मिसाल बना स्वच्छ गांव

  • 26 सितंबर 2009
भारत के उत्तरपूर्वी राज्य मेघालय का मौलिंनौंग गांव
Image caption स्वच्छ और हरा भरा मौलिंनौंग गांव

भारत के उत्तरपूर्वी राज्य मेघालय का एक छोटा सा गांव अपनी साफ और हरी भरी छवि के कारण एक मिसाल बन चुका है.

मौलिंनौंग गांव को देखने के लिए भारी संख्या में लोग आते हैं ये जानने के लिए कि भारत भर में सबसे साफ औऱ सबसे शिक्षित गांव कहलाने का गौरव उसे कैसे हासिल हुआ.

इस गांव के सभी निवासी पढ़ लिख सकते हैं और सभी के घरों में एक शौचालय की सुविधा है.

भारत जैसे देश में, जहां साफ सफाई और पानी जैसी बुनियादी समस्याओं से लोग हर रोज़ जूझ रहे हैं, मौलिंनौंग गांव एक अजूबे की तरह सामने आया है. अपनी इसी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए गांव के निवासी कड़ी मेहनत करते हैं.

मेघालय की राजधानी शिलॉंग से कोई 90 किलोमीटर दूर और बंगलादेश की सीमा से मात्र 4 किलोमीटर दूर स्थित मौलिंनौंग गांव देश के उन हिस्सों में से है, जहां सबसे ज्यादा बारिश होती है.

उसके बावजूद भरी बरसात में स्वंयसेवकों का टोला बड़े सवेरे गलियों को झाड़ने बुहारने के लिए निकल पड़ता है. दिन भर में कई बार ये प्रक्रिया दोहराई जाती है. सभी गलियों के नुक्कड़ पर बांस के बने कूड़ादान रखे हुए हैं. इसीलिए गलियों में कोई भी काग़ज़ का टुकड़ा ये पेड़ से गिरा पत्ता तक दिखाई नहीं देगा.

पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए इस गांव में प्लास्टिक का इस्तेमाल प्रतिबंधित है. जंगल में गड्ढा खोदकर सारा कूड़ा उसमें भर दिया जाता है जो बाद में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. ग्राम प्रमुख थौमलिन खौंगथोरैम का कहना है कि गांव परिषद साफ सफाई के मामले में कोई कोताही बर्दाश्त नहीं करती.

थौमलिन खौंगथोरेम का कहना है, “ जो भी व्यक्ति पेड़ काटता हुआ या इधर उधर कूड़ा फेंकता हुआ दिखाई देता है उस पर जुर्माना लगाया जाता है. लोग जुर्माने से ज्यादा उस शर्मिंदगी से डरते हैं, जो उनके स्वाभिमान को आहत कर सकती है.”

ग्राम प्रमुख का ये भी कहना था कि परिषद हर घर में जा कर साफ सफाई का निरीक्षण करती है.

Image caption साफ सफाई और पर्यावरण का पूरा ध्यान रखती है ग्राम परिषद

पर्यावरण सुरक्षा

धरती की जलवायु में आ रहे बदलावों के ख़तरों की जानकारी देने के लिए नियमित तौर पर कार्यक्रम चलाये जाते हैं.मौलिंनौंग गांव की सबसे साफ औऱ सबसे हरी छवि के पीछे एक कारण ये भी है कि इसके निवासी खासी कबीले के हैं जो कि प्रकृति के पुजारी के रूप में जाने जाते हैं. प्रकृति के प्रति उनकी श्रद्धा ही जंगलों के संरक्षण की वजह मानी जाती है.

पड़ोस के गांव में एक वन क्षेत्र की देख रेख करने वाले थांबोर लिंगदोह ने बताया कि वहां के जंगल केवस निवासियों के विश्वास के कारण ही सुरक्षित नहीं हैं बल्कि जंगल के उपयोग के बारे में बनाए गए सख़्त नियम भी इसके लिए ज़िम्मेदार है.

उनका कहना था, “अपने निजी उपयोग के लिए या घरेलू इस्तेमाल के लिए लोग जंगलों से जो कुछ ले जाना चाहें उन्हें नहीं रोका जाता, लेकिन व्यवसायिक लाभ कमाने के लिए जंगल का इस्तेमाल नहीं करने दिया जाता अगर इस नियम की अवहेलना करने वाले को दंड दिया जाता है.”

ग्रामवासियों का कहना है कि बच्चों को छोटी उम्र से ही ये आरंभिक पाठ पढ़ा दिया जाता है कि अपने आस पास की जगहों को किस तरह स्वच्छ और हरा भरा रखा जाता है.

मौलिंनौंग गांव की स्वच्छ औऱ हरी भरी छवि ने राज्य के पर्यटन के नक्शे पर भी विराजमान है. भारत के कोने कोने से सैकड़ो सैलानी मेघालय के इस गांव को देखने के लिए आते हैं और इसकी साफ और हरी छवि से प्रभावित हुए बिना रह नहीं पाते.

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