परमाणु आतंकवाद सबसे बड़ी चुनौती

  • 29 सितंबर 2009
मनमोहन सिंह
Image caption सम्मेलन को संबोधिक करते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा है कि परमाणु आतंकवाद एक बहुत बड़ी चुनौती है जिसका सामना पूरी दुनिया को करना पड़ रहा है.

‘परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग’ विषय पर होने वाले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत व्यापक परमाणु अप्रसार संधि यानी सीटीबीटी के बाहर रहकर भी उसके सिद्धांतों से डिगा नहीं है.

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इसे व्यापक और भेदभाव रहित होना चाहिए.

मनमोहन सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परमाणु हथियारों की कटौती के संबंध में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि भारत एक परमाणु संपन्न और ज़िम्मेदार देश होने के नाते परमाणु निरस्त्रीकरण सम्मेलन में विखंडनीय पदार्थ कटौती संधि यानी एफएमसीटी पर बातचीत में रचनात्मक भूमिका निभाएगा.

उनका कहना था कि ये दुख की बात है कि तमाम प्रयासों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय परमाणु हथियारों की होड़ को रोकने में नाकाम रहा.

प्रधानमंत्री ने ज़ोर देकर कहा कि भारत साल 2050 तक 4,70,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन की क्षमता हासिल कर लेगा और ऐसा देश की तीन स्तरीय परमाणु ऊर्जा योजना के ज़रिए संभव हो सकेगा.

उन्होंने परमाणु हथियारों के ग़ैर-ज़िम्मेदार हाथों में जाने से रोकने की ज़रूरत बताई और कहा कि दुनिया के सामने ये सबसे बड़ी चुनौती है.

इससे पहले अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अध्यक्ष अल बारादेई ने इस दिशा में भारत के प्रयासों की सराहना करते हुए अपील की कि भारत निरस्त्रीकरण सम्मेलन में अहम भूमिका निभाए.

अल बारादेई ने कहा कि पिछले दो दशक से भारत ने जिस तरह से आर्थिक विकास किया है वह कई विकासशील देशों के लिए रोल मॉडल है.

तीन दिवसीय इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन भारत में परमाणु कार्यक्रम के जनक डा. होमी जहांगीर भाभा की जन्म शताब्दी समारोह के तहत किया गया है.

सम्मेलन में दुनिया भर के परमाणु वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं और इसमें पिछले पांच दशक में परमाणु ऊर्जा की उपलब्धियों और भविष्य में इसकी चुनौतियों पर चर्चा होगी.

इस मौक़े पर अल बारादेई को इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार दिया गया.

संबंधित समाचार