भारत में अब भी मरते हैं लाखों बच्चे

बच्चा
Image caption सेव द चिल्ड्रेन एक बड़ा अभियान शुरू कर रही है

भारत में अब भी प्रतिवर्ष जन्म के 24 घंटे के अंदर चार लाख से ज़्यादा बच्चों की मौत हो जाती है. ये चौंकाने वाले आँकड़े अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी सेव द चिल्ड्रेन के एक नए सर्वेक्षण का हिस्सा हैं.

सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष पाँच साल से कम उम्र के लगभग बीस लाख बच्चों की मौत होती है. यह संख्या दुनिया के किसी भी देश के मुक़ाबले अधिक है.

सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि लाखों बच्चों की जान बचाना उतना महंगा नहीं, जितना दुनिया भर के लोग समझते हैं.

लोगों की इस सोच के कारण ही दुनियाभर के नेताओं पर इस दिशा में क़दम उठाने के लिए कम दबाव बन पाता है.

इसके लिए सेव द चिल्ड्रेन अब तक का अपना सबसे बड़ा अभियान शुरू कर रही है. एजेंसी का कहना है कि 40 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि से बच्चों की जान बचाने की दिशा में बड़ा बदलाव आ सकता है.

ये राशि उस राशि की आधी से भी कम है, जितना लोग बोतलबंद पानी पर ख़र्च कर देते हैं.

दुविधा

सेव द चिल्ड्रेन का कहना है कि सहायता एजेंसियाँ दुविधा में है. सहस्राब्दि विकास लक्ष्य का एक अहम मुद्दा था उन बच्चों की मौत की संख्या को दो तिहाई कम करना, जो पाँच वर्ष से कम उम्र में ऐसी बीमारी से अपनी जान गँवा देते हैं, जिसका इलाज संभव है.

जनता में इस लक्ष्य को लेकर काफ़ी उम्मीदें हैं लेकिन सेव द चिल्ड्रेन का कहना है कि सच्चाई ये है कि इस दिशा में प्रगति काफ़ी धीमी है.

एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक संकट के कारण प्रति वर्ष बच्चों की मौत की संख्या में चार लाख की बढ़ोत्तरी हो रही है.

सेव द चिल्ड्रेन का कहना है कि इन सबके बावजूद आम लोग इस बात को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे हैं कि बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय कोष में अपेक्षाकृत कम बढ़ोत्तरी से भी स्थिति में काफ़ी बदलाव आ सकता है.

आवश्यकता

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए एक सर्वेक्षण ने यह संकेत दिया है कि आम तौर पर ये सोचा जाता है कि स्थिति में बदलाव के लिए 400 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी.

Image caption एजेंसी का कहना है कि कम पैसे से बड़ा बदलाव आ सकता है

सेव द चिल्ड्रेन के मुताबिक़ दरअसल इस राशि का 10वाँ हिस्सा ही स्थिति में बदलाव के लिए ज़रूरी है.

ये राशि उस राशि की आधी से भी कम है, जितना लोग बोतलबंद पानी पर ख़र्च कर देते हैं.

एजेंसी का कहना है कि लोग ये समझते हैं कि चुनौती काफ़ी बड़ी है और इसी कारण सरकारों पर इस बात के लिए पर्याप्त दबाव नहीं पड़ता कि वे ज़रूरी सहायता दें.

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