से लगा जो कैंसर के कारण चल बसे. वे उनसे तीन वर्षों से नहीं मिलीं थीं.एक आम बर्मा वासी के लिए सू ची स्वतंत्रता की इच्छा का प्रतीक हैं. जब तक वो हैं, आज़ादी की यह आशा भी जीवित रहेगी.