मणिपुर में 60 घंटे का बंद

Image caption मणिपुर मे सशस्त्र बलों के विशेषाधिकारों का विरोध चल रहा है

लंबे समय से सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून का विरोध करते आ रहे पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में एकबार फिर से कई संगठन इसके विरोध के लिए एकसाथ सामने आए हैं.

मानवाधिकार उल्लंघन पर चिंता जताते हुए और इस विशेषाधिकार क़ानून का विरोध करने के लिए इन संगठनों ने राज्य में 60 घंटे का बंद बुलाया है. जनजीवन पर इस बंद का मिलाजुला असर दिखाई दे रहा है.

दरअसल, ताज़ा रोष पहले चरमपंथी रहे और अब सामान्य जीवन में वापसी कर चुके संजीत की कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या के विरोध में शुरू हुआ. इसी विरोध के तहत ये बंद बुलाया गया है.

पिछले कुछ समय से मणिपुर में सशस्त्र बलों को दिए गए विशेष अधिकारों के विरोध में प्रदर्शनों का सिलसिला तेज़ हुआ है और इन प्रदर्शनों को नेतृत्व देने के लिए कई संगठनों ने मिलकर एक बड़ा मंच बनाया है जिसे अपुनब लुप नाम दिया गया है.

मणिपुर की परिस्थितियों के जानकारों के अनुसार संजीत की कथित फ़र्जी मुठभेड़ मामले से एक बार फिर राज्य में अलगाववादी संगठनों को अपने लिए जगह बनाने में मदद मिल सकती है.

इंफ़ाल से पत्रकार युमनम रुपचंद कहते हैं, "ये कहा जा सकता है कि फ़र्जी मुठभेड़ का मुद्दा उठने से अलगाववादी संगठनों को सहारा मिला है, क्योंकि सशस्त्र बलों को मिले विशेषाधिकार का दुरुपयोग करके एक सुरक्षाकर्मी किसी को भी संदेह के आधार पर मार सकता है. लोगों को सशस्त्र बलों की नीयत पर शक है."

रुपचंद कहते हैं कि 23 जनवरी को संजीत नाम के लड़के की कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या के बाद दिल्ली से छपने वाले एक अख़बार ने उसका विडियो जारी कर मुठभेड़ की सत्यता पर सवाल खड़ा कर दिया था.

इसके बाद से उन संगठनों की बात को बल मिला है जो ये कहते रहे हैं कि मणिपुर में सशस्त्र बलों को मिले विशेष अधिकारों का दुरुपयोग करके बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों को चरमपंथ से लड़ने के नाम पर मार जाता रहा है.

जानकार कहते हैं कि जिन पुलिसवालों पर अत्याचार के आरोप लगते हैं, ज़्यादातर मामलों मे उनकी जांच तक नहीं होती.

जहां तक वर्तमान परिस्थिति से निपटने का सवाल है, रुपचंद कहते हैं कि सरकार की तरफ से इस मसले से निपटने के लिए कोई राजनीतिक पहल नहीं की गई है और इस मसले से निपटने के लिए ताक़त का इस्तेमाल किया जा रहा है जो असल मे असंतोष को और भड़का सकता है.

मणिपुर में सशस्त्र बलों को मिले विशेष अधिकारों के ख़िलाफ़ आंदोलन अब काफी पुराना हो चला है. इस मांग को लेकर वर्ष 2000 से इरोम शर्मिला नाम की लड़की आमरण अनशन कर रही है. इसके अलावा वर्ष 2004 में पूरा देश सकते में आ गया था जब कुछ मणिपुरी महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर सुरक्षा बलों द्बारा कथित अत्याचारों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था.

संबंधित समाचार