छात्रों के मसले पर ऑस्ट्रेलिया चिंतित

भारतीय छात्रों का विरोध प्रदर्शन
Image caption भारतीय छात्रों ने हमलों के विरुद्ध कई बड़े प्रदर्शन किए हैं

भारतीय छात्र जब ऑस्ट्रेलिया पहुँचते हैं तो जो चीज़ वे नहीं सोचकर आते वो ये कि वे सड़कों पर उतरकर किसी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेंगे.

पहले उन्हें मेलबर्न, सिडनी और एडीलेड जैसे शहरों में हमलों और लूटमार की घटनाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी पड़ी. पुलिस का कहना है कि मई के अंत से अब तक 97 ऐसे मामले सामने आए हैं हालाँकि असलियत क्या है ये शायद अब भी पता न चल पाए क्योंकि कई घटनाओं के बारे में पुलिस में रिपोर्ट ही दर्ज नहीं कराई जाती.

अब भारतीय छात्र उन लोगों से नाराज़ हैं जो उन्हें शिक्षा के नाम पर ऑस्ट्रेलिया लाते हैं और फिर उन्हें पता चलता है कि वहाँ उनके सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा है. ये वे एजेंट हैं जो छात्रों से काफ़ी पैसे लेते हैं मगर उसके नाम पर शिक्षा उच्चस्तरीय नहीं होती.

हमलों से सुरक्षा और ऐसे निजी संस्थानों से बचाव की माँग करते हुए भारतीय छात्रों ने जो आवाज़ उठाई है उसने कई लोगों को प्रेरित किया है और अब ये एक छात्र आंदोलन सा बन गया है.

इस आंदोलन को अब ऑस्ट्रेलियाई ही नहीं बल्कि चीनी और दूसरे देशों के भी छात्रों का समर्थन मिल रहा है.

हमले और शिक्षा की गुणवत्ता

ऑस्ट्रेलियाई सरकार के लिए ये काफ़ी संवेदनशील मसला है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया ख़ुद को शिक्षा जगत की एक बड़ी ताक़त मानता है और वहाँ लगभग 70 हज़ार भारतीय छात्र हैं.

कोयले और लौह अयस्क के बाद वहाँ ये तीसरा सबसे बड़ा उद्योग है

भारतीय छात्र सुमित पुरदानी एमबीए करने सिडनी पहुँचे थे मगर उनके पहुँचने के साथ ही उनके साथ जो बर्ताव हुआ उसने उनके ज़ेहन में दहशत भर दी.

सिडनी पहुँचने के एक महीने के भीतर ही मध्य पूर्व देशों के तीन छात्रों के एक गैंग ने उस वक़्त उन पर हमला कर दिया जब वो दिन में ही एक मंदिर जा रहे थे.

उन पर लातों-घूसों की बरसात हो गई और ये पूरा हमला 10-15 मिनट तक चला. उनके हमलावर उस समय भागे जबकि एक स्थानीय फ़ुटबॉल टीम मैच के बाद उधर आती दिखी.

उन्हें इस बात का कोई शक़ नहीं कि उनकी राष्ट्रीयता की वजह से ही उन पर ये हमला हुआ. वह कहते हैं, "एक भारतीय प्रतीक चिह्न वाला बैग मेरे पास था और उस दौरान उन्होंने मेरे देश और मेरी राष्ट्रीयता के बारे में जो टिप्पणियाँ कीं उससे स्पष्ट है कि भारतीय होने की वजह से ही हमला हुआ."

कुछ ही समय पहले उन पर दोबारा हमला हुआ. उनका कहना है कि अब भारतीय छात्र मानकर चल रहे हैं कि वे नस्ली भेदभाव का शिकार होंगे और सुमित ऐसे दर्जनों छात्रों को जानते हैं जिन पर निशाना साधा गया है.

भारत में विरोध

उधर भारत में इस मसले को मीडिया ने काफ़ी प्रमुखता से सामने रखा है.

इस पूरे संकट के कूटनीतिक और आर्थिक पहलुओं से वाकिफ़ ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री केविन रड ने भारतीय पत्रकारों से बातचीत में भारत के साथ रिश्तों की दुहाई दी और कहा कि भारतीयों के लिए उनके मन में बहुत सम्मान है.

Image caption शशि रे का कहना है कि भारतीय छात्र कोई दुधारू गाय नहीं हैं

उन्होंने कहा, "हमारे यहाँ का भारतीय समुदाय हमारी संस्कृति, हमारे जीवन, हमारे खान-पान और हमारे संगीत में एक अहम भूमिका निभाता रहा है."

रड ने भारत की पहचान बन चुके बॉलीवुड और भारतीय खान-पान का भी इस मौक़े पर ज़िक्र किया. रड का कहना था, "बॉलीवुड तो हमारे सभी बच्चे पसंद करते हैं. इसके अलावा मैं हमेशा ये कहता हूँ कि अगर ऑस्ट्रेलिया में भारतीय खान-पान न होता तो हम 100 सालों से सिर्फ़ अँगरेज़ों का खाना ही खा रहे होते."

ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर होने वाले हमलों पर लोगों का उतना ध्यान नहीं गया है जितना शिक्षा की गुणवत्ता पर.

इन चिंताओं को और बल मिला जब सिडनी का एक निजी शिक्षण संस्थान स्टर्लिंग कॉलेज दिवालिया हो गया.

हज़ारों डॉलर की फ़ीस देकर वहाँ गए लगभग पाँच सौ विदेशी छात्रों के लिए स्टर्लिंग कॉलेज के दरवाज़े बंद हो चुके थे.

उस विवाद ने इस क्षेत्र में वित्तीय धांधली और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे मसलों को सामने लाकर रख दिया.

स्टर्लिंग कॉलेज के एक पूर्व शिक्षक ने शिकायत करते हुए बताया कि उन लोगों को शिक्षा देने के लिए प्रोजेक्टर या किताबों जैसी मूलभूत चीज़ें भी उपलब्ध नहीं कराई जाती थीं.

भारतीय छात्रों का दर्द

स्टर्लिंग कॉलेज जब दिवालिया हुआ उस समय हरदीप कौर का कोर्स ख़त्म ही होने वाला था. उन्होंने अभी तक अपने माँ-बाप को इस बारे में कुछ नहीं बताया है क्योंकि उन्हें हज़ारों डॉलर उनकी शिक्षा पर ख़र्च किए हैं.

हरदीप कहती हैं, "वे हर रोज़ फ़ोन करके पूछते हैं कि पढ़ाई कैसी चल रही है. मुझे कहता पड़ता है कि सब ठीक है क्योंकि मैं उन्हें सच नहीं बता सकती. उन्हें बहुत दुख होगा. मैंने उन लोगों से कुछ नहीं कहा है."

उनके दोस्त शशि रे भी कुछ ऐसी ही हालत में हैं, "कोई तो अंतरराष्ट्रीय छात्रों की हालत पर ध्यान दे. हम लोग कोई दुधारू गाय नहीं हैं जिन्हें बस दुहते रहा जाए. हम यहाँ पढ़ने आए हैं."

भारतीय महावाणिज्य अधिकारी अमित दासगुप्ता ने सिडनी में पोस्टिंग ली क्योंकि उनकी बेटी वहीं पढ़ती है. वह चाहते हैं कि राज्य और केंद्र सरकार इस दिशा में कड़े क़दम उठाए.

सरकारें अब कुछ सुधारवादी क़दम उठा रही हैं जिससे निजी कॉलेजों को भी मान्यता दी जाए और दूसरे कॉलेज बंद किए जाएँ.

कूटनीतिक अभियान

भारत से ऑस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों की संख्या में अब गिरावट आ रही है और इसकी वजह से ऑस्ट्रेलिया को कूटनीतिक अभियान भी तेज़ करना पड़ा है.

ऑस्ट्रेलियाई उप प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड पिछले महीने भारत के दौरे पर गईं थीं और अब प्रधानमंत्री रड भी क्रिसमस से पहले वहाँ जाने की योजना बना रहे हैं.

सिडनी में इस महीने हुए विरोध प्रदर्शन में मौजूद, चीन के टीवी चैनलों के कैमरे देखकर ऑस्ट्रेलियाई अधिकारी परेशान ज़रूर हुए होंगे क्योंकि वो उनका एक अन्य बड़ा बाज़ार है.

ऑस्ट्रेलिया को आम तौर पर एक नस्लभेदी देश के तौर पर देखा जाता है और उसकी एक वजह ये बनी कि 1970 के दशक की शुरुआत तक वहाँ गोरे लोगों के आव्रजन से जुड़ी नीतियाँ लागू थीं.

मगर इससे बड़ी कहानी ये है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ऑस्ट्रेलिया का एक संस्कृति वाला समाज बहु-संस्कृति वाला समाज बन चुका है.

एशिया के प्रभाव वाली इस शताब्दी में ऑस्ट्रेलिया, भौगोलिक और कूटनीतिक हिसाब से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी प्रभावशाली स्थिति में है.

मगर भारत और चीन जैसे उभरती महाशक्तियों के छात्रों की उपेक्षा करने से उसकी वैश्विक महात्वाकाँक्षाओं पर असर पड़ सकता है.

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